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जान हथेली पर रख शायरी
Updated Wed, 23 Oct 2013 04:08 PM IST
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अफगानिस्तान की महिलाएं देश में मिली आजादी को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। बीबीसी के 100 वूमन सीजन के तहत मैं कई महिला शायरों से मिलीं।
अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए ये महिलाएं शायरी करती हैं बावजूद इसके कि इनकी जान पर ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है।
मैं उनसे काबुल में सिनेमाहॉल के पीछे एक छोटे से कमरे में मिली, सिनेमाहॉल में बॉलीवुड के बिलबोर्ड लगे हुए थे। इसी कमरे से अफगान महिलाओं ने एक साहित्यिक जंग छेड़ी हुई है, जो राजनीतिक भी है और निजी भी।
अपनी शायरी को ये महिलाएँ अपनी तलवार बताती हैं।
29 साल की पकीसा आरजू बताती हैं, “हम लफ्जों को लेते हैं, लफ्ज़ जो एकदम पाक हैं और अपनी भावना का इज़हार करते हैं। हालांकि मुझे पता है कि हमारे समाज में ये माना जाता है कि शायरी करना पाप है।”
काबुल के क्लब में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई के लिए भी एक रचना है जिसका मतलब कुछ यूँ हैं, “मैं आपकी मौजूदगी में खड़ी हूँ राष्ट्रपति, मेरी गुज़ारिश सुनें, मैं यहाँ थकी, बेचैन, ज़ख्मी होकर आई हूँ, आपके अपराधियों ने मुझे रोने पर मजबूर कर दिया।”
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बाद में मैने राष्ट्रपति से पूछा था कि क्या उन्हें इस रचना के बारे में पता है। हामिद करज़ई ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ, जब मैं उनके प्रांत में गया तो उस शायरा ने इसे मेरे लिए पढ़ा था।”
फोन के जरिए ही सही
मिरमन बहीर साहित्यिक सोसाइटी की ज्यादातर सदस्य पढ़ी लिखी महिलाएं हैं जो प्रोफ़ेशनल नौकरियों में हैं। लेकिन ज़्यादातर छद्म नामों के तहत लिखती हैं। कई पुरुष रिश्तेदारों के साथ आई हैं जो कमरे के दूसरी तरफ़ बैठे हैं।
कई महिलाएं गोपनीय तरीके से लिखती हैं और परिवारवालों को भी पता नहीं। इनका इरादा पक्का है, ये जोखिम उठाकर भी इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहती हैं, फिर वो फोन के ज़रिए ही क्यों न हो।
कमरे में फोन की घंटी बजते ही पकीसा आरज़ू दौड़ कर फ़ोन रिसीव करती हैं। स्कूल की बच्ची लाइन पर हैं जो काबुल के बाहर एक गाँव से अपनी कविता सुनाना चाहती है।
अफगान वूमन्स राइटिंग प्रोजेक्ट की कंट्री डायरेक्टर सीता हबीबी अपने प्रांत की एकमात्र महिला पत्रकार थीं, लेकिन तालिबान की धमकियों की वजह से उन्हें घर छोड़ना पड़ा।
वे कहती हैं, “हम जब अपनी रचनाएँ सुनाते हैं तो इससे हमारा दर्द कम होता है। हम अपनी कलम के ज़रिए कागज़ से बात करते हैं। इसी कागज़ पर हम अपनी हक़ की लड़ाई लड़ते हैं। एक दिन हमें जीत की उम्मीद है।”
प्यार पर पाबंदी
करिमा शबरंग बदख्शां प्रांत के एक गाँव में रहती हैं। वो प्यार और उसके खो जाने के दर्द पर लिखती थी लेकिन स्थानीय लोगों को लगता था कि इससे गलत नैतिक असर पड़ेगा।
अब काबुल में एक छोटे से घर में रहने को मजबूर करिमा बताती है, "स्थानीय बुज़ुर्गों ने कहा कि मुझसे छुटकारा पाना होगा। उनका मतलब था कि मुझे मार दिया जाए। मेरे दोनों भाईयों ने मुझे बचाया और मैं उनके साथ ही रहती हूँ।"
वे अपनी एक रचना सुनाती हैं जिसका मतलब कुछ यूँ था, "मैं तुम्हारी कमी महसूस करती हूँ। तबाह हो चुके काबुल की गलियों से मैं अपना हाथ बढ़ा रही हूँ।
मैं तुम्हे अपने कमरे में कश लगाने के लिए बुलाना चाहती हूँ।।।तुम मुझे अपने काँपते बदन में पनाह दे दोगे।"पर शायरी और नज़्मों के लिए निर्वासित जिंदगी बिताना उन्हें कहाँ तक सही लगता है?
