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रॉबर्ट मुगाबे: जिम्बाब्वे के नायक या खलनायक?

Wed, 22 Nov 2017 01:15 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Wed, 22 Nov 2017 01:15 PM IST
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President of zimbabwe Robert mugabe Hero or villain
रॉबर्ट मुगाबे
जिम्बाब्वे की संसद के स्पीकर ने घोषणा की है कि रॉबर्ट मुगाबे ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। अचानक आए इस्तीफे के बाद उनके खिलाफ शुरू की गई महाभियोग की कार्यवाही को स्थगित कर दिया गया है। मुगाबे के फैसले के बाद देश भर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हरारे की सड़कों पर लोग सैनिकों के साथ तस्वीरें खिचवाते और नारे लगाते देखे जा रहे हैं।
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मुगाबे का जिम्बाब्वे

बीते 37 वर्षों से रॉबर्ट मुगाबे और जिम्बाब्वे एक-दूसरे का पर्याय रहे हैं। कुछ लोगों के लिए तो मुगाबे तमाम विवादों के बावजूद एक हीरो हैं जिन्होंने देश को आजादी दिलाई। यहां तक कि उन्हें सत्ता से हटाने वालों ने भी मुगाबे से ज्यादा उनकी पत्नी और उनके आस-पास के कथित अपराधियों पर ही इल्जाम लगाए। लेकिन उनके अलोचकों की संख्या बीते कुछ वर्षों से लगातार बढ़ती रही है। वे उन्हें सत्ता में बने रहने के लिए हर तिकड़म अपनाने वाले एक अफ्रीकी तानाशाह लगते थे जिन्होंने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरे देश को तबाह कर दिया।
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सेना नाखुश

आखिर में वही फौज मुगाबे के खिलाफ हो गई जिसके सहारे उन्होंने वर्षों तक विपक्ष और विरोधियों पर नकेल कस रखी थी।सेना इस बात से नाखुश थी कि मुगाबे ने लंबे समय से सहयोगी रहे इमर्सन मनांगाग्वा को उप राष्ट्रपति पद से बर्खास्त कर दिया। सुरक्षा बलों को शायद ये भी शक था कि मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेस को ये पद सौंपना चाहते थे। अपने जीवन में कई संकटों से उभरकर सत्ता में बने रहने वाले मुगाबे के लिए 93 साल की उम्र में अपने पुराने सहयोगियों का सहयोग बरकरार रख पाना अंसभव होता जा रहा था।
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'सिर्फ ईश्वर हटा सकता है...'

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रॉबर्ट मुगाबे

साल 2008 के चुनाव से पहले मुगाबे ने कहा था, "अगर आप चुनाव हारें तो आपको राजनीति से तौबा कर लेनी चाहिए।" लेकिन मॉर्गन त्सवानगिराई से हारने के बाद वो अपने बयान मुकरे ही नहीं बल्कि ये कहा कि उन्हें सिर्फ ईश्वर ही सत्ता से हटा सकता है। मुगाबे को समझने के लिए जिम्बाब्वे में 1970 के दशक में चले छापामार युद्ध को समझना पड़ेगा।

आर्थिक मुद्दों की समझ पर सवाल
37 साल तक सत्ता में बने रहने के बाद भी मुगाबे का दुनिया के प्रति नजरिया करीब वैसा ही था जैसा कि 1970 के दशक में। उन्हें लगता था कि उनकी सोशलिस्ट पार्टी जानू-पीएफ, अब भी पूंजीवाद और उपनिवेशवाद से लड़ रही है। हर आलोचक को तुरंत गद्दार और बिका हुआ घोषित कर दिया जाता था। ठीक वैसे ही जैसा कि छापामार युद्ध के दौरान होता था। वो जिम्बाब्वे के माली हालत के लिए हमेशा ही पश्चिमी ताकतों को जिम्मेदार ठहराते थे। लेकिन उनके आलोचकों का कहना था कि मुगाबे को इस बात की समझ ही नहीं है कि एक आधुनिक अर्थव्यवस्था को कैसे चलाया जाता है।

