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Sri Lanka Crisis: कैसे कार्यकर्ताओं के एक छोटे समूह ने श्रीलंका में राजपक्षे परिवार को सत्ता से बेदखल कर दिया? जानें सबकुछ

Wed, 13 Jul 2022 03:54 AM IST
देव कश्यप वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, कोलंबो। Published by: देव कश्यप Updated Wed, 13 Jul 2022 03:54 AM IST
सार

अर्थव्यवस्था की खस्ताहाल हालत, जनता की पहुंच से खाने-पीने की चीजों का दूर होना और राजपक्षे परिवार का सत्ता से न जाना लोगों के गुस्से का कारण बना।

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Sri Lanka Crisis Know How a band of activist helped bring down Sri Lankan Government
श्रीलंका संकट। - फोटो : Facebook@Chameera Dedduwage

विस्तार

श्रीलंका में प्रदर्शनकारियों का विरोध लगातार जारी है। इस बार सभी प्रदर्शनकारी आर-पार के मूड में दिख रहे हैं और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के घरों में डेरा डाले हुए हैं। इन सभी का कहना है कि जब तक हमारी मांगें नहीं मान ली जाती तब तक हम लोग यहां से हटने वाले नहीं है। लेकिन ये सब अचानक नहीं हुआ, इसमें देश के कुछ आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका है। आइए जानते हैं कि कैसे कार्यकर्ताओं के एक छोटे समूह ने श्रीलंका की सरकार को गिराने में अपनी भूमिका निभाई...

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समुद्र तट के किनारे बने तंबू के शिविर में बनी योजना
जून में कुछ दर्जनभर कार्यकर्ताओं ने कोलंबो में एक समुद्र तट के किनारे बने तंबू के शिविर में नियमित रूप से मिलना शुरू किया और घंटों तक छोटी-छोटी बैठकों में इस बात पर मंथन करना शुरू किया कि कैसे श्रीलंका के ध्वजांकित विरोध आंदोलन को पुनर्जीवित किया जाए। इस समूह में एक कैथोलिक पादरी, एक डिजिटल रणनीतिकार और एक लोकप्रिय नाटककार शामिल थे और यह आंदोलन उनकी बेतहाशा उम्मीदों से परे सफल माना जा रहा है।

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कोलंबो में हजारों लोग सड़कों पर उतरे
कुछ ही हफ्तों में कोलंबो में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। शुरुआत में पुलिस के साथ झड़प के बाद प्रदर्शनकारियों ने प्रमुख सरकारी भवनों और आवासों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद प्रचंड बहुमत से चुने गए राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे और उनके प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को पद छोड़ने का वादा करना पड़ा।
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एक प्रमुख विज्ञापन फर्म में एक डिजिटल रणनीतिकार और सामाजिक कार्यकर्ता चमीरा डेडुवागे ने कहा कि "मैं अभी भी इस आंदोलन को जारी रखने की कोशिश कर रहा हूं।" चमीरा उस टीम का हिस्सा हैं जिन्होंने विद्रोह को व्यवस्थित करने में मदद की। डेडुवागे ने कहा कि "लोगों को पुलिस, विशेष कार्यबल और सेना के प्रतिरोध को तोड़ना पड़ा। यह उन तथ्यों का परिणाम है कि लोग अपनी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं और बिना आकांक्षाओं के जीने को मजबूर हो गए हैं।" उन्होंने विरोध प्रदर्शन की सफलता पर कहा कि "यह 50 प्रतिशत पूर्वचिंतन और समन्वय का फल था, अन्य 30 प्रतिशत लोगों की इच्छा और 20 प्रतिशत भाग्य से हुआ।

'अरागलया' आंदोलन से कुर्सी छोड़ने को मजबूर हुए नेता
साक्षात्कारों में, उन छोटी बैठकों के दिग्गजों ने बताया कि कैसे उन्होंने आंदोलन में नई जान डालने के लिए एक बहु-आयामी अभियान पर सहमत हुए, जिसे व्यापक रूप से "अरागलया" या सिंहल में "संघर्ष" के रूप में जाना जाता है।

चमीरा ने कहा, "श्रीलंका के लोगों ने गोटबाया राजपक्षे पर से अपना भरोसा पूरी तरह खो दिया है। वे उसे एक विश्वासघाती के रूप में देखते हैं। हम केवल यह चाहते हैं कि कोई भी राजपक्षे परिवार का सदस्य सरकार में न रहे और उनमें से प्रत्येक को उनके अपराधों की सजा देने के लिए न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए। विशेष रूप से वित्तीय अपराध के लिए ऐसा किया जाना चाहिए।" उन्होंने कहा, "गोटाबाया ने अभी तक इस्तीफा नहीं दिया है। और हमें यकीन नहीं है कि ऐसा वास्तव में होगा।"

मार्च में हुई थी आंदोलन की शुरुआत
आंदोलन की शुरुआत मार्च में हुई थी, जब हजारों लोग लंबी बिजली कटौती और बढ़ती कीमतों पर अपना गुस्सा निकालने के लिए सड़कों पर उतरे थे। आंदोलनकारी राजपक्षे परिवार पर भी पद को छोड़ने का दबाव बना रहे थे जोकि पीछे 20 वर्षो से देश की सत्ता में अहम किरदार निभा रहे है।