अपनी कोमल आवाज़ में करिमा कहती हैं, "एक बंधक की तरह चुपचुप रहने से बेहतर है कि मैं एक ऐसी मौत मरूँ, जिसमें गरिमा हो।"
उम्मीद है हालात बदलेंगे
मिरमान बहीर साहित्यिक सोसाइटी के ज़रिए कई महिलाएँ अपनी शायरी एक दूसरी बांटती हैं और छपवाती हैं। कई अफ़गान शहरों में अब इनकी संख्या कुछ सौ तक पहुँच चुकी है।
सोसाइटी के एक संस्थापक और सांसद साहिरा शरीफ़ कहती हैं कि ये विरोध जताने का एक तरीका है। समाज में वर्जित माने जाने वाली मान्यताओं को तोड़ने के लिए अफगान महिलाएँ अपनी परंपरा का ही सहारा ले रही हैं।
अफगानिस्तान मे सदियों से अनपढ़ता काफी ज्यादा रही है। ऐसे में औरतें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए पद्य का सहारा लेती थीं।
वैसे इहितास पर नज़र डालें तो कई महिला शायरों का नाम आता है। अंग्रेज़ सैनिकों के खिलाफ़ 1880 में लड़ने वाली मालालई और राबिया बल्खी ( आधुनिक फारसी में लिखने वाली शायरों में से एक) के किस्से काफ़ी मशहूर हैं।
डॉक्टर मसूदा अपनी रचनाओं के ज़रिए हथियारबंद पुरुषों को चुनौती देती हैं। लेकिन स्थानीय कमांडरों ने उन्हें धमकी दी थी कि वे अपना काम सेंसर करें।
मैंने डॉक्टर मसूदा से पूछा कि उन्हें रचनाओं में क्या पसंद नहीं आया। वे कहती हैं, उन्हें सच पसंद नहीं आया। वे चाहते हैं कि हम अफ़गानिस्तान में हत्याओं, बमबारी को नज़रअंदाज़ कर दें।
तमाम तकलीफ़ों के बावजूद इन महिलाओं को लगता है कि बात आगे बढ़ रही है। सांसद साहिरा शरीफ़ का कहना है, “पिछले साल पाँच महिलाओं को पुरस्कार मिला।
उनके परिवारों को लगा कि शायरी के ज़रिए कुछ सकारात्मक हासिल किया जा सकता है। अगर परिवारवाले एक कदम उनके साथ बढ़ाते हैं, चाहे घंटे या एक दिन के लिए, उससे समाज के साथ संघर्ष में मदद मिलती है।”
पिछले एक दशक में अफ़ग़ानिस्तान में जो सुधार हुआ है, चिंता इस बात की है उसे बरकरार कैसे रखा जाए। इसी बीच महिलाएं अपनी हक़ की लड़ाई लड़ रही हैं, जिसमें लिखने का उनका हक़ भी शामिल है और उसे सुने जाने का भी।
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अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए ये महिलाएं शायरी करती हैं बावजूद इसके कि इनकी जान पर ख़तरा हमेशा मंडराता रहता है।
मैं उनसे काबुल में सिनेमाहॉल के पीछे एक छोटे से कमरे में मिली, सिनेमाहॉल में बॉलीवुड के बिलबोर्ड लगे हुए थे। इसी कमरे से अफगान महिलाओं ने एक साहित्यिक जंग छेड़ी हुई है, जो राजनीतिक भी है और निजी भी।
अपनी शायरी को ये महिलाएँ अपनी तलवार बताती हैं।
29 साल की पकीसा आरजू बताती हैं, “हम लफ्जों को लेते हैं, लफ्ज़ जो एकदम पाक हैं और अपनी भावना का इज़हार करते हैं। हालांकि मुझे पता है कि हमारे समाज में ये माना जाता है कि शायरी करना पाप है।”
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काबुल के क्लब में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई के लिए भी एक रचना है जिसका मतलब कुछ यूँ हैं, “मैं आपकी मौजूदगी में खड़ी हूँ राष्ट्रपति, मेरी गुज़ारिश सुनें, मैं यहाँ थकी, बेचैन, ज़ख्मी होकर आई हूँ, आपके अपराधियों ने मुझे रोने पर मजबूर कर दिया।”
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बाद में मैने राष्ट्रपति से पूछा था कि क्या उन्हें इस रचना के बारे में पता है। हामिद करज़ई ने तुरंत जवाब दिया, “हाँ, जब मैं उनके प्रांत में गया तो उस शायरा ने इसे मेरे लिए पढ़ा था।”
फोन के जरिए ही सही
मिरमन बहीर साहित्यिक सोसाइटी की ज्यादातर सदस्य पढ़ी लिखी महिलाएं हैं जो प्रोफ़ेशनल नौकरियों में हैं। लेकिन ज़्यादातर छद्म नामों के तहत लिखती हैं। कई पुरुष रिश्तेदारों के साथ आई हैं जो कमरे के दूसरी तरफ़ बैठे हैं।
