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US-UK: विदेशों का नया ट्रेंड भारत की पुरानी जीवनशैली है? ब्रिटेन-अमेरिका के जेन-जी अपना रहे भारतीय साइलेंट वॉक

Thu, 20 Aug 2026 07:39 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Thu, 20 Aug 2026 07:39 AM IST
सार

अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों में जेन-जी के बीच साइलेंट वॉकिंग तेजी से लोकप्रिय हो रही है। युवा बिना फोन, संगीत, पॉडकास्ट या कॉल के चुपचाप टहल रहे हैं और इसे तनाव कम करने का तरीका बता रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि भारत में मौन और एकांत में चलने की परंपरा सदियों पुरानी है। तो क्या पश्चिम का नया ट्रेंड भारत की पुरानी जीवनशैली का आधुनिक रूप है? आइए, विस्तार से पूरे मामले को समझते हैं...

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US-UK Is the New Western Trend Actually India’s Old Lifestyle? Gen Z Embraces Silent Walking
क्या भारत की पुरानी आदत अब नया फैशन बन गई? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

अमेरिका और ब्रिटेन समेत पश्चिमी देशों में जेन-जी के बीच इन दिनों साइलेंट वॉकिंग तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसमें युवा मोबाइल फोन को दूर रखकर, ईयरफोन उतारकर और बिना संगीत या पॉडकास्ट सुने चुपचाप टहलते हैं। सोशल मीडिया पर इसे तनाव कम करने और मानसिक सुकून पाने के तरीके के रूप में पेश किया जा रहा है। हालांकि भारतीयों के लिए यह तरीका उतना नया नहीं है, क्योंकि यहां मौन और एकांत में टहलने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है।

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क्या है साइलेंट वॉकिंग और युवा इसे क्यों अपना रहे हैं?

साइलेंट वॉकिंग का मतलब बिना किसी डिजिटल गतिविधि के पैदल चलना है। इस दौरान मोबाइल, संगीत, पॉडकास्ट, ऑडियोबुक और सोशल मीडिया से दूरी बनाई जाती है। व्यक्ति केवल अपने कदमों, विचारों और आसपास के वातावरण पर ध्यान देता है। लगातार फोन और इंटरनेट से जुड़े रहने वाली युवा पीढ़ी के लिए यह तरीका कुछ समय के लिए डिजिटल दुनिया से दूरी बनाने का अवसर देता है। इसे तनाव कम करने और मन को शांत करने के एक आसान तरीके के रूप में देखा जा रहा है।

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क्या भारत में यह परंपरा पहले से मौजूद है?

भारत में मौन और एकांत को मानसिक शांति से जोड़ने की परंपरा सदियों पुरानी है। मंदिरों की परिक्रमा, मौन व्रत और विपश्यना जैसे अभ्यासों में बाहरी शोर से दूरी बनाकर आत्मचिंतन पर जोर दिया जाता है। मंदिर परिसरों और पार्कों में चुपचाप टहलना भी भारतीय जीवनशैली का हिस्सा रहा है। इसलिए पश्चिमी देशों में साइलेंट वॉकिंग का बढ़ता चलन भारतीय नजरिए से किसी बिल्कुल नई चीज के बजाय पुरानी परंपरा के आधुनिक रूप जैसा दिखाई देता है।

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क्या भारतीय युवा भी इसे अपना रहे हैं?

भारत में भी युवा बिना ईयरफोन और मोबाइल में व्यस्त हुए सार्वजनिक जगहों पर टहलते नजर आ रहे हैं। दिल्ली का लोधी गार्डन, बंगलूरू का कब्बन पार्क और मुंबई का मरीन ड्राइव ऐसे स्थान हैं, जहां लोग चहलकदमी करते हैं। हालांकि भारत में इसे हमेशा साइलेंट वॉकिंग के नाम से नहीं जाना जाता। पश्चिम में इसके लिए एक नया नाम और सोशल मीडिया ट्रेंड बन गया है, जबकि भारत में इसके पीछे की आदत और विचार लंबे समय से मौजूद हैं।

2023 में सोशल मीडिया पर कैसे लोकप्रिय हुआ यह नाम?

साइलेंट वॉकिंग की अवधारणा पुरानी है, लेकिन इसका नाम 2023 में सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हुआ। टिकटॉक क्रिएटर मैडी माओ ने बिना फोन, संगीत और पॉडकास्ट के 30 मिनट टहलने का अपना अनुभव साझा किया था। इसके बाद यह तरीका सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया। धीरे-धीरे फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, नीदरलैंड और बेल्जियम समेत कई पश्चिमी देशों के युवाओं ने इसे अपनाना शुरू कर दिया।

क्या पश्चिम का नया ट्रेंड भारत की पुरानी जीवनशैली है?

साइलेंट वॉकिंग के बढ़ते चलन में डिजिटल दुनिया से थोड़ी देर दूरी बनाने की कोशिश साफ दिखाई देती है। पश्चिमी देशों के युवा इसे तनाव और लगातार स्क्रीन देखने की आदत से राहत पाने के तरीके के रूप में अपना रहे हैं। वहीं भारत में मौन, ध्यान और शांत चहलकदमी पहले से जीवनशैली और आध्यात्मिक अभ्यासों का हिस्सा रही है। इसलिए साइलेंट वॉकिंग भारत के लिए नया चलन कम और पुरानी आदत को नए नाम और आधुनिक तरीके से अपनाने जैसा अधिक लगता है।

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