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अफगानिस्तान पर फिर से होगा तालिबान का कब्जा?

Mon, 27 Jan 2014 01:56 PM IST
Updated Mon, 27 Jan 2014 01:56 PM IST
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Taliban in Afghanistan again?

इस साल के अंत तक अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद ब्रितानी और अमेरिकी सेना वापस आ जाएगी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अफ़ग़ानिस्तान उस स्थिति का सामना कर सकेगा या फिर से तालिबान वहाँ क़ब्ज़ा कर लेंगे?

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इस साल के अंत से अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा का ज़िम्मा पूरी तरह स्थानीय सरकार के हाथों में होगा। फिर चाहे हालात जितने भी बदतर होंगे, अमेरिका या ब्रिटेन की सरकार मदद के लिए वापस नहीं आएगी।
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तो ऐसे में सवाल उठता है कि जब अफ़ग़ानिस्तान पूरी तरह अपने राष्ट्रीय सुरक्षा बलों के भरोसे रहेगा तब क्या सरकार चुनौतियों का मुक़ाबला कर पाएगी?

या तालिबान लड़ाई जीत लेगा और उसी तरह फिर से अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण कर लेगा जैसा कि उसने 1996 से 2001 के बीच किया था।

ज़्यादातर विशेषज्ञ मानते हैं कि तालिबान की सीधी जीत की संभावना कम है।

इस समय अफ़ग़ान सेना और पुलिस बल पूरी तरह प्रशिक्षित और आत्मविश्वास से भरे हैं।

उनके हथियार प्रथम श्रेणी के हैं और उनके कमांडर अपनी काबिलियत के बल पर चुने गए हैं।

ये सुरक्षा बल अफ़ग़ानिस्तान की उस निर्बल और अनिच्छुक सेना तथा पुलिस से काफ़ी अलग है जिसे मैं 20 साल पहले अफ़ग़ानिस्तान की रिपोर्टिंग के दौरान देखा करता था।
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तब और अब में अंतर

Taliban in Afghanistan again?

तालिबान के लिए मुजाहिद्दीन सरकार को हराना तुलनात्मक रूप से आसान था। उन्होंने वे कई निष्पक्ष कबीलाई सरदारों को यह समझाने में सफल रहे कि अंततोगत्वा वही जीतेंगे। इस तरह ऐसे कई सरदार तालिबान के पक्ष में आ गए।

आज का अफ़ग़ानिस्तान एक अलग देश है। अब देश के पास ज़्यादा पैसा है और अब यह ज़्यादा विकसित भी दिखाई देता है।

अफ़ग़ानिस्तान में अभी भी चारों तरफ भ्रष्टाचार है, ख़ासकर सरकार में।

लेकिन जिस किसी ने भी तालिबान के शासन का वह त्रासद समय देखा है, जब भ्रष्टाचार अपने चरम पर था, वो इस बात पर शायद ही यकीन कर पाएगा कि तालिबान का शासन मौजूदा शासन से बेहतर होगा।

जिसकी भी उम्र 20-30 के बीच होगी तो उसने देखा होगा कि तालिबान शासन के दौर में जीवन कैसा था।

अगर आपने सीटी बजा दी या आपकी सलवार-कमीज टखने से ऊपर हो जाए या आप पतंग उड़ाएं या शतरंज खेलें या किसी जीवित प्राणी की तस्वीर आपके पास बरामद हो तो आपको गिरफ़्तार किया जा सकता था, पीटा जा सकता था और मौत की सज़ा भी दी जा सकती थी।

लैंप-पोस्टों पर लटकी चेतावनी

Taliban in Afghanistan again?

