आखिर गद्दाफी को आज भी मसीहा क्यों मानते हैं लोग?
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2011 में लीबिया में मोआमर गद्दाफी का तख्तापलट हुआ था और अक्टूबर महीने में नैटो के हमले में गद्दाफी मारे गए थे। तब इस देश में जश्न मनाने की तस्वीरें सामने आईं थीं, लेकिन गद्दाफी की मौत के चार साल बाद भी कई लोग हैं जो गद्दाफी को मसीहा मानते हैं।
मुझे यह तलाशने के लिए घाना के बहुत अंदर नहीं जाना पड़ा। घाना की राजधानी अकरा में रहते हैं करीम मोहम्मद। 45 साल के करीम पेशे से दर्जी हैं जो गद्दाफी की मौत से पहले तीन साल तक लीबिया में रह चुके हैं।
करीम शादीशुदा हैं और उनके तीन बच्चे भी हैं। वे छह बेडरूम वाले मकान में रहते हैं। ये मकान इन्होंने लीबिया में कमाए पैसों से बनाया है।
'अमेरिका में लोग पुलों के नीचे सोते हैं'
उन्होंने बताया, "लीबिया में हर कोई खुश था। अमरीका में लोग पुलों के नीचे सोते हैं लेकिन लीबिया में कोई सड़क पर, पुल के नीचे नहीं सोता था। कोई भेदभाव नहीं था, कोई समस्या नहीं थी। वहां अच्छे काम का अच्छा पैसा मिलता था। मेरे जीवन पर गद्दाफी का एहसान है। वे अफ्रीका के मसीहा थे।"
घाना में गद्दाफी के बारे में ऐसी राय रखने वाले करीम अकेले नहीं हैं। इस बातचीत के दौरान ही दो अन्य लोग चर्चा में शामिल हो गए।
35 साल के एक युवा कंस्ट्रक्शन वर्कर मुस्तफा आब्देल मोमिन सात सालों तक लीबिया में रहकर आए हैं। वे कहते हैं, "गद्दाफी एक शानदार शख्स थे। उन्होंने कभी किसी को धोखा नहीं दिया। वे परफैक्ट थे और बेहतरीन थे।"
वहीं गोल टोपी लगाए स्थानीय इमाम इलियास याह्या अपनी जोरदार आवाज में कहते हैं, "उनको मारने का क्या तुक था। आपने किसी की हत्या समस्या हल करने के नाम पर की। और अब समस्या ज्यादा बिगड़ गई है। तो गद्दाफी को क्यों मारा?"
हो सकता है कि गद्दाफी एक तानाशाह शासक रहे हों, लेकिन उन्होंने लीबिया को स्थायित्व दिया, वहां काम के मौके मुहैया कराए और वहां आकर बहुत सारे लोगों को काम करने दिया।
अफ्रीका में दसियों हजार ऐसे लोग हैं जिन्होंने लीबिया में काम करके पैसे कमाए और अपने परिवार की गरीबी दूर की।
गद्दाफी के शासन में पैसे कमाए
अकरा के उत्तर में शहर है लीबियाई क्वार्टर। यहां ज्यादातर वैसे लोग रहते हैं जिन्होंने गद्दाफी के शासन के दिनों में पैसे कमाए हैं।
ऐसे लोगों में हैं शेख सवाला। जिनका घर दूर से किसी आलीशान कोठी की तरह नजर आता है। उन्होंने लीबिया में कमाए पैसों से अपने देश में कई कामयाब उद्यम शुरू किए हैं। उनके मकान में 30 बेडरूम हैं। जाहिर है गद्दाफी के बिना वे ऐसा घर शायद ही बना पाते।
हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका घर गद्दाफी की मौत तक आधा ही बना हुआ था, ऐसे घर आज भी आधे अधूरे नजर आते हैं। 36 साल के अमाडू से भी मुलाकात होती है।
संकोची अमाडू अपनी कहानी बताते हैं कि उनके पास लीबिया में काम करने का उपयुक्त वीजा नहीं था। 2010 में वे अपने कुछ दोस्तों के साथ सहारा रेगिस्तान के रास्ते लीबिया पहुंचे थे। इस दौरान उनके पास पानी खत्म हो गया और उनके कई दोस्तों की मौत भी हो गई थी।
लेकिन अमाडू लीबिया पहुंचने में कामयाब रहे और उन्हें वहां टाइल्स लगाने का काम भी मिल गया।
2011 में जब युद्ध शुरू हुआ तब अमाडू के पास करीब साढ़े तीन हजार डॉलर जमा हो चुके थे। लेकिन गोलीबारी के समय मे वे अपना सबकुछ छोड़कर किसी तरह घाना पहुंच पाए। गद्दाफी की मौत के बाद उनके सपने बिखर गए हैं।
जीने के लिए चुनना होगा अपराध का रास्ता
मुस्तफा कहते हैं, "घाना के युवाओं के लिए यहां कुछ नहीं बचा है। गद्दाफी के बाद हमलोग काफी संकट में हैं। युवाओं में बेरोजगारी काफी बढ़ गई है, हम लोगों के पास करने के कुछ नहीं है। जीने के लिए हमें या तो अपराध का रास्ता चुनना होगा या फिर हमें यूरोप जाने की कोशिश करनी होगी।"
दूसरे भी इससे सहमति जताते हैं। इलियास कहते हैं, "अब हमें यूरोप, यूरोप, यूरोप ही जाना होगा। कुछ लोग ब्राजील जा रहे हैं, वह ये खर्च उठा सकते हैं। नहीं तो हर कोई यूरोप जाना चाहता है।"
गद्दाफी ने अपनी मौत से पहले ही यूरोपीय यूनियन को आगाह किया था कि अगर उनकी सरकार गिर गई तो कम से कम बीस लाख अप्रवासी लोग यूरोप का रुख करेंगे और यूरोपीय देशों के लिए मुश्किलें पैदा होंगी।
हो सकता है कि गद्दाफी मसीहा कम और कठोर शासक ज्यादा रहे हों, लेकिन ऐसा लगता है कि यूरोप के बारे में वो सही थे।