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तो मंगल पर नहीं है जीवन!
Updated Fri, 20 Sep 2013 03:32 PM IST
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मंगल मिशन पर क्युरीओसिटी रोवर की विफलता से इस सिद्धांत को धक्का लगा है कि मंगल पर जीवन संभव है।
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मंगल पर मीथेन गैस का पता लगाने में क्यूरियोसिटी रोवर की विफलता से उस सिद्धांत को धक्का लगा है जिसके अनुसार इस लाल ग्रह पर किसी तरह के जीवन की कल्पना की जा रही थी।
मंगल मिशन के वैज्ञानिकों के मुताबिक़ दूरबीनों और उपग्रहों ने मंगल पर कम लेकिन महत्वपूर्ण मात्रा में मीथेन गैस देखी, लेकिन छह पहियों वाले रोबेट ''क्यूरियोसिटी रोवर'' को वहां पर ऐसा कुछ नहीं मिला है।
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धरती के वायुमंडल में मौजूद कुल मीथेन गैस का 95 फीसदी का उत्पादन सूक्ष्म जीव करते हैं। मंगल पर सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी के संकेतों से वहां पर जीवन होने के अनुमान का सिद्धांत भी अधर में लटक गया है।
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निराशा
क्यूरियोसिटीज ट्यूनएबल लेज़र स्पेक्ट्रोमीटर (टीएलएस) के मुख्य जांचकर्ता डॉ। क्रिस वेब्स्टर ने कहा, ''पूर्व के परिणामों के आधार पर हम वहां जाने और प्रति अरब 10 पार्ट्स (पीपीबीवी) या इससे अधिक हासिल करने की आशा कर रहे थे। दरअसल, जब आप किसी चीज़ को खोजने जाते हैं और आपको वह नहीं मिलती है तो निराशा होती ही है।''
नासा के इस रोवर की रिपोर्ट साइंस मैगज़ीन के एक ऑनलाइन पेपर में प्रकाशित की गई है। क्यूरियोसिटी रोवर इस लाल ग्रह की हवाओं में मौजूद तत्वों की स्कैनिंग कर रहा है।
इन परीक्षणों से टीएलएस की संवेदनशीलता की सीमा में किसी भी तरह से मीथेन गैस की उपस्थिति का पता लगाना संभव नहीं है।
1.3 पीपीबीवी की मात्रा बहुत कम
इसका मतलब यह हुआ कि यदि वहां यह गैस है तो वह 1.3 पीपीबीवी से अधिक नहीं है, जो कुल 10 हज़ार टन गैस के बराबर है।
यह मात्रा पूर्व के अनुमानों की तुलना में छह गुना कम है। 1.3 पीपीबीवी की मात्रा बहुत कम है और इसने पूर्व के परिणामों पर सवाल खड़ा किया है।
सच्चाई यह है कि क्यूरियोसिटी ज़मीनी स्तर पर काम कर रहा है और एक जगह से मिले इसके परिणाम ज्यादा अहमियत रखने वाले नहीं होने चाहिए, क्योंकि मंगल के वायुमंडल में छह महीने के दौरान काफी कुछ बदल जाता है।
मंगल पर मीथेन की मौजूदगी के कई कारण हो सकते हैं। निश्चित तौर पर केवल सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां ही नहीं होंगी। यह क्षुद्र ग्रहों द्वारा आया हो सकता है या फिर भूगर्भीय प्रक्रियाओं से पैदा हुआ हो सकता है। लेकिन इसका जीवन से संबंध है।
धरती के वायुमंडल में अरबों टन मीथेन
धरती के वायुमंडल में अरबों टन मीथेन गैस है, जो जानवरों के पाचन तंत्र में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों से पैदा होता है।
ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि मंगल की धरती के भीतर मीथेन पैदा करने वाले कुछ सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं। बसंत के मौसम में इनकी उपस्थिति को इस सिद्धांत का आधार बनाया गया था।
इसमें कहा गया था मौसम के अनुसार तापमान बढ़ने से मंगल की सतह पर मौजूद बर्फ़ पिघलेगी और इससे दबे हुए मीथेन गैस वायुमंडल में मिल जाएंगे।
लेकिन डॉ। वेब्स्टर का मानना है कि क्यूरियोसिटी को ठीक-ठाक मात्रा में मीथेन का पता लगाने में मिली विफलता इस स्थिति को खारिज करता है।
उन्होंने बीबीसी से कहा, ''यह निष्कर्ष सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों की संभावना को ख़ारिज नहीं कर रहा है, लेकिन इसने उस संभावना को कम कर दिया है जिसमें कहा गया था कि मीथेन सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कारण है।''
इस टीम के सदस्य प्रोफेसर सुशील अत्रेया का कहना है, ''मंगल पर अब भी अन्य तरह के सूक्ष्म जीव हो सकते हैं। इससे वहां पर मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों का पता लगाना और कठिन हो गया है।''
इस बारे में कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ अमरीका से जुड़े डॉ। जेरोनिमो विलैनुएवा ने धरती से दूरबीन के ज़रिए मंगल के वायुमंडल का अध्ययन किया है। वह किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले और अधिक सटीक मापदंड अपनाने की जरूरत बताते हैं।