विज्ञापन

जिनका शुमार इस शहर के सौ धनवानों में है...

Ram Chandra

Mere Alfaz
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            जिनका शुमार इस शहर के सौ धनवानों में हैं
        
                                                    
                            

उनकी गिनती हो रही गरीब के भगवानों में हैं

मिलती आजादी जिन्हें मुल्क की बर्बादी में है

पहले जलाया उसी को रहे जिस आबादी में है

चली आरी भी उसी पर फूल जिस डाली में हैं

इनके लिए क्यों घी के दिए जलाएं थाली में हैं

परास्त कर लें उसे ऐसा सोचने वाले भ्रम में है

लोग कहते राजकुँअर सत्ता जाने के गम में है

ये मकान बस्ती के नामी गिरामी मकानों में हैं

सदैव पर्दे क्यों पड़े रहते सभी रोशनदानों में हैं

हलचल ठेर सारी हो गयी गहरे तहखानों में हैं

भीड़ ने बड़ी दौलत की जमा मालखानों में हैं

न कमी दिखती कोई चमन के नए माली में हैं

करवा दी चौकसी ऐसी कि भौंरें कंगाली में हैं

सारे जग ने जाना इसे सबकी रायशुमारी में हैं

खिले हुए कई रंगों के फूल इस फुलवारी में हैं

साझी विरासत को रोके न किसी के दम में है

ऐसी ताकत कहां किसी बगदादी के बम में है

पुन:पहरा बिठा देना उसी की चौकीदारी में है

'अशोक'दूर तक न कोई उसकी रिश्तेदारी में है

रामचन्द्र दीक्षित 'अशोक'

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Chaturvedi

181 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10257 कविताएं

View Profile