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क्या है अंडर ग्राउंड ड्रिप पाइपलाइन सिंचाई, किसानों के लिए फायदेमंद, वैज्ञानिक खोज में जुटे

Sat, 13 Jul 2019 01:14 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, करनाल (हरियाणा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, करनाल (हरियाणा) Published by: ajay kumar Updated Sat, 13 Jul 2019 01:14 PM IST
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Know About Underground drip pipeline irrigation
सांकेतिक तस्वीर

मौजूदा सिंचाई की विधियां भूजल के लिए खतरा हैं। पानी की खपत का आनुपातिक आंकड़ा 75 प्रतिशत कृषि में खपत व 25 प्रतिशत घरेलू व उद्योग आदि में इस्तेमाल का माना जाता है। खेती में भूजल का इस्तेमाल हो रहा है। इसको बचाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं ताकि खेती भी हो और भविष्य भी सुरक्षित रहे।

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क्या है अंडर ग्राउंड ड्रिप पाइपलाइन सिंचाई 
ड्रिप प्रणाली को जमीन के ऊपर बिछाया जाता है। ज्यादातर सब्जियों व उद्यान में इसका इस्तेमाल किया जाता था। फसल कटने के बाद खेत से पाइपलाइन को उठाना पड़ता है। इस झंझट को वैज्ञानिकों ने मिटा दिया। नए अनुसंधान में खेत में ड्रिप पाइपलाइन को 15 सेंटीमीटर जमीन में दबाया दिया जाता है। इस विधि पर करनाल व लुधियाना में तीन साल से धान, गेहूं, मक्का व मूंग में प्रयोग किया गया और अब चौथा साल चल रहा है।
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क्या हुए फायदे 
बारिश से अलग प्रति हेक्टेयर धान उत्पादन के लिए पूरे सीजन में 2400 से 2600 मिलीलीटर पानी प्रति हेक्टेयर में खपत होता है। अंडरग्राउंड ड्रिप पाइपलाइन सिंचाई विधि से धान में 50 प्रतिशत पानी बचता है।  जो नाइट्रोजन पौधे को देते हैं उसमें सौ किलो में से 35 से 40 किलो ही धान का पौधा उपयोग कर पाता है। 
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इससे 50 से 60 प्रतिशत नाइट्रोजन पौधा इस्तेमाल करता है। 25 से 30 प्रतिशत यूरिया बचता है। चावल में 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। गेहूं व मक्का में 20 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ा है। धान-गेहूं फसल चक्र के बीच मूंग की फसल जिसमें आठ से दस क्विंटल प्रति हेक्टेयर मूंग उपज हुई है। यह लगाने पर प्रति एकड़ खर्च 60 से 80 हजार रुपये आता है। 

मेहनत रंग लाई
सिमिट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ एमएल जाट की देखरेख में यह अनुसंधान कार्य हो रहे हैं। इसके तहत क्लाइमेट चेंज एंड एग्रीकल्चर फूड सिक्योरिटी परियोजना के केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान करनाल स्थित रिसर्च प्लेटफार्म के वैज्ञानिक डॉ एसके ककरालिया व सीएसएसआरआई के निदेशक डॉ पीसी शर्मा और प्रधान वैज्ञानिक डॉ एचएस जाट की मेहनत रंग लाई है। 

ड्रिप, फव्वारा व टपका विधि से पवन कर रहा जल संक्षरण

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जल संरक्षण - फोटो : अमर उजाला

जल संक्षरण के लिए कुम्हारिया गांव के किसान पवन बेनीवाल ने पहल की है। पवन बेनीवाल ने 2008 में 15 एकड़ भूमि में किन्नू का बाग लगाया। जिसमें जमीन रेतीली होने के कारण सिंचाई के पानी की ज्यादा आवश्यकता होती थी। उसने बताया कि सरकार के सहयोग से उसने खेत में एक पानी की 110 फुट  डिग्गी भी बनाई। 

उस डिग्गी में पानी इकट्ठा करके रखता है जब भी सिंचाई की जरूरत होती है, तभी सिंचाई कर लेता है। वह सिंचाई ड्रिप सिस्टम द्वारा की जाती है, जिससे पानी व दवाई सीधे पौधों को मिल जाती है तथा पानी बेकार नहीं जाता। आस पड़ोस के किसानों को जब भी सिंचाई के पानी की जरूरत नहीं होती तो वह उन किसानों से किराए पर पानी लेकर डिग्गी भर लेता है।

 इसके अलावा बारिश का पानी भी एकत्रित होता रहता है। पवन बेनीवाल ने बताया कि उसने पानी को जरूरत के हिसाब से ड्रिप सिस्टम व फव्वारा सिस्टम व टपका विधि से सिंचाई करने लगा। पवन ने बताया कि टपका विधि द्वारा सिंचाई करने से पानी बहुत कम खर्च होता है। 

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