कई महिलाएं गोपनीय तरीके से लिखती हैं और परिवारवालों को भी पता नहीं। इनका इरादा पक्का है, ये जोखिम उठाकर भी इस मुहिम का हिस्सा बनना चाहती हैं, फिर वो फोन के ज़रिए ही क्यों न हो।
कमरे में फोन की घंटी बजते ही पकीसा आरज़ू दौड़ कर फ़ोन रिसीव करती हैं। स्कूल की बच्ची लाइन पर हैं जो काबुल के बाहर एक गाँव से अपनी कविता सुनाना चाहती है।
अफगान वूमन्स राइटिंग प्रोजेक्ट की कंट्री डायरेक्टर सीता हबीबी अपने प्रांत की एकमात्र महिला पत्रकार थीं, लेकिन तालिबान की धमकियों की वजह से उन्हें घर छोड़ना पड़ा।
वे कहती हैं, “हम जब अपनी रचनाएँ सुनाते हैं तो इससे हमारा दर्द कम होता है। हम अपनी कलम के ज़रिए कागज़ से बात करते हैं। इसी कागज़ पर हम अपनी हक़ की लड़ाई लड़ते हैं। एक दिन हमें जीत की उम्मीद है।”
प्यार पर पाबंदी
करिमा शबरंग बदख्शां प्रांत के एक गाँव में रहती हैं। वो प्यार और उसके खो जाने के दर्द पर लिखती थी लेकिन स्थानीय लोगों को लगता था कि इससे गलत नैतिक असर पड़ेगा।
अब काबुल में एक छोटे से घर में रहने को मजबूर करिमा बताती है, "स्थानीय बुज़ुर्गों ने कहा कि मुझसे छुटकारा पाना होगा। उनका मतलब था कि मुझे मार दिया जाए। मेरे दोनों भाईयों ने मुझे बचाया और मैं उनके साथ ही रहती हूँ।"
वे अपनी एक रचना सुनाती हैं जिसका मतलब कुछ यूँ था, "मैं तुम्हारी कमी महसूस करती हूँ। तबाह हो चुके काबुल की गलियों से मैं अपना हाथ बढ़ा रही हूँ।
मैं तुम्हे अपने कमरे में कश लगाने के लिए बुलाना चाहती हूँ।।।तुम मुझे अपने काँपते बदन में पनाह दे दोगे।"पर शायरी और नज़्मों के लिए निर्वासित जिंदगी बिताना उन्हें कहाँ तक सही लगता है?
अपनी कोमल आवाज़ में करिमा कहती हैं, "एक बंधक की तरह चुपचुप रहने से बेहतर है कि मैं एक ऐसी मौत मरूँ, जिसमें गरिमा हो।"
उम्मीद है हालात बदलेंगे
मिरमान बहीर साहित्यिक सोसाइटी के ज़रिए कई महिलाएँ अपनी शायरी एक दूसरी बांटती हैं और छपवाती हैं। कई अफ़गान शहरों में अब इनकी संख्या कुछ सौ तक पहुँच चुकी है।
सोसाइटी के एक संस्थापक और सांसद साहिरा शरीफ़ कहती हैं कि ये विरोध जताने का एक तरीका है। समाज में वर्जित माने जाने वाली मान्यताओं को तोड़ने के लिए अफगान महिलाएँ अपनी परंपरा का ही सहारा ले रही हैं।
अफगानिस्तान मे सदियों से अनपढ़ता काफी ज्यादा रही है। ऐसे में औरतें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए पद्य का सहारा लेती थीं।
वैसे इहितास पर नज़र डालें तो कई महिला शायरों का नाम आता है। अंग्रेज़ सैनिकों के खिलाफ़ 1880 में लड़ने वाली मालालई और राबिया बल्खी ( आधुनिक फारसी में लिखने वाली शायरों में से एक) के किस्से काफ़ी मशहूर हैं।
डॉक्टर मसूदा अपनी रचनाओं के ज़रिए हथियारबंद पुरुषों को चुनौती देती हैं। लेकिन स्थानीय कमांडरों ने उन्हें धमकी दी थी कि वे अपना काम सेंसर करें।
मैंने डॉक्टर मसूदा से पूछा कि उन्हें रचनाओं में क्या पसंद नहीं आया। वे कहती हैं, उन्हें सच पसंद नहीं आया। वे चाहते हैं कि हम अफ़गानिस्तान में हत्याओं, बमबारी को नज़रअंदाज़ कर दें।
तमाम तकलीफ़ों के बावजूद इन महिलाओं को लगता है कि बात आगे बढ़ रही है। सांसद साहिरा शरीफ़ का कहना है, “पिछले साल पाँच महिलाओं को पुरस्कार मिला।
उनके परिवारों को लगा कि शायरी के ज़रिए कुछ सकारात्मक हासिल किया जा सकता है। अगर परिवारवाले एक कदम उनके साथ बढ़ाते हैं, चाहे घंटे या एक दिन के लिए, उससे समाज के साथ संघर्ष में मदद मिलती है।”
पिछले एक दशक में अफ़ग़ानिस्तान में जो सुधार हुआ है, चिंता इस बात की है उसे बरकरार कैसे रखा जाए। इसी बीच महिलाएं अपनी हक़ की लड़ाई लड़ रही हैं, जिसमें लिखने का उनका हक़ भी शामिल है और उसे सुने जाने का भी।