मय पैगाम
-----------
यह आलय है मदिरालय है
धर्म नहीं है जाति नहीं है
ऊंच नीच का भेद नहीं है
मान सम्मान एक समान है ।।
ना पैगम्बर न ही पुजारी
ना पादरी है न आभारी
भेद भाव नींव नहीं है
ना इधर उधर बंटवारा है ।।
मदिरालय में आने वाला
मदिरालय से जाने वाला
सब मय मध की आली आला
मय ही मैं को कहने वाला ।।
ना मंदिर का पैगाम उठे
ना मस्ज़िद का फतवा ही चले
न धर्मान्तरण पादरी की
ऐसी कोई रीत बहेगी ।।
ऐसे ऐसे आलय खोलो
मंदिर मस्जिद जा जा बोलो
गुरुद्वारे गिरिजाघर में जा
मय पैगाम जा कर बोलो ।।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।