भारत के लिए बेहद अहम है सू की का सत्ता में आना
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लोकतंत्र समर्थक आंग सान सू की जीत भारत-म्यांमार संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय
पूर्वोत्तर भारत की लगभग 1640 किमी लंबी सीमा म्यांमार से लगी है। असम, नगालैंड, मणिपुर और त्रिपुरा के तमाम उग्रवादी संगठनों के लिए म्यांमार दशकों से एक सुरक्षित पनाहगाह रहा है। यही वजह है कि सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर अंकुश नहीं लगा सकी है। बीते कुछ वर्षों से म्यांमार से भाग कर आने वाले रोहिंग्या मुसलमान भी विभिन्न राज्यों में सांप्रदायिक तनाव का कारण बन रहे हैं। मणिपुर के कुछ इलाकों में तो उनके कारण जातीय तनाव बना ही रहता है।
आतंकवाद के खात्मे में मिलेगी मदद
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. धीरेन गोस्वामी कहते हैं कि वैसे तो
रोहिंग्या के मामले में सू की का रुख अब तक उत्साहजनक नहीं रहा है। उनके
आने से पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर अंकुश लगाने में म्यांमार एक असरदार
रणनीतिक सहयोगी साबित हो सकता है। इसलिए उसके साथ संबंध और मजबूत करने
होंगे। वहीं विशेषज्ञ प्रो. होमेन बरुआ कहते हैं कि भारत की लुक ईस्ट नीति
की कामयाबी म्यांमार के साथ आपसी संबंधों पर निर्भर है। म्यांमार होकर ही
भारत दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के साथ संपर्क मजबूत कर सकता है।
पूर्वोत्तर
को म्यांमार से जोड़ने वाली स्टीलवेल रोड के मामले में भी भारत को पहल
करनी होगी। यह सड़क दोनों देशों को और करीब लाने में अहम भूमिका निभा सकती
है। बरुआ के मुताबिक शरणार्थी के तौर पर आने वाले रोहिंग्या मुसलमानों में
आईएस और अलकायदा के लोग भी सक्रिय हो रहे हैं। इसे ध्यान में रखते हुए भारत
को म्यांमार के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंधों की दिशा में ठोस पहल करनी
होगी। सुरक्षा विशेषज्ञ दिनेश रायचौधरी भी मानते हैं कि पूर्वोत्तर में
उग्रवाद पर काबू पाने में म्यांमार अहम भूमिका निभा सकता है। सू की की
सत्ता में वापसी के बाद भारत के लिए यह काम पहले से आसान हो गया है।