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नए साल में श्रीलंका बदहाल: देश पर मंडरा रहा है दिवालिया होने का खतरा

Tue, 04 Jan 2022 07:59 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 04 Jan 2022 07:59 PM IST
सार

सरकार की शाहखर्ची और टैक्स में कटौती की नीतियों ने राजकोष को खाली कर दिया है। भारी मात्र में चढ़े विदेशी कर्ज को चुकाने में देश की विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा खर्च हुआ है। देश में मुद्रास्फीति दर सहन सीमा से अधिक हो गई है...

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The financial and humanitarian crisis in Sri Lanka continues to deepen
गोटाबाया राजपक्षे - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

श्रीलंका में वित्तीय और मानवीय संकट लगातार गहरा रहा है। कई हलकों में आशंका जताई गई है कि 2022 में इस देश के सामने दिवालिया होने की स्थिति पैदा हो सकती है। इसी बीच कोरोना महामारी की नई लहर ने एक नई चुनौती पैदा कर दी है।

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शाहखर्ची और टैक्स में कटौती पड़ी भारी

नए साल के मौके पर देश की हालत के बारे में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जो विश्लेषण छपे हैं, उनके मुताबिक मौजूदा संकट की एक वजह कोरोना महामारी और उसकी वजह से पर्यटन उद्योग का ढह जाना है। लेकिन राष्ट्रपति गोतबया सरकार की कुछ नीतियों ने भी इसमें योगदान किया है। सरकार की शाहखर्ची और टैक्स में कटौती की नीतियों ने राजकोष को खाली कर दिया है। भारी मात्र में चढ़े विदेशी कर्ज को चुकाने में देश की विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा खर्च हुआ है। देश में मुद्रास्फीति दर सहन सीमा से अधिक हो गई है।

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विश्व बैंक के एक ताजा अनुमान के मुताबिक कोरोना महामारी शुरू होने के बाद से देश में पांच लाख से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं। इस रूप में पांच साल में लगभग सवा दो करोड़ की आबादी वाले इस देश ने गरीबी घटाने में जो सफलता हासिल की थी, वह सूरत पलट गई है।
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बीते नवंबर में देश में महंगाई दर 11.1 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। इसका आम जिंदगी पर बहुत बुरा असर हुआ है। बढ़ती मुश्किलों के बीच राष्ट्रपति राजपक्षे ने आर्थिक आपातकाल का एलान कर दिया। इसके तहत सेना को चावल, चीनी आदि जैसी जरूरी चीजों की उचित मूल्य पर सप्लाई करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन खबरों के मुताबिक इन उपायों से आम जन को ज्यादा राहत नहीं मिली है।

देश में विदेशी मुद्रा की कमी

वर्ल्ड ट्रेवल एंड टूरिज्म काउंसिल के मुताबिक श्रीलंका में पर्यटन उद्योग से जुड़ी नौकरियों और उससे होने वाली आमदनी का कुल अर्थव्यवस्था में योगदान 10 फीसदी है। इस उद्योग के ठहर जाने से दो लाख से ज्यादा लोगों की नौकरी चली गई है। ब्रिटिश अखबार द गार्जियन ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया है कि आर्थिक बदहाली के कारण श्रीलंकाई नौजवानों में देश से बाहर जाने की होड़ लग गई है। इसके लिए पासपोर्ट दफ्तरों पर लंबी कतारें देखी गई हैं।

जानकारों के मुताबिक श्रीलंका के सामने सबसे बड़ी समस्या विदेशी मुद्रा की कमी की है। ये कमी होने की वजह देश पर चढ़ा भारी विदेशी कर्ज है। श्रीलंका का चीन का पांच अरब डॉलर का कर्ज है। पिछले साल वित्तीय संकट का सामना करने के लिए श्रीलंका ने चीन से एक अरब डॉलर का अतिरिक्त कर्ज लिया, जिसे अब किस्तों में चुकाया जा रहा है। अगले 12 महनों में श्रीलंका और देश के निजी क्षेत्र को 7.3 अरब डॉलर का देशी और विदेशी कर्ज चुकाना है। जबकि नवंबर के आखिर में देश के विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 1.6 अरब डॉलर मौजूद थे।



इस संकट के बीच ही पिछले मई में राष्ट्रपति राजपक्षे ने देश में ऑर्गेनिक खेती को अपनाने का फैसला कर लिया। इसके तहत सभी तरह के उर्वरकों और कीटनाशकों पर रोक लगा दी गई। इससे कृषि क्षेत्र भी मुश्किल में फंस गया, जो तब तक संकट से बचा हुआ था।

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