आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Urdu Poetry: रात का पिछ्ला पहर मुझ को बशारत दे गया

उर्दू अदब
                
                                                         
                            उस को देखा था फ़क़त दो-चार लम्हों के लिए
                                                                 
                            
हो गए तन्हा जहाँ में कितनी सदियों के लिए

रात का पिछ्ला पहर मुझ को बशारत दे गया
आ रही है रौशनी तारीक गलियों के लिए

कोई सी रुत हो सदा पाया है उन को सोगवार
मौसमों का क़हर है मा'सूम पत्तों के लिए

अब कोई चेहरा कोई मंज़र हमें रोकेगा क्या
उठ चुके अपने क़दम पुर-पेच रस्तों के लिए

एक गुल है तुझ को प्यारा एक गुल मुझ को अज़ीज़
कितने पागल हो गए हम लोग रंगों के लिए

जिन का साया माओं की आग़ोश से कुछ कम न था
क़त्ल के अहकाम हैं अब उन दरख़्तों के लिए

अब नए पहलू से देखा चाहिए बाहर का रंग
मुंतख़ब कीजे नई जगहें दरीचों के लिए

ज़ात के तारीक ग़ारों में दरीचे खोलिए
रास्ता कोई तो हो सूरज की किरनों के लिए

कीजिए 'बेताब' रौशन अपनी पलकों पर दिए
रौशनी दरकार है बे-नूर कमरों के लिए

~ सलीम बेताब

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।


लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o 

3 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर