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‘बुढ़ापे’ का कारण खोजने वाले डॉ. ओसुमी को नोबल पुरस्कार
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 04 Oct 2016 03:54 AM IST
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इंसान में बुढ़ापे की कारक कोशिकाओं को खोजने वाले जापान के वैज्ञानिक डॉ. योशिनोरी ओसुमी
इंसान में बुढ़ापे की कारक कोशिकाओं को खोजने वाले जापान के वैज्ञानिक डॉ. योशिनोरी ओसुमी इस साल चिकित्सा क्षेत्र में नोबल पुरस्कार के हकदार होंगे। उन्होंने ‘ऑटोफेगी’ नाम से पहचानी जाने वाली उस प्रक्रिया और जीन की खोज की है जिसमें पता चलता है कि शरीर में खत्म होने वाली कोशिकाएं अपने ही नाश से निपटते हुए खुद को ‘रिसाइकल’ भी करती हैं। ‘ऑटोफेगी’ प्रक्रिया के नाकाम होने के कारण इंसान में बुढ़ापा व कोशिका क्षरण होता है। अत: यदि इस प्रक्रिया को नाकाम होने से बचा लिया जाए तो बुढ़ापा, पार्किंसन और कोशिकाओं का क्षरण रोका जा सकता है।
कोशिकाओं की ‘ऑटोफेगी’ प्रक्रिया, इंसान को डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में भी कारगर साबित हो सकती है। दरअसल, ‘ऑटोफेगी’ एक शारीरिक प्रक्रिया है जो शरीर में कोशिकाओं के क्षरण या नाश से निपटती है। डॉ. ओसुमी का यह शोध इस बात का पता लगाने में मदद करेगा कि शरीर में संक्रमण या भूख की हालत कोशिकाएं किस तरह से काम करती हैं। दरअसल, ‘ऑटोफेगी’ ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - खुद को खाना। यह वह प्रक्रिया है जिसमें कोशिकाएं जिंदा रहने के लिए खुद को खाना शुरू कर देती हैं। वर्ष 1960 के दशक में शोधकर्ताओं ने पहली बार यह पाया था कि कोशिकाएं अपनी झिल्लियों को खत्म करते हुए खुद को नष्ट करती हैं और फफोले जैसा कुछ पदार्थ सृजित करती हैं, जिसे रिसाइकल वाले क्षेत्र में भेज दिया जाता है। डॉ. ओसुमी की खोज में इसी क्षेत्र से बीमारी के इलाज की शुरूआत होगी।
यह घोषणा स्टाकहोम स्थित करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के नोबल सम्मेलन के दौरान की गई। पुरस्कार मिलने के बाद योशिनोरी ओसुमी ने कहा कि खबर से वे काफी चकित थे। उन्हें जब यह सूचना मिली तब वे लैब में थे। डॉ. ओसुमी का जन्म 1945 में जापान के फुकुओका में हुआ था और फिलहाल वे टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं। डॉ. ओसुमी ने ‘ऑटोफेगी’ के लिए आवश्यक जीन की पहचान के वास्ते डबलरोटी के खमीर का उपयोग किया और तब कहीं जाकर वे इस प्रक्रिया में काम करने वाले मैकेनिज्म का परीक्षण कर पाए। डॉ. ओसुमी की यह खोज इस बात की नई मिसाल बनी है कि कोशिकाओं द्वारा अपने ही अवयवों की किस तरह पुनरावृत्ति की जाती है।
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कोशिकाओं की ‘ऑटोफेगी’ प्रक्रिया, इंसान को डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाने में भी कारगर साबित हो सकती है। दरअसल, ‘ऑटोफेगी’ एक शारीरिक प्रक्रिया है जो शरीर में कोशिकाओं के क्षरण या नाश से निपटती है। डॉ. ओसुमी का यह शोध इस बात का पता लगाने में मदद करेगा कि शरीर में संक्रमण या भूख की हालत कोशिकाएं किस तरह से काम करती हैं। दरअसल, ‘ऑटोफेगी’ ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है - खुद को खाना। यह वह प्रक्रिया है जिसमें कोशिकाएं जिंदा रहने के लिए खुद को खाना शुरू कर देती हैं। वर्ष 1960 के दशक में शोधकर्ताओं ने पहली बार यह पाया था कि कोशिकाएं अपनी झिल्लियों को खत्म करते हुए खुद को नष्ट करती हैं और फफोले जैसा कुछ पदार्थ सृजित करती हैं, जिसे रिसाइकल वाले क्षेत्र में भेज दिया जाता है। डॉ. ओसुमी की खोज में इसी क्षेत्र से बीमारी के इलाज की शुरूआत होगी।
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यह घोषणा स्टाकहोम स्थित करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के नोबल सम्मेलन के दौरान की गई। पुरस्कार मिलने के बाद योशिनोरी ओसुमी ने कहा कि खबर से वे काफी चकित थे। उन्हें जब यह सूचना मिली तब वे लैब में थे। डॉ. ओसुमी का जन्म 1945 में जापान के फुकुओका में हुआ था और फिलहाल वे टोक्यो इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं। डॉ. ओसुमी ने ‘ऑटोफेगी’ के लिए आवश्यक जीन की पहचान के वास्ते डबलरोटी के खमीर का उपयोग किया और तब कहीं जाकर वे इस प्रक्रिया में काम करने वाले मैकेनिज्म का परीक्षण कर पाए। डॉ. ओसुमी की यह खोज इस बात की नई मिसाल बनी है कि कोशिकाओं द्वारा अपने ही अवयवों की किस तरह पुनरावृत्ति की जाती है।
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कैंसर समेत कई बीमारियों को समझने का रास्ता भी खुलेगा
इंसान में बुढ़ापे की कारक कोशिकाओं को खोजने वाले जापान के वैज्ञानिक डॉ. योशिनोरी ओसुमी
यह खोज कई जैविक प्रक्रियाओं के दौरान संक्रमण के बाद उसके संयोजन में ‘ऑटोफेगी’ के आधारभूत महत्व को समझने का नया रास्ता खोलती है। इसमें बुढ़ापे से निपटने के अलावा और भी कई बीमारियों को समझने का रास्ता खोजा जा सकता है। नोबल सम्मेलन में बताया गया कि ‘ऑटोफेगी’ जीन में जरा सा बदलाव किसी भी बीमारी को पैदा करता है। कैंसर व मस्तिष्क संबंधी बीमारी की कुछ परिस्थितियों में भी यही प्रक्रिया काम करती है।
भूख में जीवित रखने में मदद करती है ‘ऑटोफेगी’ प्रक्रिया
‘ऑटोफेगी’ की सबसे पहली चर्चा 1974 में क्रिटियन डे ड्यूव ने की थी। ‘ऑटोफेगी’ से ही ऑटोफोबिया शब्द बना है, जिसका मतलब होता है अकेले रह जाने का डर। ‘ऑटोफेगी’ एक स्वाभाविक रक्षात्मक प्रणाली है, जो शरीर के जिंदा रहने में मदद करती है। ये शरीर को बिना खाने के जीवित रहने में मदद करती है, साथ ही बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में भी मदद करती है। भूखे रहकर उपवास करने वाले लोगों में यही प्रक्रिया काम करती है।
भूख में जीवित रखने में मदद करती है ‘ऑटोफेगी’ प्रक्रिया
‘ऑटोफेगी’ की सबसे पहली चर्चा 1974 में क्रिटियन डे ड्यूव ने की थी। ‘ऑटोफेगी’ से ही ऑटोफोबिया शब्द बना है, जिसका मतलब होता है अकेले रह जाने का डर। ‘ऑटोफेगी’ एक स्वाभाविक रक्षात्मक प्रणाली है, जो शरीर के जिंदा रहने में मदद करती है। ये शरीर को बिना खाने के जीवित रहने में मदद करती है, साथ ही बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में भी मदद करती है। भूखे रहकर उपवास करने वाले लोगों में यही प्रक्रिया काम करती है।