Urdu Poetry: कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं
नाख़ुदा जिन का नहीं उन का ख़ुदा होता है
- अमीर मीनाई

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दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए
- निदा फ़ाज़ली

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लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है
- अमीर क़ज़लबाश

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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
- ख़्वाजा मीर दर्द

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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
- निदा फ़ाज़ली

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अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की
मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई
- नुशूर वाहिदी

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Urdu Poetry: हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका

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