सालाना मंहगाई दर 23 करोड़ प्रतिशत
मुगाबे हमेशा केक को शेयर करने की बात करते थे। केक कैसे बनाए जाएं इस पर बात नहीं होती थी। मुगाबे ने एक बार कहा था कि उनका देश कभी भी दिवालिया नहीं हो सकता। जुलाई 2008 में जब सालाना मंहगाई दर 23 करोड़ प्रतिशत बढ़ गई, तो लगा कि जैसे वो अपने सिंद्धात को टेस्ट करना चाहते हैं। साल 2000 में अपने सियासी करियर में उन्होंने पहली बार एक मजबूत विपक्ष का सामना किया। इस चुनौती से लड़ने के लिए उन्होंने अफ्रीका की एक मजबूत अर्थव्यवस्था को सियासी नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किया।

उन्होंने अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले गोरे लोगों के फार्म्स को सरकारी कब्जे में ले लिया। ये एक लोकप्रिय कदम साबित हुआ। वो सत्ता में तो बने रहे लेकिन अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई।

सेना और मीडिया का इस्तेमाल

President of zimbabwe Robert mugabe Hero or villain
रॉबर्ट मुगाबे
साल 2000 के जनमत संग्रह में मिली हार हो या 2008 में राष्ट्रपति चुनावों के पहले चरण में हार हो... मुगाबे ने हर बार सुरक्षा बलों और सरकारी मीडिया का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया। अपने सियासी विरोधियों के प्रति मुगाबे के रवैये की झलक 1980 के दशक में ही मिलने लगी थी। तब उन्होंने उत्तरी कोरिया में प्रशिक्षित सेना की एक ब्रिगेड को अपने विरोधी जोशुआ एनकोमो के इलाके में भेज दिया था। जब तक एनकोमो मुगाबे की शर्तें मानते, हजारों नागरिकों की मौत हो चुकी थी।

अफ्रीका में सबसे अधिक सारक्षता
लेकिन मुगाबे के राज में जिम्बाब्वे में शिक्षा का खूब प्रसार हुआ। इस वक्त देश की 89 फीसद आबादी साक्षर है जो कि किसी भी अफ्रीकी देश से अधिक है। एक कमेंटेटर कहा था कि शिक्षा का प्रसार कर मुगाबे खुद अपनी कब्र खोद रहे हैं। मुगाबे अक्सर ये कहते थे कि वो देश के गरीबों के हक के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन उन्होंने जो बड़े जमींदारों से जमीनें जब्त की वो उनके करीबियों हाथ लगीं। आर्चबिशप डेसमंड टूटू ने एक बार कहा था कि जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति एक कार्टून बनकर रह गए हैं।

निष्ठावान कैथोलिक

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रॉबर्ट मुगाबे
मुगाबे निष्ठावान कैथोलिक हैं। और इसका अहसास कई बार हरारे कैथोलिक कैथिडरल में संडे मास के लिए आने वालों को हो चुका है। क्योंकि जब भी वो वहां आते, दल-बल के साथ आते। लेकिन उनका धर्म तब उनके आड़े नहीं आया जब वो कैंसर से पीड़ित पहली पत्नी के जिंदा रहते, ग्रेस के दो बच्चों के बाप बने। उनकी यही दूसरी पत्नी ग्रेस उनके पतन का कारण बनीं। साल 2011 में विकीलीक्स के जरिए सामने आए एक अमरीकी दस्तावेज़ के मुताबिक उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है। लेकिन वो देखने में तो स्वस्थ लगते हैं।

योग और शाकाहारी भोजन
उनकी पत्नी ग्रेस ने एक बार कहा था कि मुगाबे रोज सुबह पांच बजे उठकर योग समेत कई कसरतें करते हैं। वो शराब या कॉफी नहीं पीते और लगभग शाकाहारी हैं।
जब ग्रेस ने अपने तीसरी संतान को जन्म दिया था तो मुगाबे 73 वर्ष के थे। वो अक्सर कहते थे कि वो तभी सत्ता छोड़ेंगे जब क्रांति सम्पूर्ण हो जाएगी। उनका इशारा गोरे जमींदारों से ली गई जमीनों को गरीबों में बांटने की ओर था। साथ ही वो अपनी पार्टी के भीतर से ही अपना उत्तराधिकारी चुनना चाहते थे।

डिडिमस मुटासा मुगाबे के साथ कई दशकों तक रहे। उन्होंने एक बार बीबीसी को बताया था कि जिम्बाब्वे में राजा तभी बदला जाता है जब उसकी मौत हो जाए। और मुगाबे उनका राजा है। लेकिन उनके निकट सहयोगी भी ये नहीं चाहते थे कि जिम्बाब्वे एक राजशाही बन जाए। 
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