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करजई की नाक तले तालिबान की 'हुकूमत'
Updated Tue, 03 Dec 2013 03:47 PM IST
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अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में राष्ट्रपति हामिद करज़ई की सरकार बनने के 12 साल बाद भी अफगानिस्तान के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में सरकार का नामोनिशान तक नहीं है।
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इनमें से ज़्यादातर इलाक़ों में तालिबान की सरकार और न्याय व्यवस्था लागू है। कुन्नड़ राज्य के छापादरह जिले में मैने दो लोगों से मुलाक़ात की जिनमें से एक ने न्याय के लिए सरकारी न्यायधीश से संपर्क किया और दूसरे ने तालिबान का रुख़ किया।
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छापादरह जिले के एक गांव में 57 साल के गुल ज़मान रहते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले तीन सालों में उनके साथ दो बड़ी घटनाएं हुईं।
कुछ लोगों ने मामूली से झगड़े में उनके भाई मोहम्मद ज़मान की गोली मार कर हत्या कर दी। उन्होंने बताया कि तीन साल तक उन्होंने न्याय के लिए जिले के प्रत्येक न्यायधीश और अधिकारी का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन उनकी शिकायत सुनने के लिए लोग रिश्वत की मांग करते थे।
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सरकारी व्यवस्था से निराश
गुल जमान ने कहा कि वह रिश्वत नहीं दे सकते थे इसलिए उन्हें जानवरों की तरह अदालतों से बाहर कर दिया जाता था।
गुल जमान का कहना था कि इस दौरान उनके भाई के हत्यारे खुलेआम घूम रहे थे।गुल ज़मान ने कहा कि तीन साल बाद एक हत्यारे ने उनके दूसरे भाई की हत्या कर दी लेकिन इस बार उसे गिरफ़्तार जरूर किया गया। ऐसे में गुल ज़मान को लगा कि शायद उन्हें न्याय मिल जाएगा।
गुल ज़मान ने बताया कि जब वह अदालत के दरवाज़े पर पहुंचे तो जज के भाई ने उनसे पूछा कि वह न्यायाधीश के लिए क्या कर सकते हैं। इस पर उन्होंने कहा कि देने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है।
गुल ज़मान ने कहा कि न्यायधीश ने यही सवाल आरोपी से पूछा जिस पर आरोपी ने एक गाय, एक बछड़ा और दस किलो अख़रोट देने का वादा किया। इसके बाद न्यायाधीश ने फ़ैसला उसके पक्ष में दिया और गुल ज़मान के भाई का हत्यारा मुक्त हो गया।
'तालिबान हैं असरदार'
गुल जमान का कहना है कि लोग न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था से तंग आ चुके हैं। उनका कहना था कि वह अंतिम उम्मीद के साथ राष्ट्रपति हामिद करज़ई और तालिबान से अनुरोध कर रहे हैं।
गुल ज़मान के बग़ीचे में बिलाल सरवरी की मुलाकात गांव के एक निवासी फ़ज़ल मोहम्मद से हुई।
फ़ज़ल मोहम्मद ने बताया कि उनके घर के चार लोगों की ज़मीन के झगड़े में हत्या कर दी गई। इसके बाद उन्होंने भी अदालत का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन उन्हें भी रिश्वत के लिए परेशान किया गया।
फ़ज़ल मोहम्मद ने बताया कि इसके बाद वो जिले के तालिबान केंद्र में गए जहां तालिबान न्यायाधीशों और मुल्ला ने सुनवाई के दूसरे दिन आरोपियों को पेश किया।
उन्होंने बताया कि तालिबान जजों ने क़ुरान और शरीयत की रोशनी में मुक़दमे का फ़ैसला किया।
फ़ज़ल ने कहा, "उन्होंने आरोपियों को तुरंत हमारी ज़मीन वापस करने का आदेश दिया। हालांकि आरोपी इस फ़ैसले से ख़ुश नहीं थे लेकिन तालिबान ने उन्हें यह फ़ैसला मानने पर करने पर मजबूर किया और इस प्रकार यह मामला एक हफ़्ते में हल कर दिया गया।"
सरकारी तंत्र का अभाव
तालिबान न्यायधीशों ने उन्हें दस्तावेज़ भी दिए जिसके अनुसार अब विवादित भूमि फ़ज़ल मोहम्मद की थी। उन्होंने बताया कि अगर कोई इसे वापस छीनने की कोशिश करेगा तो उसे तालिबान का निशाना बनना होगा।
छापादरह के अधिकारी मोहम्मद सफ़ी का कहना है कि यह सही है कि जिले में क़ानून नाम की चीज़ नहीं है। उन्होंने कहा, "जिले में न तो न्यायाधीश और न ही सरकारी वकील हैं। लोग शिकायत लेकर जाएं भी तो कहां जाएं?"
उन्होंने कहा कि जिले में तालिबान के हमलों के कारण कोई भी न्यायाधीश वहाँ काम करने के लिए तैयार नहीं है।
प्रांत की राजधानी असदाबाद में सरकारी वकील ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों पर बात करने से इनकार कर दिया लेकिन उनका मानना है कि कम से कम चार जिलों में न तो कोई न्यायाधीश और न ही सरकारी वकील है।
अफगानिस्तान के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सरकारी सुविधाएं न होने के कारण संकट की स्थिति है और हज़ारों लोग तालिबान की न्यायिक व्यवस्था की ओर रुख़ कर रहे हैं। उनके विचार में तालिबान प्रणाली सख़्त ज़रूर है लेकिन प्रभावी है।