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'सच्च और सपने को आपस में मिक्स कर देते हैं ट्रंप'
बीबीसी, हिंदी
Updated Wed, 20 Sep 2017 09:20 PM IST
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अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण में दो-तीन चीजें साफ नजर आईं। एक तो ये कि चुनाव प्रचार के दौरान ही उन्होंने ये साफ कर दिया था कि अमरीकी हितों को वे अपनी विदेश नीति में सबसे आगे रखेंगे। इसी बात को ट्रंप बार-बार दोहरा रहे हैं। लेकिन इसके बारे में ट्रंप विस्तार से कुछ बता नहीं रहे हैं कि 'अमरीका फर्स्ट पॉलिसी' का आखिर मतलब क्या है और संयुक्त राष्ट्र पर इसका क्या असर होगा।
लेकिन दूसरी चीज ये हुई है कि ट्रंप ने अपने भाषण में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के साथ-साथ थोड़ी तारीफ भी की और कहा कि संयुक्त राष्ट्र बहुत अहम और जरूरी काम करता है।
अमरीकी सैन्य कार्रवाई
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र के बजट का भी जिक्र किया। ट्रंप का इशारा संयुक्त राष्ट्र के संसाधनों की बर्बादी की तरफ था। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति के उलट ट्रंप का उत्तर कोरिया को संयुक्त राष्ट्र में धमकी देना भी एक असामान्य बात है।
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लेकिन दूसरी चीज ये हुई है कि ट्रंप ने अपने भाषण में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के साथ-साथ थोड़ी तारीफ भी की और कहा कि संयुक्त राष्ट्र बहुत अहम और जरूरी काम करता है।
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अमरीकी सैन्य कार्रवाई
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र के बजट का भी जिक्र किया। ट्रंप का इशारा संयुक्त राष्ट्र के संसाधनों की बर्बादी की तरफ था। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति के उलट ट्रंप का उत्तर कोरिया को संयुक्त राष्ट्र में धमकी देना भी एक असामान्य बात है।
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बुश ने इराक को कहा था 'बुराई की जड़'
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बुश
- फोटो : File Photo
अतीत में किसी भी अमरीकी राष्ट्रपति ने इस तरह की धमकी नहीं दी। इससे पहले जो भाषण याद आता है कि वो जॉर्ज डब्ल्यू बुश का था। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में इराक को 'एक्सिस ऑफ इविल' या 'बुराई की जड़' कहा था। वे इराक पर अमरीकी सैन्य कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र का समर्थन चाह रहे थे।
लेकिन उन्होंने भी इस तरह की धमकियां नहीं दी थीं कि वे इराक को पूरी तरह से खत्म कर देंगे। ट्रंप की ये आदत रही है कि वे रिएलिटी और फिक्शन को मिक्स कर देते हैं।
लेकिन उन्होंने भी इस तरह की धमकियां नहीं दी थीं कि वे इराक को पूरी तरह से खत्म कर देंगे। ट्रंप की ये आदत रही है कि वे रिएलिटी और फिक्शन को मिक्स कर देते हैं।
ट्रंप की आदत है रिएलिटी और फिक्शन को मिक्स करने की
Donald Trump
लेकिन उन्होंने भी इस तरह की धमकियां नहीं दी थीं कि वे इराक को पूरी तरह से खत्म कर देंगे। ट्रंप की ये आदत रही है कि वे रिएलिटी और फिक्शन को मिक्स कर देते हैं। उन्होंने कथित इस्लामिक स्टेट के बारे में ये दावा किया कि पिछले आठ महीनों में अमरीका ने इस्लामिक स्टेट को उतना तबाह किया है जितना पिछले कई सालों में नहीं हो सका था।
ओबामा ने पहुंचाया है इस्लामिक स्टेट को सबसे ज्यादा नुकसान
डोनाल्ड ट्रंप और बराक ओबामा
- फोटो : youtube
ये बहुत अजीब सी बात है, ट्रंप के आने के बाद अमरीका ने इस्लामिक स्टेट पर केवल दो ही हमले किए हैं। इस्लामिक स्टेट की ताकत को जितना भी नुकसान पहुंचाया गया है वो पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जमाने की नीतियों के वजह से है।
मोसुल में इस्लामिक स्टेट का पतन जनवरी में तभी शुरू हो गया था जब राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्ता की बागडोर संभाली थी।
मोसुल में इस्लामिक स्टेट का पतन जनवरी में तभी शुरू हो गया था जब राष्ट्रपति ट्रंप ने सत्ता की बागडोर संभाली थी।
ट्रंप के भाषण का टोन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : File Photo
ट्रंप ने अमरीका की हैसियत बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र में ऐसी ही बातों का जिक्र किया। संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर दो किस्म के भाषण दिए जाते हैं। एक भाषण ऐसा होता है जिसमें एक वैश्विक नजरिए की बात की जाती है।
संयु्क्त राष्ट्र में ट्रंप का ये पहला भाषण था। ट्रंप के पास एक मौका था कि वे दुनिया एक सामने एक नजरिया रखते जो दुनिया को भी पसंद आती।
सारी दुनिया अमरीका को एक लीडर के तौर पर देखती आई है। शांति, स्थिरता, विकास और तरक्की के लिए सबकी नजरें अमरीका की तरफ होती हैं।
संयु्क्त राष्ट्र में ट्रंप का ये पहला भाषण था। ट्रंप के पास एक मौका था कि वे दुनिया एक सामने एक नजरिया रखते जो दुनिया को भी पसंद आती।
सारी दुनिया अमरीका को एक लीडर के तौर पर देखती आई है। शांति, स्थिरता, विकास और तरक्की के लिए सबकी नजरें अमरीका की तरफ होती हैं।
जहां-जहां समाजवाद और साम्यवाद आया, सिर्फ तबाही मची
डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो : File Photo
ट्रंप ने अमरीका फर्स्ट का जो नारा लगाया है, वो दुनिया के नेतृत्व को छोड़ने वाला है। उन्होंने ये भी कहा कि दुनिया में जहां-जहां समाजवाद और साम्यवाद आया है, वहां तबाही के अलावा और कुछ नहीं आया है।
इस लिहाज से ट्रंप का भाषण कमजोर कहा जा सकता है। ट्रंप ने अहम मुद्दों पर कुछ नहीं कहा, म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर वे खामोश रहे।
इस लिहाज से ट्रंप का भाषण कमजोर कहा जा सकता है। ट्रंप ने अहम मुद्दों पर कुछ नहीं कहा, म्यांमार के रोहिंग्या संकट पर वे खामोश रहे।