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मुगाबे को सत्ता से 'उखाड़ने वाले' मनंगाग्वा कौन हैं?

Wed, 22 Nov 2017 02:05 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Wed, 22 Nov 2017 02:05 PM IST
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Zimbabwe president robert mugabe Out from power becouse of Manangachua
रॉबर्ट मुगाबे
जिम्बाब्वे में यह बात किसी से छिपी नहीं थी कि उपराष्ट्रपति एमर्सन मनंगाग्वा राष्ट्रपति मुगाबे की जगह लेना चाहते हैं। जानू-पीएफ पार्टी और सरकार में बड़ा ओहदा देकर राष्ट्रपति मुगाबे ने भी मनंगाग्वा की हसरतों को हवा दी, लेकिन जैसे ही मामला अपनी पत्नी और मनंगाग्वा के बीच चुनाव का आया तो मुगाबे ने मनंगाग्वा को कथित तौर पर दरवाजा दिखा दिया।
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यह मनंगाग्वा से बर्दाश्त नहीं हुआ। वे वापस लौटने का दावा करके देश से बाहर चले गए। सेना में उनकी अच्छी साख थी। इसलिए देशद्रोह के आरोप में उनकी बर्ख़ास्तगी के तुरंत बाद सेना हरकत में आ गई। मनंगाग्वा को जिम्बाब्वे में एक शातिर नेता के तौर पर देखा जाता है। सियासी हलकों में उन्हें क्रोकोडाइल (मगरमच्छ) के नाम से बुलाया जाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि मनंगाग्वा को जिम्बाब्वे के लोगों का भारी समर्थन हासिल हो। कोई नहीं मानता कि 71 साल के मनंगाग्वा के आने से मानवाधिकार हनन के मामलों में कोई कमी आएगी।
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कौन हैं एमर्सन मनंगाग्वा

चतुर राजनीतिज्ञ माने जाने वाले मनंगाग्वा को क्रोकोडाइल यानी मगरमच्छ के नाम से बुलाया जाता है। उन्होंने चीन और मिस्त्र में सैन्य ट्रेनिंग ली। मनंगाग्वा ने 1970 में जिम्बाब्वे की आजादी की लड़ाई को दिशा दिखाई। 1980 में देश के अंदर चल रहे संघर्ष के दौरान मनंगाग्वा की बड़ी भूमिका रही हालांकि उन्होंने हजारों नागरिकों की मौत की जिम्मेदारी सेना पर डाल दी। मनंगाग्वा को सेना, खुफिया एजेंसियों और जानू-पीएफ के बीच की कड़ी माना जाता है।

'पार्टी के लिए पैसा मनंगाग्वा जुटाते हैं'

Zimbabwe president robert mugabe Out from power becouse of Manangachua
रॉबर्ट मुगाबे
2008 के चुनाव के बाद विपक्षी समर्थकों पर हुए हमलों के पीछे मनंगाग्वा का हाथ माना जाता है। जिम्बाब्वे में आज़ादी की जंग में शामिल रहे लोगों की हमेशा से सत्ता पर पकड़ रही है। इसलिए सेना को डर था कि अगर मुगाबे की पत्नी ग्रेस सत्ता में आईं तो सरकार में सेना की स्थिति कमजोर हो जाएगी। जब जनरल कोंस्टेनटिनो चिवेंगा ने मुगाबे को आजादी की लड़ाई में शामिल रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई न करने की चेतावनी दी तो उसे मनंगाग्वा की बर्खास्तगी से जोड़कर देखा गया।


मनंगाग्वा का जन्म विशावाने में हुआ और वे जिम्बाब्वे के सबसे बड़े समुदाय शोना के कारंगा समूह से आते हैं। कारंगा शोना समुदाय का सबसे बड़ा समूह हैं और कुछ लोग मानते हैं कि 37 साल के इंतजार के बाद अब किसी कारंगा को सत्ता मिलनी चाहिए। मुगाबे जेजेरू समूह के हैं। 2001 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक जानू-पीएफा की सभी व्यापारिक गतिविधियां मनंगाग्वा ही संभालते हैं। इसमें वे फैसले भी शामिल हैं जो जिम्बाब्वे की सेना और व्यापारियों ने कॉन्गो में उठाए।

कांगो में क्या हुआ

डीआर कांगो विवाद के दौरान जिम्बाब्वे की सेना वहां की सरकार की मदद करने गई। लेकिन और बहुत से देशों की तरह उन पर भी आरोप लगा कि उन्होंने इस मौके का इस्तेमाल कांगो के कुदरती संसाधनों जैसे हीरे, सोना और बाक़ी खनिजों को लूटने में किया। मनंगाग्वा जानू-पीएफ के लिए पैसे जुटाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद जाम्बिया में पले-बढ़े और वकालत पढ़े मनंगाग्वा अपनी पार्टी में ही सबके चहेते नहीं हैं। मनंगाग्वा के साथ आजादी की लड़ाई में शामिल रहे एक पू्र्व सैनिक ने बताया कि "वह बेहद क्रूर आदमी हैं। बेहद क्रूर।"

'माचिस नहीं जली तो बची जान'

