अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
- शकेब जलाली
हर फ़िक्र सिर्फ़ जागने वाले का है नसीब
जो सो रहा है बस वही बंदा मज़े में है
- अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
मिरे गुनाह ज़ियादा हैं या तिरी रहमत
करीम तू ही बता दे हिसाब कर के मुझे
- मुज़्तर ख़ैराबादी
ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो न सके
ये रंज है कि कोई दरमियान में भी न था
- जमाल एहसानी
ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है
जिस जगह रहिए वहाँ मिलते-मिलाते रहिए
- निदा फ़ाज़ली
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
- एहतिशाम अख्तर
Urdu Poetry: उस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे