अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध का दायरा बढ़ा, ड्रैगन ने भी की बदले की कार्रवाई
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अमेरिका और चीन के बीच एक-दूसरे के खिलाफ लगाए गए आयात शुल्क की लड़ाई अब व्यापार युद्ध में बदलती जा रही है। अमेरिका द्वारा चीनी उत्पादों पर लगाए आयात शुल्क के बाद चीन ने भी अमेरिका के 128 उत्पादों पर शुल्क बढ़ा दिया। अब अमेरिका ने चीन से आयातित 1300 उत्पादों की एक प्रस्तावित सूची घोषित करते हुए उन पर 50 अरब डॉलर की राशि का 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाया है। इसके बाद चीन ने भी बदले की कार्रवाई करते हुए 50 अरब डॉलर की राशि के 106 अमेरिकी उत्पादों पर 25 फीसदी शुल्क वृद्धि कर दी।
अमेरिका ने चीनी उत्पादों के आयात पर यह अतिरिक्त शुल्क चीन के अमेरिकी बौद्धिक संपदा की चोरी के चलते लगाया है। इन उत्पादों में सेमीकंडक्टर और सैटेलाइट से लेकर एलईडी समेत फ्लैट स्क्रीन टीवी, मेडिकल उपकरण, एयरक्राफ्ट के पुर्जें और बैटरियां शामिल हैं।
अमेरिका स्थित चीनी दूतावास ने इसकी आलोचना की। चीन ने बुधवार को कहा कि इस एकतरफा संरक्षणवादी कदम ने डब्ल्यूटीओ के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। चीन ने भी 106 अमेरिकी उत्पादों पर 25 फीसदी का आयात शुल्क लगाकर जैसे को तैसा वाला जवाब दिया है।
चीन के वित्त मंत्रालय ने बयान जारी करते हुए कहा कि चीनी स्टेट काउंसिल के चयनीय कस्टम टैरिफ कमीशन ने बदला लेते हुए 14 श्रेणियों के भीतर 50 अरब डॉलर के सोयाबीन, विमान, कार, व्हिस्की और रसायन जैसे अमेरिकी उत्पादों पर यह कार्रवाई की है। इसे अमल में लाना इस पर निर्भर करता है कि अमेरिका कब से चीनी उत्पादों पर शुल्क वृद्धि शुरू करता है। अमेरिका से चीन में सप्लाई होने वाले इन उत्पादों में शामिल हैं।
अमेरिका में भी नई नीति का विरोध
अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स ने कहा है कि अपने मकसद को पाने के लिए अमेरिकी लोगों के इस्तेमाल वाली रोजमर्रा की चीजों पर शुल्क बढ़ाना सही नहीं है क्योंकि अधिकांश रोजमर्रा की चीजें चीन से ही आती हैं।
अर्थशास्त्री जोसेफ ब्रसलस ने कहा कि अमेरिका में चीनी उत्पादों की कीमत बढ़ने से निर्माण उद्योगों और अमेरिकियों के दैनिक जीवन पर असर पड़ेगा। इन्हें नियंत्रित करने के लिए दूसरे देशों का सहारा लेना होगा और दूसरे देशों को कई रियायतें देनी होंगी। इससे अमेरिका की साख गिरेगी।
आर्थिक मंदी की कगार पर विश्व
अमेरिका यदि इसी तरह की कारोबारी नीति पर आगे बढ़ता है तो दूसरे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले जापान और यूरोपीय देश भी नेशन फर्स्ट की नीति पर काम शुरू कर देंगे। ऐसे में अमेरिका और चीन के बीच शुरू हुए कारोबारी युद्ध की आंच कई देशों तक फैल जाएगी और इसमें फंसे देशों के साथ दूसरे देशों की व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित होंगी। इससे कई देशों की राष्ट्रीय आय कमजोर होगी। यदि दो देशों का यह कारोबारी युद्ध लंबा खिंचा तो दुनिया एक और मंदी की तरफ बढ़ सकती है।