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वैज्ञानिकों का दावा : कोरोना के टीके के कारण फेसियल पैरालिसिस का खतरा बहुत कम
Wed, 18 Aug 2021 08:37 AM IST
Kuldeep Singh
एजेंसी, वाशिंगटन
एजेंसी, वाशिंगटन
Published by: Kuldeep Singh
Updated Wed, 18 Aug 2021 08:37 AM IST
सार
- लैंसेट जर्नल रिपोर्ट के अनुसार, जिसमें व्यक्ति के चेहरे के एक तरफ लकवा की शिकायत होती है उसे बेल्स पाल्सी कहते हैं
- अमेरिका में इस्तेमाल हो रही फाइजर और मॉडर्ना एमआरएनए वैक्सीन
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
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विस्तार
कोरोना के टीके के कारण फेसियल पैरालिसिस (चेहरे में लकवा) का खतरा बहुत कम है। यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग के वैज्ञानिकों का दावा है कि इनएक्टिवेटेड वैक्सीन अगर एक लाख लोगों को लगती है तो 4.8 फीसदी लोगों को फेसियल पैरालिसिस की संभावना हो सकती है।
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लैंसेट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे बेल्स पाल्सी कहते हैं जिसमें व्यक्ति के चेहरे के एक तरफ लकवा की शिकायत होती है। राहत की बात ये है कि तकलीफ के शुरू होने के छह माह बाद बिना किसी इलाज के ठीक भी हो जाती है।
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प्रमुख शोधकर्ता प्रो. लैन चि की वोंग का कहना है कि कोरोनोवैक वैक्सीन लगने के बाद इस तरह के मामले अधिक देखने को मिल रहे हैं। अमेरिका में इस्तेमाल हो रही फाइजर और मॉडर्ना एमआरएनए वैक्सीन है। इसमें इस तरह के संकेत नहीं हैं लेकिन निगरानी जारी है।
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कोविड सिंड्रोम वाले मरीजों में अधिक मात्रा में जमते पाए गए खून के थक्के
आयरलैंड में हुए एक अध्ययन के मुताबिक लंबे समय तक कोविड सिंड्रोम वाले मरीजों में अधिक मात्रा में खून के थक्के जमते पाए गए हैं। इससे सांस लेने में दिक्कत, शारीरिक फिटनेस और थकान जैसे लक्षण कोरोना से ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक रहते हैं।
आयरलैंड की आरसीएसआई यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिसिन एंड हेल्थ साइंसेज के शोधकर्ताओं ने 50 मरीजों को अध्ययन में शामिल किया। जर्नल ऑफ थ्रोम्बोसिस एंड हेमोस्टेसिस में छपे इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि लंबे समय तक कोरोना से जूझने वाले मरीजों में खून के थक्के अधिक पाए गए।