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चिंता: दक्षिणी ध्रुव पर ओजोन परत में उभरा अंटार्कटिक महाद्वीप के बराबर का छेद, जानें वैज्ञानिक क्यों बता रहे खतरा?

Fri, 17 Sep 2021 11:56 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, न्यूयॉर्क Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 17 Sep 2021 11:56 AM IST
सार

कॉपरनिकस के मुताबिक, पिछले हफ्ते लगातार बढ़ने के बाद अब ओजोन परत का यह छेद 1979 के बाद से उभरे 75 फीसदी ओजोन छेदों से बड़ा है। फिलहाल इसका क्षेत्रफल अंटार्कटिक से भी ज्यादा हो गया है।

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The Hole in Ozone layer over the South Pole is now bigger than continent of Antarctica
यूरोपियन यूनियन के कॉपरनिकस सर्विस ने ओजोन परत में बढ़ते छेद की तस्वीर जारी की। - फोटो : Twitter/Copernicus Atmosphere

विस्तार

दक्षिणी ध्रुव के ऊपर हर साल बनने वाला ओजोन परत का छेद इस साल सबसे बड़ा है। यूरोपियन यूनियन के कॉपरनिकस वायुमंडल निगरानी सेवा ने इसकी जानकारी दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अब ओजोन परत का यह छेद अंटार्कटिक महाद्वीप के बराबर है। आमतौर पर  दक्षिणी गोलार्द्ध में हर साल अगस्त से अक्तूबर के दौरान उभरने वाला यह छेद सितंबर के मध्य में सबसे बड़े क्षेत्र में होता है। लेकिन इस बार ओजोन परत में छेद इतना बड़ा है कि इसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। 
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कॉपरनिकस के मुताबिक, पिछले हफ्ते लगातार बढ़ने के बाद अब ओजोन परत का यह छेद 1979 के बाद से उभरे 75 फीसदी ओजोन छेदों से बड़ा है। फिलहाल इसका क्षेत्रफल अंटार्कटिक से भी ज्यादा हो गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले साल भी ओजोन परत का यह छेद सितंबर में ही अप्रत्याशित रूप से बड़ा हो गया था। तब क्षेत्रफल में तो यह आज के छेद से छोटा था, लेकिन अब तक के रिकॉर्ड में ओजोन परत का यह छेद सबसे लंबे समय तक महाद्वीप के ऊपर बने रहने वाला दर्ज हुआ।  
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अंटार्कटिक पर हर साल क्यों होता है छेद?

ओजोन परत पृथ्वी से करीब 9 से 22 मील (15-35 किमी) ऊपर मौजूद है और यह धरती को सूरज से निकलने वाली घातक अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाती है। दक्षिणी गोलार्द्ध के ऊपर होन वाला यह छेद मुख्यतः क्लोरीन और ब्रोमीन जैसे केमिकल्स के कारण होता है, जो कि सर्दियों के दौरान ऊपर समताप मंडल (स्ट्रैटोस्फियर) तक पहुंच जाते हैं। इससे अंटार्कटिक में सर्दी के दौरान ओजोन परत का नष्ट होना जारी रहता है। कुछ स्थानों पर कुल ओजोन में दो तिहाई की कमी होती है। इस गंभीर कमी के कारण ओजोन छेद बनाता है।
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41 साल पहले सामने आया था ओजोन परत कमजोर होने का मामला

अंटार्कटिक के ऊपर मौजूद ओजोन परत के गंभीर रूप से कमजोर होने का मामला 1980 के मध्य में पहली बार सामने आया था। हालांकि, इसका इस सीजन में परत का कमजोर होना मौसमी प्रक्रिया है, जो मुख्य रूप से सर्दियों और शुरुआती वसंत (अगस्त-नवंबर) में होता है। 

ओजोन के छेद को सीधे तौर पर अंटार्किट के पोलर वोर्टेक्स से भी जोड़ कर देखा जाता है। यह वो ठंडी हवाएं होती हैं, जो पृथ्वी का चक्कर लगाती हैं। वसंत के अंत में जब समताप मंडल पर तापमान बढ़ने लगता है, तो ओजोन परत का यह छेद कम होना शुरू हो जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे पोलर वोर्टेक्स कमजोर पड़ता है और आखिर में खत्म हो जाता है। दिसंबर तक ओजोन परत वापस सामान्य स्तर पर लौट आती है। 

क्या सामान्य स्तर पर लौट सकती है ओजोन परत?

कॉपरनिकस सैटेलाइट और कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिए ओजोन परत को हो रहे नुकसान पर नजर रखता है। इसके मुताबिक, ओजोन परत धीरे-धीरे ठीक हो रही है। लेकिन इसके पूरी तरह ठीक होने में 40-50 साल का समय और लग सकता है। इसकी वजह यह है कि ओजोन परत को नष्ट करने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (सीएफसी) के इस्तेमाल पर 2030 तक रोक लग सकती है। लेकिन इनका प्रभाव अभी अभी कुछ समय और रहेगा। हाल ही में 'नेचर' में छपी एक स्टडी में कहा गया था कि अगर सीएफसी का प्रयोग जल्दी नहीं रोका गया, तो वैश्विक तापमान में 2.5 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। साथ ही ओजोन लहर के भी पूरी तरह तबाह होने का खतरा पैदा हो सकता है। 
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