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डाकुओं के चंगुल में जिंदगी के छह महीने

Mon, 29 Jul 2013 12:04 AM IST
Updated Mon, 29 Jul 2013 12:04 AM IST
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six months of life in hands of bandits

जूडिथ और डेविड टेबट कीनिया में छुट्टियां मना रहे थे कि तभी एक सशस्त्र गिरोह ने उन पर हमला किया। डेविड की हत्या कर दी गई और जूडिथ को सोमालिया ले जाया गया, जहां उन्हें छह महीने तक बंधक बनाकर रखा गया।

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मुक्त होने के एक साल बाद उन्होंने अब अपनी आपबीती सुनाई है।

जूडिश खुद को जूड कहलाना पसंद करती हैं। आपको ताज्जुब होगा कि छह महीने ज़िल्लत भरी ज़िंदगी जीने के बाद भी वो बेहद तरोताज़ा दिखती हैं।

दिन-रात ख़ौफ़ के साए में रहने के बावजूद उनमें जिंदा रहने की जिजीविषा बची थी। इसी अनुभव ने उन्हें एक क़िताब ‘ए लॉन्ग वाक होम’ लिखने के लिए प्रेरित किया।
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बीबीसी के साथ साक्षात्कार में जूड ने कहा कि वे फ़िरौती के लिए बंधक बनाए गए दूसरों लोगों के लिए प्रेरणा और उदाहरण बनना चाहती हैं।

हर्टफोर्डशायर की निवासी जूड ने कहा, “यह एक संदेश है। यह संदेश दुनिया के खासकर सोमालिया के बंधकों के लिए है क्योंकि मैं जानती हूं कि वे किस दौर से गुजर रहे हैं। उम्मीद मत छोड़िए क्योंकि यही उम्मीद मेरी मुक्तिदाता है।”
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डेविड से मुलाक़ात
जूड और डेविड की मुलाक़ात 30 साल पहले अफ्रीका में ही हुई थी और वहीं उनका प्यार परवान चढ़ा। यही वजह थी कि डेविड को अफ्रीका से बेहद लगाव था।

सितंबर 2011 को कीनिया के मसाईमारा रिज़र्व में एक सप्ताह सफ़ारी में गुजारने के बाद जूड और डेविड किवायु बीच रिज़ॉर्ट पहुंचे। कीनिया के लामू द्वीप समूह में स्थित यह जगह सोमालिया तट से केवल 40 किलोमीटर दूर है।

जूड शुरू से ही असहज थीं। उन्होंने कहा, “मुझे कुछ गड़बड़ लग रही थी। मैं चुपचाप थी। जब मुझसे कहा गया कि वहां हमारे अलावा और कोई नहीं था, तो मुझे अजीब लगा।”

“जिस कमरे में हम ठहरे हुए थे वो बाक़ी इमारत से बहुत दूर था लेकिन डेविड ने कहा कि चिंता मत करो, इसमें हमें रॉबिन्सन क्रूसो जैसा आनंद मिलेगा।”

मगर पहली ही रात जब उनकी आंख खुली तो उन्होंने डेविड को अंधेरे में किसी के साथ उलझते हुए देखा। इसके बाद जूड पर भी राइफल के बैरल से वार किया गया और घसीटकर बीच पर ले जाया गया।

नंगे पांव
वो नंगे पांव थीं और उन्होंने पायजामा पहन रखा था। उनके साथ हाथापाई की गई और उन्हें एक नौका में तेल के डिब्बों पर धकेल दिया गया। इसके बाद नौका चल दी।

जूड सकते में थीं लेकिन इसके बावजूद उनका दिमाग़ स्थिति को सामान्य बनाने की जुगत ढूंढ़ने में लगा था। वह अपहरणकर्ताओं को देखकर मुस्करा रही थीं ताकि उनके साथ संवाद स्थापित किया जा सके।

वह मानसिक स्वास्थ्य सामाजिक कार्यकर्ता के बतौर काम कर चुकी थीं और जानती थीं कि जितनी जल्दी हो सके, उन्हें डाकुओं से संपर्क बनाना चाहिए।

समय बीतने के साथ जूड ने सोमाली भाषा के कुछ शब्द भी सीख लिए। वह चाहती थीं कि अपहर्ता उन्हें इंसान समझें न कि खरीद-फरोख़्त की चीज़।

“मैं उनसे नफ़रत करती थी लेकिन मैं जानती थी कि अगर मुझे लंबे समय तक उनके साथ रहना पड़ा, तो मुझे उनके साथ संवाद स्थापित करने की जरूरत पड़ेगी।”

बातचीत
जूड को सोमाली कपड़े पहनने को दिए गए लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा, “वे मुझे हिजाब और जिलबाब पहनाने की कोशिश कर रहे थे। जब मैंने उन्हें पहना तो एक डाकू ने कहा खूबसूरत सोमाली महिला। मुझे उन कपड़ों में घुटन हो रही थी और मैंने तुरंत उन्हें उतार फेंका।”

जूड को उमस भरे एक गंदे कमरे में रखा गया था। उन्होंने अपनी नियमित कसरत जारी रखी ताकि वो फिट रह सकें लेकिन कमजोर खुराक़ के कारण उनकी हालत ख़राब हो गई।

उन्हें बंधक बनाए जाने के कुछ दिन बाद ही उन्हें छुड़ाने के लिए बातचीत शुरू हो गई। कुछ हफ़्ते बाद ही उनके बेटे ओली ने डाकुओं के वार्ताकार के फ़ोन पर उनसे बात की।

जूड ने ओली से डेविड के बारे में पूछा। उन्हें लग रहा था कि डेविड इस हमले में बचने में कामयाब रहे और उन्हें मुक्त कराने के लिए काम कर रहे होंगे।

झटका
मगर ओली ने बताया कि डेविड अब नहीं रहे। ये सुनकर जूड को गहरा झटका लगा। उन्होंने कहा, “उस समय सभी डाकू कमरे में थे। मैंने उन सबको देखा और कहा कि आपने मेरे पति को मार डाला।”

जूड ने कहा, “एक-एक करके वे कमरे से बाहर चले गए। उसके बाद कमरे में उनका सरगना रह गया। मैंने उनसे कहा कि आपने मेरे पति को मारा। बाद में वह भी चुपचाप चला गया।”

इस दौरान जूड अपहर्ताओं के बारे में सबूत जुटाती रहीं। जूड को पूरा विश्वास था कि एक दिन वे पकड़े जाएंगे और उन्हें सज़ा मिलेगी।

कुछ दिन बाद डाकुओं ने उन्हें रेडियो सुनने की छूट दे दी। जूड बीबीसी वर्ल्ड सर्विस सुनती थीं जिसमें सोमालीलैंड से प्रसारित होने वाले कुछ कार्यक्रम शामिल थे।


जूड 192 दिन तक डाकुओं के चंगुल में रहीं और आख़िरकार मार्च 2012 में उन्हें रिहा कराया जा सका।

सोमालिया और दुनिया के दूसरे स्थानों पर बंधक बनाए गए लोगों के लिए जूड के पास एक संदेश है।

वो कहती हैं, “मैं ऐसे लोगों से कहना चाहती हूं कि उम्मीद मत छोड़िए, आपको भुलाया नहीं गया है। आपको लगेगा कि आपको भुलाया जा रहा है, लेकिन कहीं कोई आपको छुड़ाने की कोशिश कर रहा होगा।”

बीबीसी संवाददाता डैन डेमन की रिपोर्ट

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