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इस मलेरिया से कैसे बचें किसी को नहीं पता
Updated Tue, 30 Apr 2013 10:17 AM IST
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वैज्ञानिकों ने मलेरिया के ऐसे परजीवी का पता लगाया है जिस पर मलेरिया की सबसे कारगर दवा का भी असर नहीं होता।
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मलेरिया की सबसे कारगर दवा है आर्टीमिसिनिन है जिसका प्रयोग पूरी दुनिया में किया जाता है।
परजीवियों की ये प्रजाति पाई गई है कंबोडिया के पश्चिमी इलाको में।
वैज्ञानिकों का कहना है कि मलेरिया के जीवाणुओं की ये प्रजाति दुनिया मे पाई जाने वाली दूसरी प्रजातियों से अनुवांशिक रूप से अलग है।
पहली बार इस इलाके में मलेरिया की दवाओं के असर न होने की घटना 2008 में सामने आई थी। इसके बाद से ये समस्या दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे हिस्सों में भी फैल गई है।
इस खोज से संबंधित अध्ययन को "नेचर जेनेटिक्स" में प्रकाशित किया गया है।
इसके प्रमुख शोधकर्ता, ऑक्सफ़ोर्ड विश्विद्यालय के डॉक्टर ओलियो मियोतो का कहना है,“पिछले कुछ दशकों में मलेरिया की जो भी सबसे असरदायक दवाइयां हमारे पास थीं वो सब एक के बाद एक बेअसर साबित होती जा रही हैं। मलेरिया के जीवाणुओं में दवाओं के लिए प्रतिरोध विकसित करने की गजब की क्षमता है। लेकिन आर्टीमिसिनिन अभी तक पूरा तो असर कर रही है। ये ऐसा हथियार है जिसे हमें बनाए रखने की जरूरत है।”
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जीवाणुओं का हॉटस्पॉट
वैज्ञानिकों ने पश्चिमी कंबोडिया को मलेरिया के प्रतिरोधी जीवाणुओं के लिए हॉटस्पॉट घोषित किया है।
हालांकि इसके पीछे वजह क्या है इसे वैज्ञानिक भी नहीं समझ पाए हैं। 1950 के बाद से ही इस इलाके में पाए जाने वाले मलेरिया के परजीवियों ने दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली थी।
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अब वैज्ञानिकों की चिंता है कि आर्टीमिसिनिन के साथ भी ऐसा ही होगा।
इस दवाई का मच्छरों से होने वाली बीमारियों के खिलाफ़ पूरी दुनिया में इस्तेमाल किया जाता है। दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर जब इसकी ख़ुराक मरीजों को दी जाती है तो ये कुछ ही दिनों में संक्रमण को खत्म कर सकती है।
आगे के शोध के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में मलेरिया फैलाने वाले 800 प्रकार के जीवाणुओं के जीनोम को जमा किया है। जीनोम जीन के समूह को कहते हैं।
डॉक्टर मियोतो का कहना है,“जब हमने कंबोडिया में पाए जाने वाले मच्छरों के डीएनए के साथ इनकी तुलना की तो पता चला कि उन मच्छरों ने एक अलग ही प्रजाति विकसित कर ली है जिसे हमने अभी तक नहीं देखा था।”
प्रतिरोधक क्षमता
इस के बारे में शोध कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने पाया है कि इस इलाके में मच्छरों के तीन खास समूह हैं जिनमें दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि वो अभी तक ये नहीं समझ पाए हैं कि ऐसे कौन से अनुवांशिक परिवर्तन हुए हैं जिन्होंने परजीवियों को आर्टीमिसिनिन के खिलाफ़ प्रतिरोधी बना दिया है।
हालांकि उनका ये भी कहना है कि इसकी अनुवांशिक संरचना ये समझने में मदद करेगी कि ये कहीं और तो नहीं फैल रहे हैं।
डॉक्टर मियोतो कहते हैं,“इसके जरिए हम जीवाणुओं के अंदर प्रतिरोध विकसित होने के असली समय को समझ सकेंगे।”
इस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इसका असली मकसद मलेरिया परजीवियों के अंदर दवाओं के लिए प्रतिरोधी क्षमता को विकसित होने से रोकना है।
हालिया अनुमानों के मुताबिक 2010 में 21 करोड़ 90 लाख मलेरिया के मामले सामने आए थे। इसी साल मलेरिया की वजह से 6 लाख 60 हजार मौतें भी हुईं।
अफ़्रीका मलेरिया से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला महाद्वीप है। मलेरिया से होने वाली 90 प्रतिशत मौतें यहीं होती हैं।