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ईरान और अल क़ायदा में क्यों हुई सांठगांठ?
बीबीसी हिंदी/कसरा नाजी
Updated Thu, 25 Apr 2013 10:20 AM IST
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ईरान एक कट्टर शिया मुस्लिम देश है जबकि अल क़ायदा एक चरमपंथी सुन्नी संगठन है। अल क़ायदा और तालिबान तो शियाओं को मुसलमान तक नहीं मानते। दोनों पक्ष एक दूसरे को दुश्मन की तरह देखते हैं।
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इस सब के बीच ऐसी कई बातें सामने आई हैं जो संकेत देती हैं कि ईरान में अल क़ायदा के कई बड़े नेता मौजूद हैं- इनमें से ज्यादातर नज़रबंद हैं या उनकी आवाजाही पर किसी न किसी तरह की पाबंदी है। तो ईरान के लिए इसके क्या मायने हैं?
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ईरान में मौजूद अल क़ायदा के लोगों में ओसामा बिन लादेन की (कम से कम) एक पत्नी, एक बेटी और दो बेटे भी शामिल थे। एक बेटा ख़ालिद (जो ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के साथ ही 2011 में मारे गए थे) और दूसरा बेटा साद 2009 में मारे गए थे।
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ये पूरा मामला 2001 तक जाता है- जब अफगानिस्तान में अमेरिका और नॉर्दन अलायंस काबुल की ओर बढ़ रहे थे ताकि तालिबान सरकार को सत्ता से हटा सकें। उस समय ईरान सरकार ने नॉर्दन अलायंस का समर्थन किया था। लेकिन ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अल ख़ामेनेई को चिंता था कि उनके देश की सीमा पर अमेरिकी सेना पहुँच चुकी है।
इसलिए उन्होंने तालिबान के गढ़ कंधार में अपने दूत भेजे ताकि ईरान मदद की पेशकश कर सके।
'ईरान ने दी अल क़ायदा को शरण'
लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। तालिबान को पैसे या हथियारों की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस अफगानिस्तान से बाहर जाने का सुरक्षित रास्ता चाहिए था और ईरान इस पर सहमत हो गया।
नवंबर 2001 में सीएनएन के टीवी रिपोर्टर के नाते मैं ईरान-अफगान सीमा पर एक अफ़गान शरणार्थी कैंप में गया था।
ये कैंप ईरान ने लगाया था ताकि उन हज़ारों शरणार्थियों की मदद की जा सके जो ईरान पहुंच रहे थे। इनमें से ज़्यादातर लोग तालिबान समर्थक माने जा रहे थे। वहाँ के गार्ड तक तालिबान लड़ाके थे।
उस शिविर में ईरान के कुछ इस्लामिक नेता भी पहुंचे हुए थे जो वहाँ लोगों की पड़ताल कर रहे थे। फिर पता चला कि वे शरणार्थियों में से उन लोगों को ढूँढने आए थे जो अल कायदा से जुड़े हुए थे ताकि उन्हें सीमा पार भेजने में मदद कर सके।
इस दौरान ईरान ने तालिबान के कई बड़े नेताओं को अपने यहां आने की इजाज़त दी। ओसामा बिन लादेन के परिवार के कई सदस्यों को भी ईरान ने अपने यहाँ आने दिया।
इसके अलावा भी अल क़ायदा के कई सदस्य ईरान आए थे। इसमें ओसामा के दामाद सुलेमान अबू गैथ भी थे जो पिछले महीने तुर्की भाग गए। अल कायदा की सुरक्षा समिति के प्रमुख सैफ अल आदेल और मोहम्मद अल मस्री को भी ईरान आने की अनुमति मिली थी।
लेकिन ईरान आने के बाद ये ईरान सरकार के बंधक बन गए। ईरान ने ज़्यादातर लोगों को या तो नज़रबंद किया या जेल भेज दिया गया।
दरअसल ईरान ने इन लोगों को ‘सौदेबाज़ी’ के लिए इस्तेमाल करना शुर कर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक 2003 में ईरान ने अमेरिका को एक पेशकश की थी। इसके मुताबिक अल क़ायदा के कुछ नेताओं को सौंपने के बदले में एक ईरानी हथियारबंद गुट के लोगों को छोड़ने की योजना दी गई थी जो जेल में बंद थे।
ईरान की मुसीबत
ओसामा बिन लादेन की किशोरी बेटी भी तेहरान में नज़बंद थी लेकिन वर्ष 2010 में वो भागकर सऊदी अरब के दूतावास में चली गई थी। उन्हें बाद में ईरान छोड़कर जाने दिया गया लेकिन इसके बदले में पाकिस्तान में अगवा हुए ईरानी राजदूत को रिहा करवाया गया।
अब भी ईरान में अल क़ायदा के कई लोग मौजूद हैं। ऐसा संभव है कि तमाम बंदिशों के बावजूद इनमें से कुछ अल क़ायदा नेटवर्क से संपर्क साधने में कामयाब रहे हों।
शायद इन्होंने ईरानी अधिकारियों से नज़रों से दूर विदेश में अल क़ायदा के लिए पैसे भी जुटाए हों या सदस्यों की मदद की हो।
यानी ईरान में वरिष्ठ अल क़ायदा सदस्यों की मौजूदगी अब ईरान सरकार के लिए बड़ी समस्या बन गई है।