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एनजीओ पर सख्ती के विरुद्ध डरबन एड्स कांफ्रेंस में मोदी के खिलाफ प्रदर्शन
दयाशंकर शुक्ल सागर/अमर उजाला, डरबन
Updated Fri, 22 Jul 2016 05:11 AM IST
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तमाम स्वयंसेवी संगठनों की फंडिंग पर मोदी सरकार की सख्ती के खिलाफ विश्व एड्स कांफ्रेंस में तमाम अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं ने बृहस्पतिवार को प्रदर्शन किया। इन्होंने बाकायदा माइक लेकर मोदी के खिलाफ शेम-शेम की नारेबाजी की और पूरे कन्वेशन सेंटर में जुलूस निकाला।
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इनके हाथों में विरोध की तख्तियां थीं जिसमें सरकार पर फारेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) के दुरुपयोग के आरोप थे। अधिवेशन में यह पहला मौका है जब किसी देश की सरकार के खिलाफ इस तरह का विरोध प्रदर्शन किया गया।
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देश में मोदी सरकार ने उन एनजीओ पर शिकंजा कसा है जो जन स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आ रहे विदेशी धन का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार तमाम एनजीओ की जांच कर रही है कि वे बाहर से आने वाले पैसे को कैसे खर्च कर रहे हैं। इस अभियान के कारण कई एनजीओ की फंडिंग भी रोक दी गई है।
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इस विरोध प्रदर्शन में इंटरनेशनल एड्स सोसाइटी समेत करीब तीन दर्जन से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हिस्सा लिया। उनका कहना था कि सरकार की इस सख्ती से एचआईवी रोगियों के लिए चल रहे जागरूकता अभियान प्रभावित हो रहे हैं।
इन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ऐसा राजनीतिक कारणों से कर रही है। जन स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं में राजनीति नहीं होनी चाहिए। इससे न केवल एचआईवी का इलाज प्रभावित होगा, बल्कि सरकार की ये नीति मानवाधिकार अधिकारों के भी खिलाफ है।
सरकार पर एड्स दवाओं की कीमत बढ़ाने का दबाव
विरोध का एक और मुद्दा वुमन्स राइट एडवोकेट संस्था (संग्राम) से जुड़ी मीना सीशू ने उठाया। भारत में एड्स से जुड़ी अस्सी फीसदी जेनेरिक दवाएं अभी सस्ती हैं लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत सरकार पर दबाव बना रही हैं कि इनकी कीमतें बढ़ाई जाएं।
ये दवाएं इतनी सस्ती हैं कि कई देशों में इनका निर्यात हो रहा है। मीना कहती हैं कि मोदी सरकार को इनके दबाव में नहीं आना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो एड्स रोगियों का इलाज मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि भारत जैसे कई अन्य विकासशील देशों में एचआईवी प्रभावित लोग अमूमन गरीब या मध्यवर्गीय समाज से ताल्लुक रखते हैं।
प्रदर्शन से अलग रहे हिंदुस्तानी एनजीओ
प्रदर्शनकारियों में कई हिंदुस्तानी भी थे लेकिन यहां आए ज्यादातर हिंदुस्तानी एनजीओ ने खुद को इससे अलग रखा। उनका कहना था कि यह भारत का आंतरिक मामला है जिसे अंतरराष्ट्रीय फोरम पर नहीं उठाया जाना चाहिए।
इसके खिलाफ प्रदर्शन करना है देश में कीया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वह दक्षिण अफ्रीका के काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया के दफ्तर तक जुलूस निकालेंगे और अपना ज्ञापन उन्हें सौंपेंगे। काउंसलेट जनरल आफ इंडिया के काउंसलर प्रवक्ता ने अमर उजाला को बताया कि वे देखेंगे कि ये ज्ञापन उन्हें लेना है या नहीं।
ये दवाएं इतनी सस्ती हैं कि कई देशों में इनका निर्यात हो रहा है। मीना कहती हैं कि मोदी सरकार को इनके दबाव में नहीं आना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो एड्स रोगियों का इलाज मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि भारत जैसे कई अन्य विकासशील देशों में एचआईवी प्रभावित लोग अमूमन गरीब या मध्यवर्गीय समाज से ताल्लुक रखते हैं।
प्रदर्शन से अलग रहे हिंदुस्तानी एनजीओ
प्रदर्शनकारियों में कई हिंदुस्तानी भी थे लेकिन यहां आए ज्यादातर हिंदुस्तानी एनजीओ ने खुद को इससे अलग रखा। उनका कहना था कि यह भारत का आंतरिक मामला है जिसे अंतरराष्ट्रीय फोरम पर नहीं उठाया जाना चाहिए।
इसके खिलाफ प्रदर्शन करना है देश में कीया जाना चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वह दक्षिण अफ्रीका के काउंसलेट जनरल ऑफ इंडिया के दफ्तर तक जुलूस निकालेंगे और अपना ज्ञापन उन्हें सौंपेंगे। काउंसलेट जनरल आफ इंडिया के काउंसलर प्रवक्ता ने अमर उजाला को बताया कि वे देखेंगे कि ये ज्ञापन उन्हें लेना है या नहीं।