जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति मुगाबे और दूसरे वामपंथी नायक
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यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेटस ने 2008 में जब रॉबर्ट मुगाबे को बाईस साल पहले दी गई ऑनरेरी डिग्री रद्द करने का फैसला किया, तब उसने पाया कि जिम्बाब्वे के तानाशाह को एक समय ‘लोकतंत्र और सुधार की ताकत’ के तौर पर देखा जाता था। जिम्बाब्वे में श्वेतों का साम्राज्य खत्म करने के बाद सत्ता में आए मुगाबे ने-जो रक्तहीन राजनीतिक सुधार के जरिये संभवतः इस सप्ताह सत्ता से बाहर हो जाएं- उस डेबेले जनजाति के खिलाफ अत्याचार और युद्ध शुरू किया, जो उनकी प्रतिद्वंद्वी थी। 1983 में द टाइम्स के रिपोर्टर एलेन कॉवेल की रिपोर्टों के मुताबिक, मुगाबे ने तब अपनी प्रतिद्वंद्वी जनजाति के लोगों से वादा किया था कि एक बार उनके तमाम राजनीतिक विरोधी खत्म हो जाएं, तो वह उन्हें आगे बढ़ाएंगे। कॉवेल की तब की रिपोर्ट में डेबेले जनजाति की एक बुजुर्ग औरत का हवाला दिया गया है, जो कहती हैं, ‘हमारे गांव में सेना घुस आई। उन्होंने हमारी झोपड़ियां जला दीं और उन युवाओं को बाहर बुलाया, जो सेना की नौकरी छोड़कर घर बैठ गए थे। फिर सैनिकों ने उनमें से पंद्रह युवाओं को मार डाला।’
भारत में क्यों नहीं हो सकता तख्तापलट?
मुगाबे ने नृशंसता से लोगों की हत्या करवाई; 1980 के दशक में उसने एक बार में 20,000 लोगों को अपनी फिफ्थ ब्रिग्रेड के जरिये मरवा डाला था। उसके बाद भी सामूहिक कब्रों की लगातार शिनाख्त हुई। मुगाबे के बर्बर तौर-तरीकों में कोई रहस्य नहीं था। वास्तविक रहस्य यह है कि पश्चिम के प्रगतिशील और उदारवादी लोग बार-बार मुगाबे पर क्यों यकीन करते रहे और उन्होंने उनके प्रति जनता के मोहभंग पर यकीन क्यों नहीं किया। ऐसे उदार लोग देश की आजादी और मनुष्य की आजादी के बारे में आखिर कब तक भ्रमित होते रहेंगे? सच्चाई यह है कि मुगाबे के कुशासन के बारे में पश्चिम की सरकारों को बीस साल बाद पता चला और उन्होंने उनसे अपने रिश्ते तोड़े। इस शताब्दी की शुरुआत में मुगाबे ने जिम्बाब्वे की अर्थव्यवस्था को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। श्वेत जमींदारों को उनके फार्मलैंड से खदेड़ दिए जाने का असर कृषि उत्पादन पर पड़ा और भूख जिम्बाब्वे की सच्चाई बन गई। इससे अनेक श्वेत किसानों को भी जिम्बाब्वे से जाना पड़ा। मुगाबे के इस तानाशाही तौर-तरीके की भी पश्चिम ने निंदा नहीं की। उल्टे उनकी तारीफ की गई और उनसे माफी मांगी गई।
2013 में ब्रिटेन के वाम रुझान वाले अखबार इंडिपेंडेंट ने यह सुर्खी लगाई-’ धन्यवाद मुगाबे : जिम्बाब्वे में जबरन जमीन के दोबारा आवंटन से बड़ा विवाद पैदा हुआ-लेकिन इसने हजारों छोटे किसानों का जीवन बदल दिया।’
मुगाबे जैसे और तानाशाह
जिम्बाब्वे इतने लंबे समय से विपन्न है कि इसके लिए मुगाबे के अलावा किसी और को जिम्मेदार ठहराना अनुचित होगा। इसके बावजूद मुगाबे से माफी मांगने वालों और उनके प्रशंसकों की संख्या कम नहीं रही। जिम्बाब्वे की त्रासदी दरअसल विचारधारा के विफल प्रयोगों की उत्तर-औपनिवेशिक त्रासदी है। विदेशियों ने जिम्बाब्वे में हुए इन प्रयोगों को सराहा, लेकिन जब वे प्रयोग विफल साबित हुए, तब उन लोगों ने अपना ध्यान कहीं और केंद्रित कर लिया। जबकि उन विदेशियों को भी समझना चाहिए था कि जिम्बाब्वे की इस स्थिति के लिए कमोबेश वे भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने मुगाबे का लगातार साथ दिया। दुनिया के निर्धनतम देशों की बेहतरी के लिए काम होना चाहिए, उन्हें उन पश्चिमी विशेषज्ञों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, जो गरीब अफ्रीकी देशों के बारे में कुछ नहीं जानते।
(यह लेख ब्रेट स्टीफेंस ने द न्यूयॉर्क टाइम्स के लिए लिखा है)