बीते दशक पर एक नजर - दूसरा भाग
अब जब वर्ष 2019 विदा होने के कगार पर है, आइए एक नजर डालते हैं साल 2010 और 2019 के बीच घटी विश्व की कुछ बड़ी घटनाओं पर। सदी के दूसरे दशक पर केंद्रित तीन हिस्सों वाली इस समीक्षा की दूसरी कड़ी में हम 2014 और 2016 के बीच हुई घटनाओं पर नजर डालेंगे जिनमें शामिल हैं: ईबोला का भयावह प्रकोप; ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते के माध्यम से विश्व नेताओं द्वारा जलवायु संकट से निपटने का प्रयास; और टिकाऊ विकास पर संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा का शुभारंभ।
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विस्तार
2014: ईबोला बीमारी का कहर
दिसंबर 2013 में गिनी के मेलियानडौ गांव में एमिल ओउमुनो नाम के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। यह उसके परिवार के लिए तो एक त्रासदी थी ही, लेकिन इस बच्चे की मौत ने तब एक अलग आयाम ले लिया जब एमिल की पहचान पहले ईबोला रोगी के रूप में हुई। इसके बाद देखते ही देखते ईबोला ने पश्चिमी अफ्रीकी देशों को अपनी चपेट में ले लिया।
ये खतरनाक, संक्रामक वायरस गिनी के साथ-साथ पड़ोसी देशों लाइबेरिया और सिएरा लियोन में भी फैल गया जिसे पश्चिमी अफ्रीका के ईबोला प्रकोप के रूप में देखा गया। इसके प्रकोप से तीन देशों की अर्थव्यवस्थाएं ध्वस्त होने के करीब पहुंच गईं और स्वास्थ्य सेवाएँ पर जबरदस्त बोझ पड़ा। उस वर्ष लगभग छह हजार मौतें दर्ज की गईं और स्थानीय समुदायों में ईबोला का भय फैल गया।
अगस्त 2014 तक विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई सुनिश्चित करने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धनराशि एकत्र करने और दूसरे देशों में बीमारी फैलने से रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिन्ताजनक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (PHEIC) की घोषणा कर दी थी।
इस आपातकाल को हटाने में यूएन एजेंसी को दो साल लगे। इस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन में इबोला के 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके थे और 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई।
स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वीकृत वर्ष 2016 की एक स्वतंत्र रिपोर्ट में कहा गया कि ईबोला के प्रकोप के अभूतपूर्व पैमाने को पहचानने में देरी हुई। साथ ही इस रिपोर्ट में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण और स्वास्थ्य नेटवर्कों के बीच बेहतर संचार के महत्व पर प्रकाश डाला गया।
अफसोस की बात ये है कि वर्ष 2018 से अफ्रीका का एक और हिस्सा इबोला बीमारी की चपेट में आया हुआ है। कॉंगो लोकतांत्रिक गणराज्य में लगभग 3,300 मामलों की पुष्टि हो चुकी है और 2,200 जानें गई हैं। इस प्रकोप का केंद्र - देश का पूर्वी भाग, गंभीर असुरक्षा और हिंसा का भी सामना कर रहा है जिससे रोग की रोकथाम के प्रयासों में बाधा आ रही है।
बेनी क्षेत्र में यूएन एजेंसी की ईबोला पर काबू पाने का प्रयास कर रही टीम के एक तिहाई सदस्यों को सुरक्षा कारणों से अस्थायी रूप से स्थानांतरित करना पड़ा है जिससे वायरस के और अधिक फैलने की संभावना है।
2015: जलवायु कार्रवाई के लिए नई उम्मीद
दिसंबर 2015 में जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते को अपनाने से पर्यावरण के लिए उम्मीदें जागीं। दुनिया के सभी देशों ने पहली बार समग्र तौर पर जलवायु संकट का मुकाबला करने और इससे निपटने का संकल्प लिया, जिसमें वैश्विक तापमान वृद्धि का संभावित खतरा भी शामिल है।
तत्कालीन यूएन महासचिव बान की मून ने समझौते को "अभूतपूर्व जीत" बताते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि ये समझौता "ग़रीबी समाप्त करने, शांति मजबूत करने और सभी के लिए सम्मान और अवसरों का जीवन सुनिश्चित करने की दिशा निर्धारित करेगा।"
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP-21 में दो सप्ताह चली चर्चा के बाद इस समझौते पर सहमति बनी। इसमें वो सभी निष्कर्ष शामिल किए गए हैं जो जलवायु आपदा से निपटने के लिए बेहद अहम हैं: वैश्विक तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम तक सीमित रखने के लिए कार्बन उत्सर्जन में कटौती; जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बेहतर तरीके से निपटने के लिए अनुकूलन प्रयास; और सबसे कमजोर और ग़रीब देशों के लिए पर्याप्त वित्तपोषण।
