तो क्या परमाणु बम से तबाह हो जाता जापान का क्योटो शहर?
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रविवार को जापान के नागासाकी में परमाणु बम गिराए जाने के 70 साल पूरे हो गए, लेकिन शुरुआती योजना के मुताबिक नागासाकी उन शहरों में था ही नहीं जिन्हें निशाना बनाया जाना था।
इन शहरों में सबसे ऊपर जापान का प्राचीन शहर क्योटो था, लेकिन वो निशाना बनने से बच गया।हमले से चंद हफ्तों पहले अमरीकी सैन्य जनरलों की एक समिति ने इन शहरों की सूची बनाई थी।
क्योटो की आबादी उस वक्त लगभग 10 लाख थी, वो एक औद्योगिक शहर था और लगभग 2000 बौद्ध मंदिरों के साथ एक बड़ा सांस्कृतिक केंद्र था।
लेकिन 1945 के जून महीने की शुरुआत में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी स्टिमसन ने क्योटो को निशाना बनाए जाने वाले शहरों की सूची से हटाने का आदेश दिया।
'क्योटो में हनीमून'
हेनरी स्टिमसन का तर्क था कि ये एक सांस्कृतिक महत्व का शहर है और एक सैन्य लक्ष्य नहीं है।
स्टीवन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी में वैज्ञानिक इतिहासकार प्रोफेसर एलेक्स वेलरस्टाइन कहते हैं, "अमेरिकी सेना क्योटो को सूची से हटाना नहीं चाहती थी और उसने जुलाई तक इसे सूची में रखा, लेकिन फिर स्टिमसन सीधे राष्ट्रपति ट्रूमैन के पास गए।"
क्योटो को सूची से हटाए जाने के बाद उसमें नागासाकी का नाम जोड़ा गया। लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी फिर भी सैन्य लक्ष्य नहीं थे। वेलरस्टाइन कहते हैं, "लगता है कि स्टिमसन निजी कारणों से क्योटो को बचाना चाहते थे और उनके अन्य कारण बस इसे तार्किक आधार देने के लिए थे।"
माना जाता है कि स्टिमसन ने फिलीपींस का गवर्नर रहते हुए 1920 के दशक में कई बार क्योटो का दौरा किया। कुछ इतिहासकार तो ये भी कहते हैं कि वो अपने हनीमून पर क्योटो में ही गए थे और जापानी संस्कृति के बहुत प्रशंसक थे।
लेकिन 10 हजार से ज्यादा जापानी अमेरिकियों की नजरबंदी के पीछे भी वही थे क्योंकि स्टिमसन कहते थे, "उनके नस्लीय गुण कुछ ऐसे हैं कि हम उन्हें समझ नहीं सकते हैं, उन पर विश्वास नहीं कर सकते हैं।"
'जरूरी थे परमाणु बम'
यह भी एक वजह हो सकती है कि क्योटो को परमाणु बमों की विभीषका से बचाने का श्रेय बहुत समय तक एक अन्य व्यक्ति को जाता रहा।
माना जाता है कि वो अमेरिकी पुरातत्विद् और कला इतिहासकार लैंगडन वार्नर थे, जिन्होंने अधिकारियों को इस बात के लिए मनाया कि क्योटो जैसे सांस्कृतिक केंद्र पर परमाणु बम न गिराए जाएं। यहां तक कि क्योटो और कामाकूरा में वार्नर के सम्मान में स्मारक भी बनाए गए हैं।
क्योटो तो नहीं, लेकिन हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बम से हुई तबाही को झेलना पड़ा। 19 अगस्त को तीसरा बम भी गिराए जाने की योजना थी लेकिन उससे चार दिन पहले ही जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस तीसरे परमाणु बम का निशाना संभवत: टोक्यो में सम्राट का महल था।
परमाणु बमों से हुई तबाही और पीड़ा के बावजूद जापान में ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे युद्ध को खत्म करने के लिए परमाणु बमों की जरूरत थी।
लेकिन अगर क्योटो को तबाह कर दिया जाता, या फिर सम्राट को मार दिया जाता, तो फिर इस त्रासदी के बाद जापानियों के लिए हमलावरों से कभी समझौता करना बहुत ही मुश्किल हो जाता।
नागासाकी में आज
हिरोशिमा और नागासाकी में एटमी बम गिराने और उसके प्रभाव से कुछ दिनों के भीतर कुल लगभग दो लाख लोगों की मौतें हुईं। आज इन लोगों की याद में नागासाकी में कई कार्यक्रम हो रहे हैं।