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चीन का काला पानी : 'लाओजियो'

Thu, 21 Mar 2013 09:02 PM IST
बीबीसी हिंदी/डेमियन ग्रामैटिकास
बीबीसी हिंदी/डेमियन ग्रामैटिकास Updated Thu, 21 Mar 2013 09:02 PM IST
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know truth of china laojiao

चीन में कम्युनिस्ट सरकार या व्यवस्था से टकराना जुर्म है। अगर किसी ने यह जुर्म किया है तो उसकी सज़ा है 'लाओजियो'। कहने को तो यह एक केवल 'पुनार्शिक्षण' की जगह है। लेकिन यह रूह कंपा देने वाले अनुभवों से भरी हुई।

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इस शिविर में भेजे गए 'भटके हुए लोगों' को साफ़ बताया जाता है कि पढ़ाई का मतलब होगा कम्युनिस्ट पार्टी के आदेश का हर हाल में पालन।

'लाओजियो शिविरों की स्थापना 1950 में हुई थी। अब इनमें व्यवस्था विरोधियों के अलावा नशाखोरों, यौनकर्मियों या सरकार की ओर से प्रतिबंधित धार्मिक समूहों के सदस्यों को रखा जाता है।
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नए प्रधानमंत्री ली केछियांग ने रविवार को अपने पहले संवाददाता सम्मेलन में कहा कि तंत्र में सुधार की योजना पर अधिकारी तेज़ी से काम कर रहे हैं। इसे इस साल के अंत तक शुरू कर दिया जाएगा।
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लगभग पचास साल पहले इन शिविरों को स्थापित किया गया था। इनका मकसद श्रम के जरिए हजारों लोगों को कम्युनिस्ट शासन और उसके तौर तरीके सिखाना था। लेकिन इनमें रहने वाले लोग वहां यातनाएं दिए जाने की भयानक कहानियां सुनाते हैं।

कई मानवाधिकार कार्यकर्ता तो इस तरह के शिविरों को पूरी तरह गैर कानूनी करार देते हैं।

तांग हुई को पिछले साल ऐसे ही एक शिविर में भेजा गया। इसने लोगों के गुस्से को हवा दी थी। अगर इन शिविरों में सुधार होता है, तो वह एक महत्वपूर्ण क़ानूनी क़दम साबित होगा।

तांग हुई हमें उस शिविर में ले गईं, जहां उन्हें रखा गया था। यह जगह हुनान प्रांत के चांगशा से एक घंटे की दूरी पर है।

चुचोऊ बामियालोंग मजदूर शिविर एक भव्य जगह है, इसे जेल की तरह बनाया गया है। इसके पीछे बहुत सी सफ़ेद इमारतें हैं। इनमें से कुछ छह तो कुछ सात मंजिला हैं।

इन सब में वर्कशाप, सब्जियों की क्यारियां और एक परेड मैदान है। यह सब ऊंची चाहरदीवारियों और वाचटॉवरों से घिरा हुआ है।

चीन की 'लाओजियो' सोवियत संघ की 'गुलाग' व्यवस्था की तर्ज़ पर है। 'गुलाग' व्यवस्था सोवियत शासन के दौरान प्रचलन में थी जहां कैदियों को अमानवीय हालात में इसी तरह से सज़ा देने के लिए भेजा जाता था। इस कैंपों में लाखों लाख मौतों का होना दर्ज है।

इन शिविरों को चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के कुछ साल बाद ही शुरू कर दिया गया था। चीन से बाहर के बहुत से लोगों को तो शायद यह भी पता न हो कि इनका अस्तित्व अब भी है या नहीं।

न्याय की लड़ाई
तांग हुई यहां की पुरानी क़ैदी है। वह रोते हुए बताती हैं, ''यह एक बुरा सपना था। वास्तविक बुरे सपने से भी बुरा। मैं इससे जाग सकती थी।''