ये समझौता आशा और महत्वाकांक्षा की भावना के साथ सम्पन्न हुआ था और कई प्रतिनिधियों की आंखों में आंसू भर आए थे। तब बान की मून ने कहा था कि इसमें शामिल सभी लोगों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उन्होंने क्या हासिल किया है। लेकिन साथ ही हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये समझौता सिर्फ शुरुआत है, क्योंकि "असली काम तो कल से शुरू होगा।"
ये समझौता चार साल बाद भी साफ-सुथरी, टिकाऊ वैश्विक अर्थव्यवस्था के रास्ते पर सबसे अहम चरण के रूप में देखा जाता है। लेकिन कई संकेत हैं कि इसे मजबूती से आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त काम नहीं हो पाया है: पर्यावरणीय रिपोर्टों और अध्ययनों से स्पष्ट है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण को निरंतर नुकसान हो रहा है।
आशंका जताई गई है कि अगर हम मौजूदा रास्ते पर चलते रहे तो तापमान वृद्धि 1।5 डिग्री के स्तर से ऊपर जा पहुंचेगी और इसके परिणाम भयावह होंगे। मौजूदा यूएन प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने जलवायु संकट को अपने मैंडेट का केंद्रीय स्तंभ बनाया है।
उन्होंने कई पहलों के जरिए ये सुनिश्चित किया है कि इस मुद्दे पर नए सिरे से ध्यान दिया जाए, खासतौर पर 2019 में (इस बारे में आप इस श्रृंखला के तीसरे और अंतिम भाग में विस्तार से जानेंगे)।
2016: एक बेहतर भविष्य का खाका
21वीं सदी के पहले 15 वर्षों के दौरान संयुक्त राष्ट्र की कई गतिविधियां ‘मिलेनियम डवेलपमेंट गोल्स’ यानि 'सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों' के तहत आगे बढ़ीं, जिनमें आठ प्रमुख उद्देश्य अत्यधिक ग़रीबी रोकने, एचआईवी/एड्स के प्रसार की रोकथाम और सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए थे।
लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निर्धारित वर्ष 2015 तक काफी सकारात्मक कार्य हुआ लेकिन फिर भी एक नए दृष्टिकोण की कमी महसूस की जा रही थी। ये कमी पूरी हुई ‘2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डवेलपमेंट’ (2030 टिकाऊ विकास लक्ष्य एजेंडा) के रूप में, जिसे 2016 में आधिकारिक तौर पर शुरू किया गया। इसका उद्देश्य सहस्राब्दी लक्ष्यों को आगे बढ़ाना और अधूरे कार्यों को पूरा करना है।
इस एजेंडा के तहत लोगों के लिए, पृथ्वी के लिए और वैश्विक समृद्धि के लिए कार्य योजनाएं तैयार की गई हैं, जिनमें ग़रीबी उन्मूलन भी शामिल है, इसे संयुक्त राष्ट्र "सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती" मानता है जिसे दूर करना टिकाऊ विकास के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
17 टिकाऊ विकास लक्ष्यों की घोषणा की गई है और पांच मुख्य क्षेत्रों को कार्रवाई के लिए लक्ष्य बनाया गया है: लोग (ग़रीबी और भुखमरी उन्मूलन), पृथ्वी (भूमि क्षरण से संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर तत्काल कार्रवाई), समृद्धि (सभी के लिए समृद्ध और सुखी जीवन सुनिश्चित करना), शांति (भय और हिंसा से मुक्त समाजों को बढ़ावा देना) और साझेदारी (लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए साधन जुटाना)।
तत्कालीन महासचिव बान की मून ने लक्ष्यों पर काम की शुरुआत करते समय कहा था कि एसडीजी "मानवता के साझा दृष्टिकोण और दुनिया के नेताओं और लोगों के बीच एक सामाजिक अनुबंध का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे लोगों और धरती के लिए काम करने की एक सूची और सफलता प्राप्त करने की योजना का खाका है।”
इन लक्ष्यों को 2030 तक हासिल करना है यानी नए वर्ष 2020 में एजेंडा को पूरा करने के लिए सिर्फ 10 साल रह जाएंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने प्रक्रिया तेज करने के लिए ‘कार्रवाई के दशक’ की शुरूआत कर दी है। सितंबर 2019 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित ‘एजेंडा की प्रगति पर पहले शिखर सम्मेलन’ में इसकी घोषणा की गई।
दो दिवसीय सम्मेलन के समापन के दौरान उपमहासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा कि उनके मुताबिक शिखर सम्मेलन से तीन ठोस संदेश मिले हैं: एजेंडा को लागू करने के लिए विश्व नेताओं की नई प्रतिबद्धता; स्वीकरोक्ति कि लक्ष्य रास्ते से भटक गए हैं व उन्हें हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्प; और आगे के काम पर स्पष्टता और अधिक महत्वाकांक्षी वैश्विक कार्रवाई, स्थानीय कार्रवाई व लोगों द्वारा कार्रवाई।