संकट में नेपाल की आमदनी का सबसे बड़ा जरिया
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नेपाल के लोगों के लिए आमदनी का सबसे बड़ा साधन पर्यटन उद्योग ही है, लेकिन पिछले साल आए विनाशकारी भूकंप के बाद यहां पर्यटकों की संख्या काफी कम हो गई है। उस भूकंप में नेपाल में 8 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे और हज़ारों लोग बेघर हो गए थे। आज एक साल के बाद भी नेपाल अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए संघर्ष कर रहा है। नेपाल की राजधानी काठमांडू के दरबार चौक इलाक़े में अगर कोई ऐसा व्यक्ति पहुंच जाए, जो विदेशी पर्यटक की दिखता है, तो स्थानीय लोग 'ऑफ़िसियल गाइड, ऑफ़िसियल गाइड' बोलते हुए उसकी तरफ़ दौड़ पड़ते हैं। यहां के लोगों को रोज़गार की सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि यहां पर्यटन के लिए ज़्यादा कुछ नहीं बचा है। 7.8 की तीव्रता के भूकंप के एक साल बाद भी नेपाल की शाही इमारतें और मंदिर खंडहरों के बीच पड़े हैं। दरबार चौक की पहचान इन्हीं इमारतों और मंदिरों की वजह से है। 400 साल पहले यह चौक शाही इमारतों और मंदिरों की ओर जाने वाला मुख्य चौराहा था, लेकिन अब यह पूरी तरह से मलबे में बदल चुका है। अब तक इसकी सफ़ाई नहीं हो पाई है। 17वीं 18वीं सदी की कई इमारतें लाल ईंटों ढेर और धूल में अटी हैं। यहां लकड़ी की एक छोटी सी कुटिया में आप प्रवेश के लिए टिकट ख़रीद सकते हैं। इसकी क़ीमत अब दोगुनी कर दी गई है ताकि पुनर्निर्माण के लिए पैसे जुटाए जा सकें, लेकिन यह काम बहुत आगे नहीं बढ़ पाया है।
कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद तो नहीं है, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक़ भूकंप के बाद यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या में 30 प्रतिशत की कमी आई है। कई नेपाली लोगों की तरह चिरिंग गुरुंग स्वाभाविक रूप से आशावान हैं। वो अभी-अभी पर्यटकों के एक ग्रुप को अलग-अलग जगहों की सैर कराने के बाद वापस आए हैं। वो उन जगहों पर गए थे, जहां नुक़सान तो कम हुआ है, लेकिन वहां पहुंचना काफ़ी मुश्क़िल है और जाने में गाड़ी से 45 मिनट का समय लगता है। वो किसी तरह की शिकायत नहीं करना चाहते हैं। बीते साल की मुश्किलों के बाद, इस समय वो ख़ूबसूरत मौसम के बारे में बात करते हैं। उनकी कंपनी 'स्नोलियन एक्सपेरिएंसेस' की स्थापना ठीक एक साल पहले हुई थी। यह कंपनी पर्यटकों को नेपाल की सबसे रोमांचक जगहों पर ले जाती है। चिरिंग गुरुंग बताते हैं कि इसकी स्थापना का समय बहुत ख़राब था। वो मुस्कुराते हुए कहते हैं, "हम उम्मीद कर रहे हैं कि हम 2016 में कारोबार बढ़ेगा, लेकिन अब तक कुछ भी पक्का नहीं है।" पर्यटकों की संख्या में कमी के साथ ही नेपाल स्थानीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। यहां की टूटी सड़कों की मरम्मत के लिए बड़े निवेश की ज़रूरत है। यहां कुछ पहाड़ी रास्ते जिनका उपयोग पैदल यात्रा के लिए होता था, वो अब भी असुरक्षित हैं। वहीं इस देश की बिजली व्यवस्था कभी भी भरोसेमंद नहीं रही है। नेपाल की चिंताओं में एक बड़ा मुद्दा भारत के साथ उसका विवाद भी है, जिसकी वजह से यहां 6 महीनों तक व्यापार ठप रहा।