नौ मई को, राजपक्षे के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे (उस समय प्रधानमंत्री के रूप में कार्यरत) ने पद छोड़ दिया था। नौ जून को ही छोटे भाई बासिल राजपक्षे ने वित्तमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसलिए, 'अरागलया' के कार्यकर्ताओं ने नौ जुलाई का दिन चुना, इसी दिन वे राष्ट्रपति को बेदखल करने की उम्मीद कर रहे थे।

घर-घर प्रचार अभियान चलाया गया
तीन उपस्थित लोगों के अनुसार, ऑनलाइन आंदोलन, राजनीतिक दलों, श्रमिक संघों और छात्र समूहों के साथ बैठकें और घर-घर प्रचार अभियान चलाया गया ताकि अधिक से अधिक लोग आंदोलन का हिस्सा बन सके। अर्थव्यवस्था की खस्ताहाल हालत, जनता की पहुंच से खाने पीने की चीजों का दूर होना और राजपक्षे परिवार का सत्ता से न जाना लोगों के गुस्से का कारण बना।

9 जुलाई को कोलंबो में भारी भीड़ जमा हो गई
ट्रेनों, बसों, लॉरी और साइकिल पर सवार होकर, या पैदल चलते हुए, शनिवार (9 जुलाई) को कोलंबो में भारी भीड़ जमा हो गई, जो सरकारी भवनों की सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षा बलों से उलझने तक के लिए तैयार थी। कोलंबो के किला इलाके में उमड़ी भीड़ ने "गोटा गो होम!' का नारा लगाया। इसके बाद वे जल्दी से राष्ट्रपति के आवास में घुस गए और 2.5 किमी (1.6 मील) दूर प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास में भी प्रवेश करना शुरू कर दिया।

लगातार गंभीर होते हालातों को देखते हुए घबराये राजपक्षे और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को अज्ञात सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया था, और चंद घंटों के भीतर दोनों ने एक सर्वदलीय अंतरिम सरकार चुनने के लिए इस्तीफे देने की घोषणा कर दी। यदि गोटबाया राजपक्षे बुधवार (13 जुलाई) को वादे के अनुसार, इस्तीफा दे देते हैं तो पद छोड़ने वाले वे पहले श्रीलंकाई राष्ट्रपति बन जाएंगे।

सोशल मीडिया की भी रही भूमिका
अरागलया कार्यकर्ताओं की टीम का मुख्य हिस्सा रहे नाटककार रुवांथी डी चिकेरा ने कहा कि "मुझे लगता है कि यह इस देश में सबसे अभूतपूर्व भीड़ थी। एक पूर्ण विराम।" डिजिटल रणनीतिकार, डेडुवेगे ने कहा कि श्रीलंका में लगभग 50 लाख घर औरआठ लाख सक्रिय फेसबुक खाते हैं, जिसने ऑनलाइन तरीके से प्रदर्शनकारियों तक पहुंचने का एक बेहद प्रभावी तरीका बनाया।

जुलाई की शुरुआत में, समूह के सोशल मीडिया संदेशों को प्राप्त करने वालों में से एक सत्य चरित अमरतुंगे थे, जो कोलंबो से लगभग 20 किमी दूर मोरातुवा में रहने वाले एक मार्केटिंग पेशेवर हैं, जिन्होंने पहले भी सरकार विरोधी विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया था। 35 वर्षीय चरित ने दो जुलाई को व्हाट्सएप के माध्यम से प्राप्त एक पोस्टर प्राप्त किया, जिसमें स्थानीय भाषा में “द कंट्री टू कोलंबो, नौ जुलाई” लिखा था।उन्होंने इसे अपने निजी फेसबुक पेज पर अपलोड किया था। उस रात उन्होंने अपने स्तर पर एक कैंपेन शुरू किया, जिससे हजारों लोग कोलंबो की सड़कों तक पहुंचे।

आठ जुलाई को लगा दिया गया था कर्फ्यू
आयोजकों के मुताबिक, पुलिस द्वारा आठ जुलाई को कर्फ्यू लगा दिया गया था जिससे कई साथी गिरफ्तारी के डर से अपने घर लौट गए थे।कार्यकर्ता समूह का हिस्सा रहे कैथोलिक पादरी जीवनंत पीरिस ने बताया कि उन्हें चिंता थी कि कर्फ्यू के कारण अगले दिन केवल कुछ हजार लोग ही आ सकेंगे। ईंधन की कमी ने परिवहन से आने वाले लोगों की संभावनाओं को भी चोट पहुंचाई थी। जीवनंत पीरिस ने बताया, “हमें ईमानदारी से इन सभी प्रतिबंधों के दौरान केवल 10,000 लोगों के आने की उम्मीद थी।"

हालांकि, कमर तोड़ महंगाई, ईंधन की कमी और ब्लैक आउट से त्रस्त लोगों ने कोलोंबो की सड़कों पर सैलाब ला दिया, जिससे राजपक्षे परिवार को सत्ता से बेदखल होना पड़ रहा है।

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