क्या औरतों का भी है अफगानिस्तान पर हक?
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ठीक एक साल पहले अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक दरगाह पर कुछ लोगों की भीड़ ने पत्थर मार-मारकर फरखुंदा मलिकजादा की हत्या कर दी थी। फरखुंदा पर कुरान की एक प्रति जलाने का गलत आरोप लगा था। 27 वर्षीय फरखुंदा की हत्या के बाद वहां बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और फरखुंदा अफगानिस्तान में लिंग समानता की लड़ाई का प्रतीक बन गईं। पर क्या वाकई अफगानिस्तान की महिलाओं के जीवन में कोई बदलाव आया है? 19 मार्च 2015 को काबुल की सड़कों पर कथित तौर पर कुरान जलाने की घटना से गुस्साए लोगों की भीड़ फरखुंदा को मस्जिद से खींचकर बाहर लाई। पुलिस ने शुरू में उन्हें बचाने का प्रयास किया, पर जल्द ही भीड़ के आगे वो बेबस हो गए। भीड़ ने फरखुंदा को पत्थरों-डंडों से पीटना शुरू किया और उनका हिजाब फाड़ दिया।
लोगों ने उनके बाल खींचे, उन पर थूका, धक्का देकर उन्हें ज़मीन पर गिराया, कुचला और उनके सिर पर ठोकरें मारीं। बेहद क्रूर ढंग से उनकी हत्या कर दी गई। उनके शरीर को सड़कों और गलियों में घसीटा गया और कार से कुचला गया। भीड़ यहीं नहीं रुकी। फरखुंदा को जला दिया और लोग देखते रहे। आखिर उनके शव पर पत्थर फेंके गए। एक मुल्ला ने आरोप लगाया था कि फ़रखुंदा ने क़ुरान जलाई है, जो आरोप बाद में ग़लत साबित हुआ। घटना के बाद लगभग 50 लोगों को गिरफ़्तार किया गया और कई को सजा भी हुई। तीन पुरुषों को 20 साल की कैद और आठ को 16 साल की जेल की सजा सुनाई गई और एक नाबालिग को 10 साल की कैद की सजा दी गई। फरखुदा को सुरक्षा देने में नाकाम रहने के लिए 11 पुलिसकर्मियों को भी एक-एक साल की सजा हुई।
मगर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर अफगानिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 13 अभियुक्तों की सजा कम कर दी। चार को मिली मौत की सजा भी खत्म कर दी गई। इसे लेकर खासा विवाद हुआ और मानवाधिकार और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका तीखा विरोध किया। फरखुंदा की मां ने कहा कि अफगानिस्तान में फरखुंदा के साथ ही न्याय भी दफन हो गया।'' भारी आलोचनाओं की बीच अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने मामले की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। फरखुंदा की मौत पर न केवल देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे, बल्कि विदेशी मीडिया ने भी इस मुद्दे को काफी तवज्जो दी थी।
पहली बार, अफगानिस्तान के अंदर और बाहर अफगानों ने कुरान जलाने के वीडियो बनाए और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। यह ऐसी प्रतिक्रिया थी, जिसके बारे में धार्मिक रूप से कट्टर इस देश में सोचा तक नहीं जा सकता था। फरखुदा को दफनाने के समय भी अभूतपूर्व घटना घटी। महिलाओं ने पुरुषों को फरखुंदा का ताबूत छूने से रोक दिया। उन्होंने खुद फरखुंदा के शव को कंधा दिया। इस तरह शव को पुरुषों के कंधा देने की सदियों पुरानी परंपरा तोड़ दी। महिला अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठनों के मुताबिक इस वारदात ने दिखाया कि क्रूरता, स्त्री द्वेष और लैंगिक हिंसा अफगान समाज में धंसी हुई है।
हालांकि एक वरिष्ठ अफगान इमाम कहते हैं, ''यदि कोई कुरान की बेइज्जती करता है, तो आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि लोग भावनाओं पर काबू रखेंगे और इंतजार करेंगे कि अदालत इसके लिए क्या सजा देगी। उन्होंने सरकार को चेताया कि भीड़ में शामिल लोगों को गिरफ्तार करने से बगावत होगी। सरकारी अफसरों ने भी सोशल मीडिया पर ऐसी टिप्पणियां डालीं।
सवाल ये है कि हत्या के एक साल बाद क्या अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए कुछ बदला है? इसके बाद सामने आई कुछ घटनाओं को देखें तो जवाब होगा ‘बहुत ज़्यादा नहीं।’ जनवरी में फ़रयाब प्रांत में एक महिला रेज़ा गुल के पति ने पारिवारिक कलह के बाद उसकी नाक और होंठ का ऊपरी हिस्सा काट दिया था। इसके बाद उसका पति तालिबान के नियंत्रण वाले इलाक़े में चला गया और उसे अब तक गिरफ़्तार नहीं किया जा सका है। नवंबर 2015 में मध्य अफ़ग़ानिस्तान में व्यभिचार के आरोप में एक युवा महिला रुख़साना की हत्या पत्थर मार-मारकर कर दी गई। 30 सेकंड के इस वीडियो को ऑनलाइन भी पोस्ट किया गया। जिस पुरुष के साथ वह कथित रूप से भागी, उसे भी कोड़े लगाए गए।
अफ़ग़ान मानवाधिकार आयोग का कहना है कि 'ऑनर किलिंग' के मामले बढ़े हैं। पिछले साल जिन 150 महिलाओं की हत्या हुई, उनमें 101 को इसलिए मारा गया कि उनके परिजनों का मान ना था कि उनसे परिवार की बदनामी हुई थी। इनमें एक लड़की 18 साल की थी। पिता ने उसकी हत्या कुल्हाड़ी से कर दी थी, क्योंकि वह उनकी ‘आज्ञा’ नहीं मान रही थी। अफ़ग़ानिस्तान में 2015 में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के 5,000 से अधिक मामले दर्ज हुए। पिछले साल के मुक़ाबले यह आंकड़ा पांच फ़ीसदी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ लगभग 90 फ़ीसदी अफ़ग़ान महिलाओं के साथ मारपीट या यौन हिंसा होती है। सरकार ने हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए कुछ अहम घोषणाएं की हैं। महिलाओं के लिए एक यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा भी की गई है।