जिनका शुमार इस शहर के सौ धनवानों में हैं
उनकी गिनती हो रही गरीब के भगवानों में हैं
मिलती आजादी जिन्हें मुल्क की बर्बादी में है
पहले जलाया उसी को रहे जिस आबादी में है
चली आरी भी उसी पर फूल जिस डाली में हैं
इनके लिए क्यों घी के दिए जलाएं थाली में हैं
परास्त कर लें उसे ऐसा सोचने वाले भ्रम में है
लोग कहते राजकुँअर सत्ता जाने के गम में है
ये मकान बस्ती के नामी गिरामी मकानों में हैं
सदैव पर्दे क्यों पड़े रहते सभी रोशनदानों में हैं
हलचल ठेर सारी हो गयी गहरे तहखानों में हैं
भीड़ ने बड़ी दौलत की जमा मालखानों में हैं
न कमी दिखती कोई चमन के नए माली में हैं
करवा दी चौकसी ऐसी कि भौंरें कंगाली में हैं
सारे जग ने जाना इसे सबकी रायशुमारी में हैं
खिले हुए कई रंगों के फूल इस फुलवारी में हैं
साझी विरासत को रोके न किसी के दम में है
ऐसी ताकत कहां किसी बगदादी के बम में है
पुन:पहरा बिठा देना उसी की चौकीदारी में है
'अशोक'दूर तक न कोई उसकी रिश्तेदारी में है
रामचन्द्र दीक्षित 'अशोक'
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