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आख़िर पुतिन चाहते क्या हैं?

Fri, 07 Mar 2014 05:53 PM IST
Updated Fri, 07 Mar 2014 05:53 PM IST
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What Putin is actually looking for

रूस में एक सरकार है और संसद भी। यहां कई आयोगों और समितियों के साथ-साथ एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद भी है लेकिन देश के सारे महत्वपूर्ण फ़ैसले सिर्फ़ एक आदमी लेता है और वह हैं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन।

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पुतिन सत्ता के पिरामिड के शीर्ष पर बैठे हैं। इस पिरामिड को बनाया भी उन्होंने ही है। इस वक़्त वही तय करते हैं कि रूस क्या करेगा। शायद यही वजह है कि रूस की सोच और उनकी योजनाओं को समझना काफ़ी कठिन है। इसके लिए आपको राष्ट्रपति पुतिन के दिमाग़ को समझना होगा।
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तो सवाल यह है कि इस समय पुतिन यूक्रेन के बारे में क्या सोच रहे हैं? उनकी विदेश नीति किस बात से तय होती है? उनका उद्देश्य क्या है? पुतिन को यह बात सख़्त नापसंद है कि उन्हें धोखा दिया जा रहा है। हमने इसे साल 2011 में लीबिया में देखा था।
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उस समय रूस को यह समझाने की कोशिश की गई कि वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के उस प्रस्ताव का विरोध न करे जिसमें नागरिकों के लिए एक उड़ान रहित क्षेत्र बनाने की बात थी,लेकिन नेटो के सैन्य कार्रवाई में तख़्तापलट होने के साथ ही कर्नल मुअम्मर ग़द्दाफ़ी की जान भी चली गई थी। रूस को इसकी उम्मीद नहीं थी।

'पश्चिमी देशों की चाल'

What Putin is actually looking for

लीबिया की घटना इस बात को समझने में मदद कर सकती है कि सीरिया पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को रूस ने क्यों रोका। यूक्रेन के मामले में भी पुतिन को लगता है कि पश्चिमी देशों ने उन्हें फंसाया है।

पिछले महीने उन्होंने अपने प्रतिनिधि को कीएफ़ भेजा था ताकि वो राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच और विपक्षी दलों के बीच समझौते की बातचीत में हिस्सा ले सकें। इस क़रार की मध्यस्थता जर्मनी, पोलैंड और फ्रांस के विदेश मंत्री कर रहे थे जिसमें शीघ्र चुनाव कराने, संवैधानिक सुधार और राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की बात थी।

रूस के प्रतिनिधि ने इस समझौते पर दस्तख़त तो नहीं किए, फिर भी रूस इस पर तैयार होता लग रहा था क्योंकि उसे लगा इस बुरी परिस्थिति में यही सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है, लेकिन चौबीस घंटे के भीतर ही यानुकोविच को भागना पड़ा। संसद ने उनकी शक्तियां छीन ली थीं और विपक्ष से एक नए कार्यकारी राष्ट्रपति को चुनाव कर लिया था।

यूक्रेन में घटनाक्रम इस तेज़ी से बदले कि रूस हैरान रह गया। पुतिन को लगता है सभी पश्चिमी देशों का एक ही मक़सद है कि वह रूस को अस्थिर करें, ख़ासकर पुतिन को। और ये देश दिन-रात इसके लिए योजनाएँ बनाते रहते हैं।

उन्हें साल 2003 में जॉर्जिया में हुआ रोज़ रिवोल्यूशन और उसके अगले साल कीएफ़ में हुआ ऑरेंज रिवोल्यूशन अभी भी याद है। रूस को शक़ है कि ये सब पश्चिमी देशों ने कराया है।

'उन्होंने हमें धोखा दिया'

What Putin is actually looking for

अभी हाल ही में रूस ने पश्चिमी देशों पर मॉस्को में सरकार विरोधी प्रदर्शकारियों को पैसा और अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने का आरोप लगाया था। कई महीनों से रूस अमरीका और यूरोपीय संघ पर भू-राजनीतिक कारणों से यूक्रेन में गड़बडी पैदा करने का आरोप लगाता रहा है।

मंगलवार को पुतिन ने कहा, "विक्टर यानुकोविच के पिछले साल यूरोपीय संघ के साथ समझौते से इनकार को यूक्रेन में विपक्षी दलों के सत्ता के लिए संघर्ष में उनकी सहायता करने के लिए एक बहाने के रूप में प्रयोग किया है। यूक्रेन में पश्चिमी देशों ने यह पहली बार नहीं किया है।"

नेटो का मुद्दा भी एक बड़ा सवाल है। कोम्मेरसैंट अख़बार को साल 2010 में दिए गए एक इंटरव्यू में पुतिन ने कहा था कि सोवियत संघ (यूएसएसआर) को वादा किया गया था कि नेटो अपनी वर्तमान सीमा में विस्तार नहीं करेगा। पुतिन ने अख़बार से कहा, "उन्होंने हमें बहुत ही बुरा धोखा दिया।"

यूक्रेन में पश्चिम देशों की समर्थक सरकार आने का क्या यह मतलब निकाला जाए कि यूक्रेन भविष्य में नेटो का सदस्य बन सकता है? अगर ऐसा होता है तो रूस इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरे के रूप में देखेगा।

'रूस को ठुकराने के पहले सोचें'

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पश्चिम देशों में क्राईमिया में रूस के हस्तक्षेप को एक 'निर्मम अक्रामकता' बताया जा रहा है। पुतिन की नज़र में यह एक तरीके का पाखंड है। वो इराक़, लीबिया और अफ़गानिस्तान में अमरीकी हस्तक्षेप के बारे में दुनिया को याद दिलाना नहीं भूलते।

साल 2007 में म्यूनिख सुरक्षा कॉंफ्रेंस में दिए गए भाषण में पुतिन ने दुनिया को एक-ध्रुवीय बताते हुए अमेरिका को इस दुनिया का एकमात्र मालिक कहा था। वह जिस चीज़ में रूस का फ़ायदा समझते हैं पूरी दुनिया में उसकी रक्षा करने के लिए कटिबद्ध हैं- चाहे वह सीरिया में हो या पड़ोस में यूक्रेन में।

चूँकि ज़्यादातर पश्चिमी देश ऊर्जा ज़रूरतों और व्यापार के लिए रूस पर निर्भर हैं इसलिए उन्हें इस बात का भी भरोसा है कि जोर आजमाइश के लिए यह देश ज़्यादा नहीं अड़ सकते। पुतिन ने साफ़ किया है कि वो यूक्रेन के साथ युद्ध नहीं चाहते। उनका कहना है कि रूस ने 'मानवीय आधार' पर हस्तक्षेप किया है ताकि वहाँ के नागरिकों को 'अराजकता' से बचाया जा सके।

लेकिन रूस के राष्ट्रीय हित उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं। वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कीएफ़ की नई सरकार क्राईमिया से रूस के काला सागर बेड़े को बाहर न करे। वह यह भी चाहते हैं कि यूक्रेन के नए नेता पश्चिमी को गले लगाने और रूस को ठुकराने से पहले दो बार सोचें।

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