{"_id":"5d53c5408ebc3e6c9c26c442","slug":"agriculture-drip-irrigation-new-technique-for-farming","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"करनालः सिंचाई का नया तरीका, 20 एकड़ में ड्रिप इरीगेशन प्रणाली से हुई 75 प्रतिशत पानी की बचत","category":{"title":"Agriculture","title_hn":"कृषि","slug":"agriculture"}}
करनालः सिंचाई का नया तरीका, 20 एकड़ में ड्रिप इरीगेशन प्रणाली से हुई 75 प्रतिशत पानी की बचत
Wed, 14 Aug 2019 01:54 PM IST
खुशबू गोयल
कर्मबीर लाठर, अमर उजाला, करनाल
कर्मबीर लाठर, अमर उजाला, करनाल
Published by: खुशबू गोयल
Updated Wed, 14 Aug 2019 01:54 PM IST
विज्ञापन
फाइल फोटो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आज के परिवेश में देश में भूजल बचत का मामला सबसे ज्यादा चर्चित है। भूजल की खपत की बात सामने आते ही घरेलू व कृषि दोनों क्षेत्र जहन में आते हैं। माना जाता है कि कृषि की परंपरागत सिंचाई विधियों की वजह से इस क्षेत्र में पानी की अत्यधिक खपत हो रही है। भूजल का असीमित दोहन होने की वजह से जलस्तर पाताल में खिसकता जा रहा है।
हरियाणा में ऐसे किसान भी सामने आए हैं, जिन्होंने खेती में पानी की अत्यधिक खपत की अवधारणा को बदलकर दिखाया है। उन्हीं में से एक हैं करनाल जिले के रसूलपुर खुर्द गांव के प्रगतिशील किसान सूरजमल। पिछले कुछ सालों में उन्होंने खेती ढर्रे में अमूलचूल परिवर्तन किया। परिणामस्वरूप तीन चौथाई पानी की बचत हुई है।
20 एकड़ में आधुनिक ढंग से सब्जियों की खेती करने पर ट्यूबवेल के पानी की खपत मात्र 25 प्रतिशत रह गई है। खेती का कुल खर्च काटकर प्रति एकड़ सालाना दो लाख रुपये शुद्ध मुनाफा ले रहे हैं। सैकड़ों मजदूरों को वर्ष भर नियमित रूप से उनके खेत में काम मिल रहा है। किसान सूरजमल अपनी अधिकतर जमीन में गन्ना उत्पादन किया करते थे।
विज्ञापन
इसके अलावा गेहूं व धान की खेती करते थे। उन्होंने 2007 में चार एकड़ में ड्रिप इरीगेशन सिस्टम अपनाया।
विज्ञापन
हरियाणा में ऐसे किसान भी सामने आए हैं, जिन्होंने खेती में पानी की अत्यधिक खपत की अवधारणा को बदलकर दिखाया है। उन्हीं में से एक हैं करनाल जिले के रसूलपुर खुर्द गांव के प्रगतिशील किसान सूरजमल। पिछले कुछ सालों में उन्होंने खेती ढर्रे में अमूलचूल परिवर्तन किया। परिणामस्वरूप तीन चौथाई पानी की बचत हुई है।
विज्ञापन
20 एकड़ में आधुनिक ढंग से सब्जियों की खेती करने पर ट्यूबवेल के पानी की खपत मात्र 25 प्रतिशत रह गई है। खेती का कुल खर्च काटकर प्रति एकड़ सालाना दो लाख रुपये शुद्ध मुनाफा ले रहे हैं। सैकड़ों मजदूरों को वर्ष भर नियमित रूप से उनके खेत में काम मिल रहा है। किसान सूरजमल अपनी अधिकतर जमीन में गन्ना उत्पादन किया करते थे।
विज्ञापन
इसके अलावा गेहूं व धान की खेती करते थे। उन्होंने 2007 में चार एकड़ में ड्रिप इरीगेशन सिस्टम अपनाया।
2016 में बाकी 16 एकड़ जमीन में सिंचाई की यही विधि अपना ली। 2017 में दो एकड़ में नैट हाउस लगाकर खीरा, शिमला मिर्च, फूल व टमाटर की फसलें लेनी शुरू की। पूरी जमीन में बैड प्लांटिंग सिस्टम से मल्चिंग करवाते हैं। 12 एकड़ में लोहे की एंगल की स्थाई विधि लगाई। जो बांस विधि की जगह अपनाई है। इसके लिए उन्होंने सरकार से कोई अनुदान नहीं लिया। इन खेतों में करेला, तरबूज, खरबूजा, खीरा व तोरी की सब्जियां उगाते हैं।
किसान सूरजमल ने बताया कि इस वक्त उनके फार्म पर 8 एकड़ में गोभी की फसल तैयार हो रही है। घीया इत्यादि बेल वाली फसलों की ट्रांस प्लांटिंग करवा रहे हैं। खेत में मल्चिंग एक साल तक चलती है जिस पर प्रति एकड़ खर्च करीब 15 हजार रुपये आता है। उनके खेतों में सिंचाई के लिए पहले एक ट्यूबवेल था। गन्ना बिजाई किया करते थे। धान की तरफ रुख किया तो एक और ट््यूबवेल लगाने की जरूरत पड़ी। बिजली कनेक्शन के लिए विद्युत निगम में आवेदन किया था लेकिन कनेक्शन नहीं मिला।
बाद में वह सब्जियों की खेती पर आए और पूरी जमीन में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाई। अब एक ट्यूबवेल के पानी की खपत भी केवल 25 प्रतिशत ही रह गई है। सूक्ष्म सिंचाई के लिए पांच - पांच किलोवाट के सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाए हैं ताकि बिजली खपत नाममात्र ही रहे।
किसान सूरजमल ने बताया कि इस वक्त उनके फार्म पर 8 एकड़ में गोभी की फसल तैयार हो रही है। घीया इत्यादि बेल वाली फसलों की ट्रांस प्लांटिंग करवा रहे हैं। खेत में मल्चिंग एक साल तक चलती है जिस पर प्रति एकड़ खर्च करीब 15 हजार रुपये आता है। उनके खेतों में सिंचाई के लिए पहले एक ट्यूबवेल था। गन्ना बिजाई किया करते थे। धान की तरफ रुख किया तो एक और ट््यूबवेल लगाने की जरूरत पड़ी। बिजली कनेक्शन के लिए विद्युत निगम में आवेदन किया था लेकिन कनेक्शन नहीं मिला।
बाद में वह सब्जियों की खेती पर आए और पूरी जमीन में सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली अपनाई। अब एक ट्यूबवेल के पानी की खपत भी केवल 25 प्रतिशत ही रह गई है। सूक्ष्म सिंचाई के लिए पांच - पांच किलोवाट के सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाए हैं ताकि बिजली खपत नाममात्र ही रहे।