इससे नेपाल के आम लोगों की मुश्क़िलें ही बढ़ीं। चिरिंग गुरुंग कहते हैं, "इससे नेपाल में ज़रूरी समानों की क़ीमतों में तीन गुना तक इज़ाफ़ा हो गया था, हमें ऐसी चीज़े ब्लैक मार्केट से ख़रीदनी पड़ती हैं, यहां ईंधन और रसोई गैस आसानी से उपलब्ध नहीं है।" काठमांडू के मुक़ाबले नेपाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर पोखरा भूकंप के केन्द्र के ज़्यादा क़रीब था। फिर भी जहां काठमांडू तबाह हो गया, वहीं यह शहर भूकंप के विनाश से आम तौर बचा रहा गया। लेकिन भूकंप का जो असर नेपाल पर पड़ा, पोखरा उससे नहीं बच सकता है। पशुपति तिमाल्सीना 'हिमालयन एकाउंटर्स टूर ऑपरेटर' के मैनेजर हैं। भूकंप के फौरी असर के बारे में वो बताते हैं कि यहां हर कोई आतंकित हो गया था। उनका कहना है, "पर्यटकों के लिहाज भीड़ भाड़ वाला समय था। बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे और अपने बारे में ख़बर देने के लिए उनका फ़ोन काम नहीं कर रहा था। " लेकिन अब भी यहां पर हालात सामान्य नहीं हुए हैं। यहां आने वाले पर्यटकों की बुकिंग दो-तिहाई तक कम हो गई है। तिमाल्सीना का मानना है कि सरकार को सड़कों की मरम्मत और पर्यटन उद्योग की मदद के लिए ज़्यादा काम करना चाहिए।
वो कहते हैं, "नेपाल में पर्यटन उद्योग में बड़ा निवेश हुआ है, लेकिन यह सरकार नहीं, बल्कि निजी व्यवसायों का ओर से आया है।" नेपाल में निजी व्यवसायों के लिए काफ़ी ख़र्च होता हुआ दिखाई देता है। यहां छोटे स्तर पर घर कई होटल, स्विमिंग पूल और योग केन्द्र बन रहे हैं। यहां के लोग उम्मीद लगाकर आगे के जीवन के लिए तैयारियां कर रहे हैं। इस हालात में भी सैर के लिए पर्यटकों का जाना, शायद नेपाल की समस्याओं के लिए एक सकारात्मक संदेश है। नेपाल में भारत की सीमा के पास मौजूद 'चितवन राष्ट्रीय पार्क' वाइल्ड लाइफ़ को देखने का एक लोकप्रिय स्थल है। यहां दुर्लभ रॉयल बंगाल टाइगर, गैंडा, घड़ियाल और किंगफ़िशर से लेकर जलकौवे जैसी कई पक्षियां पाए जाते हैं। बहुत कम बजट में, यहां बहुत कुछ देखा जा सकता है। यहां नदी के किनारे सुबह ही काम की तलाश में लोग जमा हो जाते हैं। उन्हें अंतिम समय तक उम्मीद होती है कि सैर-सपाटे या डोंगी के सफ़र के लिए कोई ग्राहक मिल जाएगा। इस पार्क के गाइड बिकास चौधरी बताते हैं कि वो यहां पिछले साल के मुक़ाबले केवल एक चौथाई पर्यटक देख रहे हैं। उनका कहना है, "लेकिन इसका एक फ़ायदा यह है कि जब माहौल शांत होता है, तो आप ज़्यादा जानवरों को देख सकते हैं।"
सुनील शेरचन यहां 'ताल रेस्ट ओ बार' चलाते हैं। उन्होंने अपने बार के लिए हाथ से तैयार लकड़ी का एक नया फ़र्नीचर और झूला ख़रीदा है। इसे नेपाली झंडे की तरह दिखने वाले और शांति का संदेश देने वाले इन्द्रधनुषी तिब्बती झंडे से सजाया गया है। इस पर 40 लोग एक साथ बैठ सकते हैं। हालांकि आज यहां केवल चार मेहमान आए हुए हैं। शेरचन लगातार सिगरेट पी रहे हैं और कॉफ़ी की घूंट ले रहे हैं, लेकिन फिर भी निश्चिंत हैं। पूरी तरह से पर्यटकों के बजाय, वो अब नेपाली युवाओं पर ध्यान दे रहे हैं, ताकि स्थानीय बाज़ार से अपने व्यापार में तेज़ी ला सकें। उनका कहना है, "यहां के लोग अमीर नहीं हैं, लेकिन हाल के दिनों में युवा पीढ़ी ने बाहर भोजन करना और सैर सपाटा करना शुरू कर दिया है। नेपाली लोग मध्य-पूर्व या मलेशिया जैसे देशों में जो कमाते हैं, वही पैसा यहां ख़र्च होता है।" उनके मुताबिक़, "नेपाली अपने घरों तक जो पैसे भेजते हैं, उसी के सहारे यह देश चल रहा है।" सुनील शेरचन बताते हैं, "पर्यटन उद्योग से जुड़ी कई कंपनियों ने व्यवसाय चलाने के लिए सरकार से बड़ा कर्ज़ ले रखा है...उन लोगों पर बड़ा ख़तरा है और हर कोई चिंतित है कि वो कंगाल हो सकते हैं।"