तालिबान ने घरों में छापे मारे, टेलीविज़न सेट और वीडियो टेप्स को जब्त किया और उन्हें लैंप-पोस्टों पर चेतावनी के रूप में लटका दिया।

मैंने पूरी दुनिया में ऐसा कट्टर समाज नहीं देखा था। ईरान अपने क्रांतिकारी दौर के समय में भी तालिबान के मुक़ाबले काफ़ी उदार था।

तालिबान ने जब तक काबुल पर क़ब्ज़ा नहीं कर लिया था तब तक किसी को उनकी जीत की संभावना पर यक़ीन नहीं था।

मुझे पहली बार साल 1996 में लगा कि तालिबान जीत भी सकते हैं।

उस समय कंधार में रिपोर्टिंग करते समय मैंने तालिबान नेता मुल्ला उमर को एक डिब्बे में से पैगंबर मोहम्मद का लबादा निकालकर अपने प्रशंसकों की भीड़ को दिखाते हुए देखा।

यह लबादा पिछले 1000 साल से इस डिब्बे के अंदर रखा हुआ था।

इस बार तालिबान में पहले जैसा जोश नहीं दिख रहा है।

लेकिन अब वो पहले से ज़्यादा संगठित हैं। ब्रितानी और अमेरिकी सेना से लड़ाई से तालिबान लड़ाकों ने लड़ाई के कई सबक सीखे हैं। दोनों सेनाओं में अपने विपक्षी की युद्ध क्षमता के प्रति वास्तविक सम्मान है।

इस बार जब मैं अफ़ग़ानिस्तान गया था तो तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद से फ़ोन पर साक्षात्कार किया था। पिछले एक साल से भी ज़्यादा समय से उन्होंने पहली बार किसी को लंबा साक्षात्कार दिया।

क्या गृह युद्ध होगा?

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अमेरिका कहता रहा है कि मुजाहिद कोई एक आदमी नहीं है बल्कि कई लोग हैं लेकिन जिस आदमी से मैंने बात की उसे याद था कि मैंने चार साल पहले भी उसका साक्षात्कार किया था। उसे यह भी याद था कि चार साल पहले जब साक्षात्कार चल रहा था तभी एक अमेरिकी एयरक्राफ़्ट ख़तरनाक ढंग से उनके ऊपर से गुजरा था।

मुजाहिद ने तालिबान के शासन का बचाव किया। उन्होंने मुझसे कहा, "अगर आप अफ़ग़ानिस्तान के आम लोगों से बात करें, अफ़ग़ानिस्तान की जनता के असल प्रतिनिधियों से बात करें, ख़ासकर जो गांवों और सुदूर इलाक़ों में रहते हैं, वो आपको बताएंगे कि उस समय अफ़ग़ानिस्तान में एक गंभीर इस्लामी अमीरात सरकार थी। उस व्यवस्था में व्यक्तियों के लिए और पूरे समाज के लिए दिशा-निर्देश शामिल थे और इसकी वजह से समाज में सकारात्मक बदलाव आया था।"

मैंने उनसे पूछा कि क्या अमेरिकी और ब्रितानी सेना के जाने के बाद गृह युद्ध छिड़ जाएगा?

उनका जवाब था, "अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाल करना और हमारी चिंता करना पश्चिम की ज़िम्मेदारी नहीं है। उन्हें अफ़ग़ानिस्तान से बाहर चले जाना चाहिए क्योंकि उनकी मौजूदगी यहाँ की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार है। उन्हें हिंसा बंद करनी चाहिए और उसके बाद अफ़ग़ान ख़ुद तय करेंगे कि उन्हें क्या करना है।"

मुझे लगता है कि अप्रैल में होने वाले चुनावों में चुने जाने वाले नए राष्ट्रपति हुनरमंद हुए तो वो तालिबान के एक हिस्से से समझौता करने में कामयाब हो सकेंगे।

इस्लामी रवायतें

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जो तालिबान इस समझौते का विरोध करेंगे वो लड़ाई जारी रखेंगे लेकिन ऐसे तालिबान की संख्या कम होगी। समझौते की क़ीमत के तौर पर नए राष्ट्रपति को कुछ इस्लामी रवायतों का लागू करना पड़ेगा।

लेकिन पश्चिम को यह पसंद आए चाहे न आए, तालिबान अफ़ग़ानिस्तान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अगर वहाँ किसी भी तरह की शांति स्थापित करनी है तो तालिबान को उससे अलग करना असंभव है।

ज्यों-ज्यों ब्रितानी, अमेरिकी और अन्य सैन्य बलों के अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने की तारीख़ क़रीब आ रही है तालिबान के हमलों की संख्या बढ़ती जा रही है।

उनकी मंशा साफ़ है कि वो लोगों को यह संदेश देना चाहते हैं कि विदेशी सैन्य बलों को उन्होंने बाहर किया है।

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