{"_id":"60191e768ebc3e2f1f0f962a","slug":"the-fight-for-restoration-of-democracy-is-more-difficult-this-time-in-myanmar-here-you-know-why","type":"story","status":"publish","title_hn":"म्यांमार में इस बार ज्यादा मुश्किल है लोकतंत्र बहाली की लड़ाई","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
म्यांमार में इस बार ज्यादा मुश्किल है लोकतंत्र बहाली की लड़ाई
Tue, 02 Feb 2021 03:12 PM IST
Tanuja Yadav
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यंगून
Published by: Tanuja Yadav
Updated Tue, 02 Feb 2021 03:12 PM IST
विज्ञापन
आंग सान सू की
-
- 2
-
Link Copied
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
म्यांमार में हुए सैन्य तख्ता पलट के बाद ये आम राय बन रही है कि इस बार लोकतंत्र वापसी की लड़ाई ज्यादा मुश्किल होगी। इसकी एक प्रमुख वजह अंतरराष्ट्रीय स्थितियां हैं, जबकि दूसरा बड़ा कारण नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी की नेता आंग सान सू की की अब पहले जैसी छवि का ना रह जाना है।
विज्ञापन
1990 के दशक में जब चुनावों में भारी जीत के बाद सेना ने सू की को सत्ता सौंपने के बजाय उन्हें जेल में डाल दिया था, तब म्यांमार जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव में आ गया। उसके बावजूद सैन्य शासक लगभग दो दशक के बाद निर्वाचित सरकार को सत्ता सौंपने के लिए मजबूर हुए। इस पूरे दौर में दुनिया भर में सू की लोकतंत्र और मानव अधिकारों के लिए संघर्ष की प्रतीक बनी रहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन
रविवार रात हुए तख्ता पलट के बाद इस बार भी पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया तीखी रही है लेकिन चीन ने काफी नरम रुख अपनाया है। जबकि पिछले एक दशक में चीन, म्यांमार के सबसे बड़े सहायक देश के रूप में उभरा है। इसलिए विश्लेषकों की राय है कि सैन्य शासक चीन की मदद की बदौलत पश्चिमी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करने की आज ज्यादा बेहतर स्थिति में हैं।
सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने म्यांमार पर फिर से प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी। साथ ही उन्होंने म्यांमार के सैन्य जनरलों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की अपील की। ब्रिटेन और दूसरे यूरोपीय देशों के अलावा संयुक्त राष्ट्र ने भी सैन्य जनरलों से तुरंत निर्वाचित प्रतिनिधियों को सत्ता सौंपने की मांग की है। लेकिन चीन ने कहा कि उसने म्यांमार की घटनाओं पर गौर किया है। उसने कहा कि वहां के सभी पक्ष संविधान और कानूनी ढांचे के तहत अपने मतभेद हल कर सकते हैं, ताकि देश में राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता कायम रहे। इसे किसी रूप में कड़ी प्रतिक्रिया नहीं कहा जा सकता।
विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि चीन को म्यांमार की राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता से अधिक चिंता वहां किए गए अपने निवेश की है। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में म्यांमार एक अहम मुकाम है। वह नए शासकों के साथ संबंध बिगाड़ कर अपनी योजना के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करना चाहता।
वैसे विश्लेषकों ने यह भी ध्यान दिलाया है कि चीन ने आंग सान सू की के साथ गहरे रिश्ते बना लिए थे। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति उनके रुख को लेकर जब पश्चिमी देशों में सू की की कड़ी आलोचना हुई थी, तब चीन ने उनका साथ दिया था। इसलिए अनुमान लगाया है कि चीन को म्यांमार में सत्ता बदलना पसंद नहीं आया होगा।
इसके बावजूद उसने नए हालात के साथ समझौता करना अपने बेहतर समझा है। म्यांमार के आस-पास के अन्य देशों की प्रतिक्रिया भी नए शासकों को राहत देने वाली रही है। फिलीपींस, थाईलैंड और कंबोडिया ने तख्ता पलट को म्यांमार का अंदरूनी मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया है।
सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी 2015 में पहली बार सत्ता में आई थी, लेकिन कामकाज के लिहाज से उसका प्रदर्शन औसत रहा। देश में जिन राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की उम्मीद उससे जोड़ी गई थी, उस पर एनएलडी की सरकार खरी नहीं उतरी। इसकी एक वजह सत्ता पर सेना का शिकंजा कायम रहना भी रहा। जिस संविधान के तहत चुनाव हुए थे, उसमें संसद और महत्त्वपूर्ण संस्थाओं पर सेना की पकड़ कायम रखने के प्रावधान हैं, लेकिन एनएलडी की छवि सबसे ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर खराब हुई।
आरोप है कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में सेना ने रोहिंग्या मुसलमानों की बड़े पैमाने पर हत्या, गांवों में आगजनी, महिलाओं से सामूहिक बलात्कार जैसे जुल्म ढाए। इससे हजारों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी बनकर बांग्लादेश जाने को मजबूर हुए। तब दुनिया को उम्मीद थी कि अपनी छवि के मुताबिक सू ची इन घटनाओं को निंदा करेंगी और उन्हें रोकने की कोशिश करेंगी। लेकिन उनके बयानों से ऐसा लगा कि वे इन घटनाओं का बचाव कर रही हैं।
ये मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भी गया था। वहां सू ची ने कहा- ‘रखाइन प्रांत की स्थिति जटिल है, जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता। वहां नरसंहार के आरोप स्थिति की गुमराह करने वाली तस्वीर पेश करते हैं।’ ऐसे बयानों ने उनकी छवि को बहुत नुकसान पहुंचाया। इसलिए विश्लेषकों का कहना है कि पिछली बार एक ऐसी शख्सियत मौजूद थी, जिनके इर्द-गिर्द सैन्य शासन के खिलाफ संघर्ष संगठित हुआ था। जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने एकमत से समर्थन दिया था। अब उनके पक्ष में वैसा समर्थन बनना मुश्किल है।