Zimbabwe president robert mugabe Out from power becouse of Manangachua
रॉबर्ट मुगाबे
जानू-पीएफ के एक नेता ने मनंगाग्वा का भविष्य पूछने पर कहा, "आपको लगता है कि मुगाबे बुरे हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि उनके बाद आने वाला शख्स उनसे भी बुरा हो सकता है?" साल 2000 में क्वेक्वे के चुनाव में मनंगाग्वा को हराने वाले ब्लेसिंग चेबुंडो भी मानते हैं कि मनंगाग्वा शांति पसंद आदमी नहीं हैं। चेबुंडो ने बताया कि प्रचार के दौरान एक बार जानू-पीएफ के समर्थकों ने उन्हें अगवा कर लिया और जलाकर मारने की कोशिश की। चेबुंडो की जान तब बची जब उन्हें पेट्रोल से नहलाने वाले लड़के माचिस नहीं जला पाए।

लोगों को रिश्तेदारों की कब्र पर नचाया?
मनंगाग्वा की ऐसी छवि 1980 में हुए गृहयुद्ध में बनी जब मुगाबे की जानू पार्टी और जोशुआ एनकोमो की जपु पार्टी के बीच संघर्ष शुरू हुआ। तब के रक्षा मंत्री मनंगाग्वा केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईओ) के भी अध्यक्ष थे। सीआईओ ने सेना के साथ मिलकर जपु को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि बाद में दोनों दलों ने मिलकर जानू-पीएफ बना ली, लेकिन तब तक जपु के समर्थक हजारों निर्दोष लोगों की जान जा चुकी थी। बताया जाता है कि उस दौरान गांव वालों से उनके रिश्तेदारों की कब्र पर नाचने और मुगाबे के समर्थन के नारे लगाने के लिए कहा जाता था। 1987 में हुए समझौते के बाद भी ये जख्म भरे नहीं हैं और माना जा रहा है कि मनंगाग्वा के लिए उन इलाकों के लोगों और पार्टी अधिकारियों का समर्थन हासिल करना मुश्किल होगा।

क्या मनंगाग्वा को फर्क नहीं पड़ता?
सेना मनंगाग्वा को उस शख्स के तौर पर याद करती है जिसने चीन और मिस्त्र में मिले सैन्य प्रशिक्षण के बाद 1970 की आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया। मनंगाग्वा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीजिंग स्कूल ऑफ आइडियोलॉजी में भी रह चुके हैं। उनके आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक 1965 में रोडेशिया सरकार ने एक ट्रेन उड़ाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया और इतना मारा कि उनके एक कान से सुनाई पड़ना बंद हो गया। उन्हें सर के बल लटका कर रखा जाता था और वे कई दिन तक बेहोश रहते थे।

विरोधियों पर कहर बरपाया?

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रॉबर्ट मुगाबे, मनंगाग्वा
उस वक्त उनकी उम्र 21 साल से कम थी इसलिए उन्हें मारा नहीं गया, लेकिन दस साल के लिए जेल में डाल दिया गया। मनंगाग्वा के उस वक्त के एक दोस्त ने नाम न छापने की शर्त पर कहा "इतनी कम उम्र में ही उन्होंने ऐसी चीजें देख लीं शायद इसलिए उन्हें फर्क नहीं पड़ता।"

मनंगाग्वा बाद में जानू-पीएफ का प्रशासन संभालने लगे, लेकिन उन्हें उस पद से 2005 में हटा दिया गया क्योंकि उन पर अपने चहेतों को पार्टी में बड़ी जगहों पर रखने का आरोप था। इसी के बाद यह खबरें आने लगीं कि मनंगाग्वा उपराष्ट्रपति बनने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। 2008 में जब मुगाबे राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर हार गए तो खबर आई कि मनंगाग्वा ने सेना और खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर विरोधी समर्थकों पर ऐसा कहर बरपाया कि सैकड़ों लोगों की मौत हो गई और हजारों घर छोड़कर भाग गए। नतीजा - मुगाबे के खिलाफ खड़े मॉर्गन स्वींगिराई ने दूसरे दौर में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और मुगाबे फिर से राष्ट्रपति बन गए। मनंगाग्वा ने इन आरोपों पर कभी कुछ नहीं कहा।

जहरीली आइसक्रीम?

ग्रेस मुगाबे के साथ मनंगाग्वा के मुकाबले में तब अजीब मोड़ आ गया जब इस साल अगस्त में राष्ट्रपति मुगाबे की एक सियासी रैली में मनंगाग्वा बीमार पड़ गए और उन्हें हवा के रास्ते दक्षिण अफ्रीका ले जाना पड़ा। उनके समर्थकों ने आरोप लगाया कि जानू-पीएफ ने उन्हें आइसक्रीम में जहर देकर मारने की कोशिश की। आइसक्रीम ग्रेस मुगाबे की डेरी से आई थी। लेकिन फिलहाल के घटनाक्रम को देखकर लगता है कि अगर ग्रेस पर लगाए जा रहे आरोपों में कोई सच्चाई है तो शायद ग्रेस ने गलत आदमी से अदावत मोल ले ली।
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