Tokyo Olympics 2021: टोक्यो ओलंपिक ने खींचा गंभीर होती शरणार्थी समस्या की ओर ध्यान
शरणार्थी टीम के खिलाड़ियों ने तैराकी, साइकिलिंग, जूडो, कुश्ती, दौड़ और कुछ अन्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इस टीम में जिन देशों के शरणार्थी थे, उनमें इराक, अफगानिस्तान, कांगो, कैमरून, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, और वेनेजुएला भी शामिल हैं...
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इस बार ओलंपिक खेलों में ध्यान का खास आकर्षण शरणार्थी टीम रही। इस टीम के लगभग 30 एथलीट यहां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा में शामिल हुए। ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में खिलाड़ियों का ये दल ओलंपिक का झंडा लेकर शामिल हुआ। ये वे खिलाड़ी हैं, जो अभी अपने देश से बाहर रहने को मजबूर हैं। इस रूप में उन्होंने यहां दुनिया के लाखों विस्थापित लोगों की नुमाइंदगी की। जिन हालात में इन खिलाड़ियों की जिंदगी गुजरी है, उसे देखते हुए उनका ओलंपिक तक पहुंचना आसान नहीं था। इसलिए उनकी लगन और मेहनत की खेलों की पूरी अवधि में तारीफ होती रही।
शरणार्थी टीम के खिलाड़ियों ने तैराकी, साइकिलिंग, जूडो, कुश्ती, दौड़ और कुछ अन्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इस टीम में जिन देशों के शरणार्थी थे, उनमें इराक, अफगानिस्तान, कांगो, कैमरून, सूडान, दक्षिण सूडान, सीरिया, और वेनेजुएला भी शामिल हैं। इनमें से कुछ खिलाड़ियों ने पांच साल पहले रियो द जनेरो ओलंपिक में भी भाग लिया था। उनमें युसरा मरदिनी भी हैं। ये सीरिया में चल रहे गृह युद्ध के कारण विस्थापित हुई शरणार्थी हैं। तैराकी में उनके प्रदर्शन की तारीफ होती रही है। जब ये अपने देश से अपनी बहन के साथ भागी थीं, तब उन्होंने तीन घंटों तक तैर कर एजियन सागर को पार किया था।
युसरा की कहानी दुनियाभर में मशहूर रही है। लेकिन ऐसी कहानी सिर्फ उनकी नहीं है। जो भी खिलाड़ी शरणार्थी टीम का हिस्सा थे, सबकी कहानी सदमा, मुसीबत और उन पर विजय पाने की दास्तां है। इन खिलाड़ियों ने दुनिया में मौजूद शरणार्थी समस्या की तरफ सबका ध्यान खींचा है।
रियो ओलंपिक के समय दुनिया में ऐसे साढ़े छह करोड़ लोग थे, जिन्हें अपने देश से जबरन विस्थापित होना पड़ा था। अब ये संख्या आठ करोड़ 20 लाख तक पहुंच गई है। टोक्यो ओलंपिंक के दौरान ये बात बार-बार कही गई कि अगर शरणार्थी किसी एक देश का हिस्सा होते, तो जनसंख्या के लिहाज से उनका देश दुनिया का 20वां सबसे बड़ा देश होता।
लोगों के शरणार्थी बनने की कई वजहें होती हैं। उनमें युद्ध, गृह युद्ध, आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा हो रही स्थितियां शामिल हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग इनमें सबसे ऩई समस्या के रूप में सामने आया है, जो लगातार गंभीर हो रहा है। कोरोना महामारी के कारण दुनियाभर में गरीबी बढ़ी है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि लोग खाना, काम या सुरक्षा की तलाश में ही शरणार्थी बनते हैं। ऐसे में मौजूदा हालात के बीच और भी ज्यादा लोगों के शरणार्थी बनने की आशंका है।
शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संस्थाओं का कहना है कि ओलंपिक खेलों के दौरान शरणार्थी खिलाड़ियों के प्रदर्शन की तारीफ करना काफी नहीं है। ना ही सिर्फ ऐसे मौकों पर उनका मनोबल बढ़ाना पर्याप्त है। असल सवाल यह है कि शरणार्थियों के वैश्विक अधिकारों की व्याख्या की जाए और उन अधिकारों की हर जगह रक्षा की जाए।
इसे अच्छी बात समझा गया है कि ओलंपिक खेलों की वजह से शरणार्थियों की समस्या की तरफ एक बार फिर से दुनिया का ध्यान गया है। लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि खेलों के खत्म होने के साथ ही ये ध्यान फिर धूमिल हो गया, तो इन खेलों से शरणार्थियों को कोई स्थायी लाभ नहीं होगा।