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प्रचंड ने माना गलतियाँ तो हुई हैं उनसे
Updated Tue, 30 Apr 2013 10:50 PM IST
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नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और माओवादी पार्टी के प्रमुख पुष्प कमल दहल (प्रचंड) ने कहा है कि कुछ मसलों से निपटने में उनसे गलतियाँ हुईं हैं और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज नेपाल में हालात कुछ और ही होते।
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बीबीसी के साथ एक खास बातचीत के दौरान प्रचंड ने कहा कि, “कटुआल प्रकरण को उस तरह से हैंडल नहीं करना चाहिए। अगर हमने वह गलती नहीं की होती तो परिस्थितयाँ दूसरी तरह से नेपाल में जा सकती थीं और संविधान बनने की संभावना थी।”
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उन्होंने कहा कि, “राष्ट्रपति के चुनाव के समय भी हमसे कुछ गलतियाँ हुईं। अगर गिरिजा बाबू को हमने राष्ट्रपति बनने दिया होता, तो हालात दूसरे होते।”
उन्होंने कहा कि बगावती तेवरों वाली एक पार्टी के लिए ऐसी गलतियाँ लाज़िमी थीं।
उन्होंने कहा कि, “एक पार्टी जो अभी-अभी बगावत से लोकप्रिय लोकतांत्रिक राजनीति में आई है, उसके लिए शत-प्रतिशत सही करना संभव नहीं था।”
प्रचंड ने कहा कि अब उन्हें लोकतांत्रिक राजनीति में सात साल हो गये हैं और उन्होंने काफी कुछ सीख लिया है।
प्रचंड नौ महीने तक प्रधानमंत्री के पद पर रहे थे, लेकिन तत्कालीन सेना प्रमुख रुकमंगत कटुवाल की विवादास्पद बर्खास्तगी के बाद यूएमएल और मधेशी सहित सभी सहयोगी दलों के समर्थन वापस लेने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।
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अतीत पर गर्व
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आने से पहले हुए हथियारबंद आन्दोलन पर उन्हें खेद नहीं है।
प्रचंड ने कहा कि, “आज हम गणतंत्र में हैं। 24 साल का राजतंत्र हमने खत्म कर दिया...अगर वह राह न ली होती तो यह संभव नहीं था। इसलिए उस पर हमें कोई खेद नहीं है, उस पर हमें गर्व है।”
आन्दोलन की राह में आये बदलाव के बारे में उन्होंने कहा कि, “हम परिवर्तन की प्रक्रिया की गतिशीलता को समझते हैं। हमने मुद्दों के साथ समझौता नहीं किया है, केवल उसे पाने के तरीके में बदलाव किया है हमने।”
कमज़ोरियों पर नज़र
बर्मा, पेरू और मलेशिया जैसे देशों में वामपंथी आन्दोलन के असफल होने के कारण पर प्रचंड ने कहा कि बाद आतंरिक कारण ही सबसे प्रधान होता है।
उन्होंने कहा कि, “बाहरी ताकतें तो विरोध करेंगी ही। कम्युनिस्टों को सोचना चाहिए कि अपने आन्दोलन को कैसे बचायें। अगर उसे बचा नहीं सके तो इसका मतलब है कि विश्लेषण में कमी है। कुछ कमज़ोरियाँ हैं।”
आगामी चुनावों के बारे में उन्होंने कहा कि, “आने वाले चुनाव में हमारी स्थिति और मज़बूत ही होगी। नेपाली जनता देख रही है कि माओवादी पार्टी की लीडरशिप के कारण ही इतना बड़ा परिवर्तन संभव हुआ है।”
उन्होंने कहा कि “आज जो यह सरकार बनी है, वह माओवादी पार्टी के बलिदान के कारण ही संभव हुआ है। अगर माओवादी पार्टी अपनी सरकार को छोड़ कर मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भी निर्वाचन में जाने को तैयार नहीं होती तो काफ़ी दिक्कत हो सकती थी।”
उन्होंने कहा कि उनका आधार कमजोर नहीं हुआ है और बगावत के समय देश के दलितों, महिलाओं, जनजातियों को, मधेशियों, सभी उत्पीड़ितों के जिन मुद्दों को हमने अपील किया था, उन मुद्दों पर उनकी पार्टी आज भी अड़िग है।