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ऑस्ट्रेलिया: बाहरी दिखा रहे व्यापार में दमखम

Mon, 19 Aug 2013 05:18 PM IST
Updated Mon, 19 Aug 2013 05:18 PM IST
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refugee in australia is successfully running business

ब्रिटेन से 1901 में आजादी मिलने के बाद से ऑस्ट्रेलिया ने इस साल आठ लाखवें शरणार्थी का देश में स्वागत किया।

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ऑस्ट्रेलिया ने बाहर से आने वाले इन शरणार्थियों के जोखिम लेने के जज्बे और उत्साह को संवारा है।

शॉपिंग मॉल किंग कहे जाने वाले फ्रैंक लोवी सहित ऑस्ट्रेलिया के कई अमीर लोग विदेशों से यहां आकर बसे हैं।

ऑस्ट्रेलिया के नेता नाव से आने वाले शरणार्थियों और उनके परिवारों के व्यवसाय करने को लेकर और शरणार्थियों के आगमन को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की बात कर रहे हैं लेकिन ये शरणार्थी और उनके परिवार चुपचाप अपना काम कर रहे हैं।

ये शरणार्थी यहां की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुके हैं और उनके किसी भी ऑस्ट्रेलियाई नागरिक की अपेक्षा जल्द से जल्द अपना व्यवसाय शुरू करने की संभावना होती है।
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'राह आसान नहीं रही'
अफगानिस्तान से आए रिज वकील की सिडनी के फेयरफील्ड में प्रिंटिंग की एक दुकान है।

रिज वकील बताते हैं कि कैसे उन्हें करीब एक दशक पहले इंडोनेशिया के तस्कर गिरोह के साथ नाव के जरिए गुप्त मार्ग से ऑस्ट्रेलिया लाया गया था।

रिज वकील कहते हैं कि उन्होंने और 72 अन्य लोगों ने छह दिन अपनी जान जोखिम में डालकर एक टूटी हुई मछली पकड़ने वाली नाव पर बिताए थे।

रिज वकील ने तब पहली बार समुद्र देखा था।

रिज वकील कहते हैं कि ''अफगानिस्तान में एक बच्चे और युवा के रूप में बिताए कठिन और मुश्किल जीवन ने मुझे एक दृढ़ संकल्पी और सख्त इंसान बना दिया।''

उनका कहना है, ''मैं एक योद्धा हूं और आसानी से हार नहीं मानता। बड़ी संख्या में अफगानिस्तान, इराक, श्रीलंका या ईरान से पुनर्वास कर जो लोग ऑस्ट्रेलिया आए, वे अपने देशों में अवसरों से वंचित थे, लेकिन यहां आकर ये लोग सफल व्यवसायी बन गए।''
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रिज के मुताबिक ''ऑस्ट्रेलिया में हजारों ऐसे लोग हैं, जो अपना नाम भी अंग्रेजी में नहीं लिख सकते, लेकिन वे अपने व्यवसाय में सफल हैं।"

ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े शहर में उनकी छोटी सी कंपनी में पांच कर्मचारी हैं लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बाद घरेलू अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और छपाई उद्योग में बने रहना मुश्किल होता जा रहा है।

रिज वकील कहते हैं, "ये बहुत आसान नहीं है। कभी अच्छा और कभी बुरा रहा है लेकिन मैं टिका हुआ हूं और मेरा हार मानने का इरादा नहीं है।"

कई उद्यमी शरणार्थियों के लिए नौकरी न मिल पाने की वजह से स्वरोजगार एक सपने से ज्यादा जरूरी है।

ऑस्ट्रेलिया की शरणार्थी परिषद के प्रमुख पॉल पावर कहते हैं, "कुशल प्रवासियों और ऑस्ट्रेलिया में जन्मे लोगों की तुलना में शरणार्थियों के अपना व्यवसाय शुरू करने की संभावना ज्यादा रहती है।"

हालांकि इस विशाल विस्थापित समूह का दशकों से ऑस्ट्रेलियाई अर्थव्यवस्था में क्या योगदान रहा है इसके कोई आंकड़े मौजूद नहीं हैं लेकिन पॉल पावर कहते हैं कि शरणार्थियों का गहरा असर रहा है।

पॉल पावर कहते हैं, ''आप विशुद्ध आर्थिक दृष्टि से देखें तो शरणार्थियों को यहां अपने पैरों पर खड़ा होने और योगदान देने में पांच से दस साल लग जाते हैं लेकिन जो शरणार्थी हैं वे पांच से दस साल के लिए नहीं आते, वे जिंदगी भर के लिए आते हैं।"

विरोध
हालांकि सभी इससे सहमत नहीं हैं। दक्षिणपंथी समूहों का तर्क है कि बड़ी तादाद में अप्रवासियों का आना और कई संस्कृतियों का जमा होना सामाजिक और आर्थिक कोलाहल तैयार करने की विधि है, जहां ऑस्ट्रेलिया में जन्मे लोगों से नौकरी और अवसर छीन लिए जाते हैं।

एसबीएस टेलीविजन को उद्योगपति डिक स्मिथ ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या में बढ़ोतरी एक 'आपदा' है।"

डिक स्मिथ ने कहा, "एक दशक पहले सिर्फ 1।96 करोड़ आबादी से आज 2।30 करोड़ आबादी वाला एक देश एक सीमित संसार में सतत बढ़ोतरी को सहन नहीं कर सकता।"

डिक स्मिथ ने साल 2010 में 30 साल से कम उम्र वाले उस व्यक्ति को 10 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी करीब 5।6 करोड़ रुपये देने का ऐलान किया था जो ऑस्ट्रेलिया की "जनसंख्या और उपभोग वृद्धि के पीछे पड़ी अर्थव्यवस्था" का समझदारी भरा हल बताएगा।

हालांकि ये पैसा अब तक किसी को नहीं मिला है इसके बावजूद बीते कुछ सालों में जो लोग आए वो ऑस्ट्रेलिया के कुछ इलाकों में कायापलट की ताकत बने हैं।

'जिसकी बहुत कद्र है'
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मेलबर्न से 175 किलोमीटर दूर शेप्पर्टन नाम के छोटे से शहर ने ग्रीस, मैसिडोनिया, इटली और अल्बानिया से आए लोगों का स्वागत किया था।


इन लोगों ने इलाके के फल उद्योग को खड़ा करने में मदद की।

फिर तुर्की से लोग आए और हाल ही में अफगानिस्तान, इराक, सूडान और कांगो से लोग गॉलबर्न नदी के तट पर बसे इस शहर में आए हैं।

शेप्पर्टन के मेयर जेनी हॉलीहान कहते हैं, "वे लोग बच्चों की देखभाल का काम कर रहे हैं, कुछ अफगान महिलाएं ड्राइविंग इंस्ट्रक्टर बनी हैं और कुछ ने ट्रैवल एजेंसी या कार की धुलाई का कारोबार खड़ा किया है। ये वो चीज है जिसकी हम बहुत कद्र करते हैं।"


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