उनका बुरा समय 2006 में तब शुरू हुआ, जब उनकी दस साल की बेटी घर से लापता हो गई। उसके साथ बलात्कार किया गया था, वह एक आदमी को मिली जो उसे एक स्थानीय कराओके केंद्र ले गया। वहां उसके साथ चार लोगों ने बलात्कार किया। उसे पीटा और यौनकर्मी के रूप में काम करने के लिए मज़बूर किया।

स्थानीय पुलिस ने यह कहते हुए उसकी तलाश में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि वह घर से शायद भाग गई हो। इसके बाद भी तांग हुई ने हिम्मत नहीं हारी और उसकी तलाश जारी रखी, उन्होंने वह जगह खोज ली, जहां उनकी बेटी को रखा गया था।

तांग हुई ने उस व्यक्ति को मौत की सजा देने के लिए व्यापक अभियान चलाया जिसने उनकी बेटी के साथ ऐसा सलूक किया था। लेकिन उन पुलिस और स्थानीय अधिकारियों ने तांग हुई को ही डेढ़ साल के लिए झुझुओ बामियालांग शिविर भेज दिया।

आशा और निराशा
उन्होंने बताया कि यह उनकी आवाज दबाने के लिए की गई बदले की कार्रवाई थी।

वह कहती हैं, ''मैं हताश तो थी। लेकिन एक बूंद आंसू भी नहीं बहाया, क्योंकि मैं जानती थी वे मुझपर हर पल नजर रख रहे हैं।''

उन्होंने बताया, ''वे मुझे तो़ड़ना चाहते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर मैं अपना मामला वापस ले लेती हूं तो मुझे इस जगह से जल्द रिहा कर दिया जाएगा। लेकिन मैंने उनसे कहा कि मैं इस तरह का वादा कभी नहीं करुंगी।'' यह ग़ैर क़ानूनी और ग़लत है।

अन्य लोगों को ही तरह तांग हुई को भी बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना ही मज़दूर शिविर में भेज दिया गया। उन्हें जेल भेजने की कहानी को उनके वकील ने इंटरनेट के जरिए लोगों तक पहुंचाया। इससे लोगों में आक्रोश फैल गया। इसे देखते हुए उन्हें नौ दिन बाद रिहा कर दिया गया।

उन्होंने कहा, ''शिविर में जाने के बाद मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ। मैंने अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई इसलिए लड़ी क्योंकि मुझे लगता था कि कम्युनिस्ट पार्टी मेरे लिए है। मुझे लगता था कि सरकार और पुलिस मेरी मदद करेगी। लेकिन मुझे इस बात की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि वे मुझसे दुश्मन की तरह व्यवहार करेंगे। उन्होंने मेरा बचाव करने की जगह मुझ पर हमला किया।''

चार साल पुराने सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ ऐसे शिविरों में क़रीब एक लाख 60 हज़ार लोग रखे गए थे। लेकिन पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक़ ऐसे 350 शिविरों में 50 हज़ार लोग थे।


सुधार की उम्मीद
बीजिंग के एक वकील पु जिकियांग कहते हैं कि पूरा तंत्र ही चीन के संविधान के खिलाफ़ है। उनके अनुसार बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के लोगों की स्वतंत्रता छीन ली जाती है वो किसी अदालत में तब तक अपील नहीं कर सकते हैं जब तक कि उनकी सज़ा पूरी नहीं हो जाती।

वह कहते हैं कि इससे लगता है कि चीन में क़ानून का शासन नहीं बल्कि पुलिस का दबदबा है।

चीन के नए नेता इस बात को समझते हैं कि यह प्रणाली पूरी तरह अलोकप्रिय हो चुकी है। वे इसमें सुधार पर विचार भी कर रहे हैं।

कई लोगों को लगता है कि सुधार जल्द होंगे। लेकिन बहुतों का मानना है कि पुलिस बदलावों का विरोध कर रही है।

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