पोलैंड और हंगरी के मसले पर साख के गहरे संकट से जूझ रहा है यूरोपियन यूनियन
यूरोपीय संसद ने अपने प्रस्ताव में राय जताई थी कि ईयू के सदस्य दो देशों- हंगरी और पोलैंड ने ईयू की कानून के राज (रूल ऑफ लॉ) सिद्धांत में आस्था का उल्लंघन किया है। संसद ने कहा था कि इन दोनों देशों को ईयू से मिलने वाले धन पर रोक लगा दी जानी चाहिए...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आपसी मतभेद बढ़ने के कारण यूरोपियन यूनियन (ईयू) की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। एक ताजा घटना के बाद अब ये आरोप लगा है कि ब्रसेल्स में बैठे ईयू के अधिकारी यूरोपीय नागरिकों के हितों पर अपने फायदे को तरजीह दे रहे हैं। कुछ मीडिया टिप्पणियों में ईयू के मकसद और उसकी दीर्घकालिक वैधता पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। बीते हफ्ते यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उरसुल वॉन डेर लियेन ने यूरोपीय संसद से पारित एक प्रस्ताव पर अमल करने से इनकार कर दिया। उन्होंने ईयू संसद के अध्यक्ष डेविड सासोली को पत्र लिख कर इसकी सूचिना दी। जबकि इस प्रस्ताव को भारी बहुमत से पास किया गया था। ईयू के पूरे ढांचे में सिर्फ यूरोपीय संसद ही जनता से निर्वाचित एकमात्र संस्था है। उसकी अवहेलना से पूरे यूरोप में बेचैनी देखने को मिली है।
यूरोपीय संसद ने अपने प्रस्ताव में राय जताई थी कि ईयू के सदस्य दो देशों- हंगरी और पोलैंड ने ईयू की कानून के राज (रूल ऑफ लॉ) सिद्धांत में आस्था का उल्लंघन किया है। संसद ने कहा था कि इन दोनों देशों को ईयू से मिलने वाले धन पर रोक लगा दी जानी चाहिए। प्रस्ताव में दोनों देशों पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने और समलैंगिक और ट्रांसजेंडर समुदायों से भेदभाव करने का उल्लेख किया गया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि इन दोनों बातों का पालन ईयू की सदस्यता की बुनियाद हैं।
इन दोनों मुद्दों पर हंगरी और पोलैंड के साथ ईयू का तनाव कई महीनों से चल रहा है। ईयू के कोरोना राहत पैकेज के वितरण के सवाल पर तनाव चरम पर पहुंच गया था। दोनों देशों ने तब अपने वीटो के इस्तेमाल की धमकी दी थी। इसके पहले ईयू ने कहा कि ‘कानून के राज’ सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले देशों को राहत पैकेज से धन नहीं दिया जाना चाहिए। उसके बाद ईयू ने दोनों देशों के साथ बातचीत कर समाधान निकाला। उसमें हंगरी और पोलैंड ने ईयू नियमों का पालन करने का वादा किया था।
लेकिन यूरोपीय संसद से पारित प्रस्ताव में कहा गया कि दोनों देशों ने अपने वादे को पूरा नहीं किया है। लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में यूरोपीय कानून के प्रोफेसर रोनन मैक्री ने अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ‘जब हंगरी और पोलैंड के साथ ईयू की सहमति बनी थी, तब उनके खिलाफ कार्रवाई के इच्छुक देशों ने उम्मीद की थी कि ईयू नियमों की व्यापक नजरिए से व्याख्या करेगा। लेकिन अब जो उसने किया है, वह इस बात का संकेत है कि ईयू संभल कर चलेगा।’
ईयू के इस नजरिए से यूरोपीय संसद के कई सदस्य भड़क उठे हैं। उन्होंने वॉन डेर लियेन पर ईयू सिद्धांतों के उल्लंघन में सहभागी बनने का आरोप लगाया है। मसलन, नीदरलैंड्स से निर्वाचित सदस्य सोफी इन्ट वेल्ड ने कहा कि यूरोपीय आयोग यह भूल गया है कि वह यूरोपीय संसद के प्रति जवाबदेह है। कुछ सदस्यों ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि अपने निजी हित साधने के लिए डेर लियेन ईयू के 27 सदस्य देशों की सरकारों को खुश रखने को प्राथमिकता दे रही हैं। इसके लिए वे जन भावना की अवहेलना कर रही हैं।
वेल्ड ने कहा कि वॉन डेर लियेन अपने पद पर इसीलिए हैं कि सरकारों ने उन्हें समर्थन दिया है। इसलिए वे उनका कर्ज उतार रही हैं। जर्मनी से निर्वाचित ग्रीन पार्टी के सदस्य डैनियल फ्रेउंड ने कहा है कि आयोग के अधिकारियों के लिए सदस्य देशों की सरकारों के खिलाफ कार्रवाई करना मुश्किल बना रहता है, क्योंकि उन्हें अपने लिए हमेशा सरकारों के समर्थन की जरूरत पड़ती है। इन टिप्पणियों से इस मसले पर पैदा हुई कड़वाहट सामने आई है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि इस विवाद का ईयू की सेहत और भविष्य पर बहुत खराब असर होगा।