अफगानिस्तान: अभी से अपने पुराने रंग में लौट आया है तालिबान, किए वादों से पलटने में है माहिर
तालिबान का अमीरात की पुरानी व्यवस्था बहाल करने में यकीन बना हुआ है। इस व्यवस्था में धार्मिक नेता अमीर यानी सर्वोच्च शासक होता है। माना जाता है कि उसे शासन करने का अधिकार अल्लाह की तरफ से मिला हुआ है। इसलिए उसके आदेशों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। न ही उसका चुनाव लोकतांत्रिक ढंग से होता है...
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अफगानिस्तान के कुल 364 जिलों में से कम से एक तिहाई पर अब तक तालिबान कब्जा जमा चुका है। वहां से मिल रही रिपोर्टों से इस बात का खंडन होता है कि पिछले 20 साल के अनुभव और नेतृत्व की नई टेक सेवी (आधुनिक तकनीक का कुशलता से इस्तेमाल करने वाली) पीढ़ी के उभार के साथ तालिबान का नजरिया अब बदल गया है।
अफगानिस्तान के दो रेडियो स्टेशनों- रेडियो लिबर्टी और रेडियो सलाम वतनदार- की ताजा रिपोर्टों के मुताबिक देश के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी इलाकों में कुछ जगहों पर तालिबान ने हर परिवार को निर्देश दिया है कि वे अपने घर की एक युवती का निकाह तालिबान लड़ाकुओं से करवा दें। उसने यह नियम भी लागू किया है कि महिलाएं बिना किसी पुरुष को साथ लिए घर से बाहर ना जाएं। साथ ही पुरुषों को दाढ़ी बढ़ाने और मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ने का हुक्म भी उसने दिया है।
अफगानिस्तान सरकार की एजेंसी, एडिमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म एंड सिविल सर्विस कमीशन ने बताया है कि अपने कब्जे वाले इलाकों में तालिबान ने सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर को नष्ट कर दिया है और सामाजिक सेवा के कार्यों पर रोक लगा दी है। इस वजह से एक करोड़ 30 लाख लोगों को अब बिना सार्वजनिक सेवाओं के जीना पड़ रहा है।
जानकारों के मुताबिक ताजा संकेतों से साफ है कि तालिबान का अमीरात की पुरानी व्यवस्था बहाल करने में यकीन बना हुआ है। इस व्यवस्था में धार्मिक नेता अमीर यानी सर्वोच्च शासक होता है। माना जाता है कि उसे शासन करने का अधिकार अल्लाह की तरफ से मिला हुआ है। इसलिए उसके आदेशों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। न ही उसका चुनाव लोकतांत्रिक ढंग से होता है।
पाकिस्तानी पत्रकार अहमद राशिद ने जर्मन मीडिया डॉयचे वेले से कहा- ‘क्या बदला है? कुछ भी नहीं। तालिबान का लोकतंत्र में भरोसा नहीं है। वह चाहता है कि अफगानिस्तान सरकार गिर जाए, ताकि वह देश पर कब्जा करके फिर से अपना सिस्टम लागू कर सके।’
टीकाकार शेर जान अहमदजई ने वेबसाइट एशिया टाइम्स में लिखी एक टिप्पणी में कहा है- ‘दशकों तक अफगानिस्तान का अध्ययन करने के दौरान मेरे सामने एक भी ऐसा विश्वसनीय साक्ष्य नहीं आया, जिससे लगे कि तालिबान ने किसी उस समझौते का पालन किया है, जिस पर उसने दस्तखत किए थे। ऐसी भी घटनाएं हुई हैं, जब बैठक के लिए बुलाए गए अपने विरोधियों की उसने हत्या तक कर दी। उसने वादा किया था कि लड़कियों की शिक्षा में वह बाधा नहीं डालेगा। लेकिन बाद में वह इससे मुकर गया।’
पर्यवेक्षकों का कहना है कि पिछले साल तालिबान ने अमेरिका से हुए समझौते में वादा किया था कि लौटते अमेरिकी फौजियों पर वह हमला नहीं करेगा। अब तक उसने इस वादे का पालन किया है। लेकिन अफगानिस्तान सरकार के साथ चल रही उसकी वार्ता में युद्धविराम या सत्ता साझा करने के मसलों पर उसका कोई समझौता नहीं हुआ है। पर्यवेक्षकों ने ध्यान दिलाया है कि तालिबान के पिछले शासन के समय अफगानिस्तान में आतंकवादियों को पनाह दी गई थी। उन आतंकवादियों ने अमेरिका सहित दुनिया में कई जगहों पर हमले किए। इन दहशतगर्दों में अल-कायदा और उसका मुखिया ओसामा बिन लादेन भी था। अब अंदेशा जताया जा रहा है कि तालिबान का फिर से काबुल पर कब्जा हुआ, तो अफगानिस्तान फिर से आतंकवादियों का अड्डा बन सकता है।