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भारतीय आईटी कंपनियों से ट्रंप शासन में हुआ है भेदभाव : रिपोर्ट

Wed, 06 Nov 2019 02:24 PM IST
Trainee Trainee वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन Published by: Trainee Trainee Updated Wed, 06 Nov 2019 02:24 PM IST
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US think tank report says Indian IT companies faced discriminated during Trump regime
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अमेरिकी थिंक टैंक की तरफ से किए गए अध्ययन की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप शासन में सबसे ज्यादा भारतीय आईटी कंपनियों के एच-1बी आवेदन खारिज किए गए हैं। साथ ही पाया गया है कि ट्रंप की प्रतिबंधक नीति के चलते इस साल एच-1बी आवेदनों को खारिज करने की दर 2015 के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ी है। मौजूदा प्रशासन पर जो अनुचित ढंग से भारतीय कंपनियों को निशाना बनाने के आरोप हैं, यह रिपोर्ट उन्हें सच साबित करती है।

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नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी की ओर से किए गए इस अध्ययन के मुताबिक 2015 में जहां छह फीसदी एच-1बी आवेदन खारिज किए जाते थे, वहीं जारी वित्त वर्ष में यह दर बढ़कर 24 फीसदी हो गई है। यह रिपोर्ट अमेरिका की नागरिकता और आप्रवास सेवा यानि यूएससीआईएस से मिले आंकड़ों पर आधारित है। देखा जाए तो 2015 में अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल और गूगल में शुरुआती नौकरी के लिए दायर एच-1बी आवेदनों में महज एक फसदी को खारिज किया जाता था। 
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वहीं 2019 में यह दर एक फीसदी से बढ़कर छह, आठ और तीन फीसदी हो गई जबकि एप्पल के लिए यह दर 2015 से अभी तक दो फासदी ही बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया कि इस अवधि में भारतीय आईटी कंपनियांं टेक महिंद्रा के लिए यह दर चार प्रतिशत से बढ़कर 41 प्रतिशत हो गई, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के लिए छह प्रतिशत से बढ़कर 34 प्रतिशत, विप्रो के लिए सात से बढ़कर 53 प्रतिशत और इंफोसिस के लिए महज दो प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत पर पहुंच गई।
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रोजगार जारी रखने के लिए दायर एच-1बी आवेदनों को खारिज किए जाने की दर भी भारतीय आईटी कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा थी। दूसरी तरफ अमेरिका की नामी कंपनियों में नौकरी जारी रखने के लिए दायर आवेदनों को खारिज किए जाने की दर कम दिखी। रिपोर्ट के मुताबिक नौकरी के लिए 2015 से 2019 के बीच आवेदन खारिज करने की दर छह फीसदी से बढ़कर 24 फीसदी हो गई 2010 से 2015 की अवधि के बीच यह आठ फीसदी हुआ करती थी।


फाउंडेशन ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन का मुख्य लक्ष्य यह रहा है कि सुशिक्षित विदेशी नागरिकों के लिए अमेरिका में विज्ञान एवं इंजीनियरिंग क्षेत्र में नौकरी करना ज्यादा मुश्किल बनाया जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप शासनकाल में रोजगार जारी रखने के लिए दायर एच1-बी के भारतीय कंपनियों के लिए किए गए आवेदनों को अमेरिकी आवेदनों के मुकाबले ज्यादा खारिज किया गया है।

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