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ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों है बौद्धों और मुस्लिमों में इतनी तनातनी?
बीबीसी हिंदी
Updated Mon, 27 Nov 2017 04:32 PM IST
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बौद्ध भिक्षु
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पीपल जैसे एक बड़े पेड़ के नीचे कुछ पोस्टर लगे हैं जिनमें एक बौद्ध भिक्षु गुस्से से अगल-बगल चिपकी, विचलित कर देने वाली तस्वीरों को घूर रहा है। तस्वीरों में 'मुस्लिमों के हाथों जलाए हुए और बर्बरता का शिकार' बताए गए बौद्ध लोग हैं। स्टील की चमचमाती बेंचों पर तीन युवा बौद्ध छात्र अंतरराष्ट्रीय अखबार और मैगजीनों में रोहिंग्या संकट से जुड़ी खबरें पढ़ रहे हैं। म्यांमार के मांडले शहर में ये कट्टरवादी बौद्ध भिक्षु अशिन विराथु के मठ का आँगन है।
दो दिन में मेरा यहाँ का सातवां चक्कर है, लेकिन उनके 'सिपहसालारों' ने निराश ही किया है। "आप बीबीसी से हों या कहीं से। आप से बात नहीं करेंगे वो", यही जवाब मिलता रहा है महँगी सिगरेट पीने वाले उनके स्टॉफ से। ये वही विराथू हैं जिन्हें टाइम मैगजीन ने 'फेस ऑफ बुद्धिस्ट टेरर' बताया था और म्यांमार सरकार ने उनके बौद्ध संगठन पर पाबंदी लगा दी है। वजह है विराथू के 'म्यांमार में रहने वाले मुस्लिमों को देश निकाल देने' की धमकियाँ।
पढ़ें- बौद्घ भिक्षु की दैवीय शक्ति ने बदला नींबू का टेस्ट
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अशिन विराथु जैसों की आग उगलती बातों ने दाव चिन चीन यी जैसों को डरा रखा है जो उनके मठ से ज्यादा दूर नहीं रहतीं। इनकी तीन पीढ़ियां मांडले में रहती आई हैं और एक लेखक और कवि होने के अलावा ये अल्पसंख्यक मुस्लिम भी हैं। चिय यी ने कहा, "पहले यहाँ धार्मिक तालमेल था मगर अब सब एक-दूसरे पर शक करने लगे हैं। बढ़ती दूरियां और धर्म के आधार पर बँटे लोगों को देखकर अफसोस होता है। मुझे लगता है कि ज्यादातर बौद्ध धर्मवक्ता अच्छे हैं। लेकिन कुछ बहुत ज्यादा आक्रामक बातें करते हैं। उम्मीद करती हूँ ये सब यहीं रुक जाए।" चाहे बर्मा में एक शासक हो या ब्रिटिश राज का दौर हो, इस आलीशान शहर में सभी धर्म आकर मिलते रहे हैं।
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दो दिन में मेरा यहाँ का सातवां चक्कर है, लेकिन उनके 'सिपहसालारों' ने निराश ही किया है। "आप बीबीसी से हों या कहीं से। आप से बात नहीं करेंगे वो", यही जवाब मिलता रहा है महँगी सिगरेट पीने वाले उनके स्टॉफ से। ये वही विराथू हैं जिन्हें टाइम मैगजीन ने 'फेस ऑफ बुद्धिस्ट टेरर' बताया था और म्यांमार सरकार ने उनके बौद्ध संगठन पर पाबंदी लगा दी है। वजह है विराथू के 'म्यांमार में रहने वाले मुस्लिमों को देश निकाल देने' की धमकियाँ।
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अशिन विराथु जैसों की आग उगलती बातों ने दाव चिन चीन यी जैसों को डरा रखा है जो उनके मठ से ज्यादा दूर नहीं रहतीं। इनकी तीन पीढ़ियां मांडले में रहती आई हैं और एक लेखक और कवि होने के अलावा ये अल्पसंख्यक मुस्लिम भी हैं। चिय यी ने कहा, "पहले यहाँ धार्मिक तालमेल था मगर अब सब एक-दूसरे पर शक करने लगे हैं। बढ़ती दूरियां और धर्म के आधार पर बँटे लोगों को देखकर अफसोस होता है। मुझे लगता है कि ज्यादातर बौद्ध धर्मवक्ता अच्छे हैं। लेकिन कुछ बहुत ज्यादा आक्रामक बातें करते हैं। उम्मीद करती हूँ ये सब यहीं रुक जाए।" चाहे बर्मा में एक शासक हो या ब्रिटिश राज का दौर हो, इस आलीशान शहर में सभी धर्म आकर मिलते रहे हैं।
हिंसा से हालात बदले
म्यांमार
अब हालात बदल चुके हैं। वजह थी 2014 में हुई हिंसा जिसमें बौद्ध और मुस्लिम दोनों हताहत हुए। मांडले में जानकार बताते हैं कि हिंसा भड़कने के बाद कथित बौद्ध युवकों ने मुस्लिम इलाकों पर हमला किया था। नतीजा ये हुआ है कि मुस्लिम समुदाय अपने लोगों के बीच सिमटता जा रहा है। मुस्लिम मोहल्लों ने अपनी गलियों के मुहाने पर बड़े कटीले तार और लोहे के ऊंचे गेट लगवा दिए हैं जो रात को बंद रहते हैं।
एक शाम मैं मांडले की सर्वोच्च बौद्ध कमिटी के ताकतवर भिक्षुओं से मिलने पहुंचा। हाल ही में रखाइन प्रांत से लौटे कमिटी के वरिष्ठ सदस्य यू ईयन दसाका के मुताबिक वहां 'हालात ठीक' हैं। ईयन दसाका ने कहा, "हम लोग कट्टरवादी बातें नहीं करते। हमारे देश में सभी धर्मों को अपनी बात रखने की आजादी है। लेकिन इस्लाम धर्म म्यांमार की सबसे बड़ी दिक्कत है। ये ऐसा धर्म नहीं है जो दूसरे धर्मों के साथ मिल-जुल कर रह सके।"
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने म्यांमार की सेना पर 'जातीय जनसंहार' का आरोप लगाया है और मेरी लाख कोशिशों के बावजूद मुझे रखाइन के हिंसाग्रस्त इलाकों में नहीं जाने दिया गया।
हकीकत ये भी है कि बौद्ध धर्म का पालन करने वाले देश की फौज भी मांडले जैसे बौद्ध धार्मिक केंद्रों से प्रभावित रही है।
इस्लाम के प्रति बढ़ती कट्टरवादिता
पिछले कुछ वर्षों के दौरान बौद्ध राष्ट्रवाद के बढ़ते कद के पीछे इस्लाम के प्रति बढ़ती कट्टरवादिता को भी एक वजह बताया जाता है। लेकिन बहुसंख्यक बौद्ध धर्म मानने वालों के अलावा राजनीतिक दल भी इस बात को खारिज करते हैं। सबसे ज्यादा तनावग्रस्त इलाके रखाइन प्रांत में अराकान नेशनल पार्टी सबसे मजबूत है और उसके महासचिव और पूर्व सांसद तुन औंग च्या ने कहा 'ये अंतरराष्ट्रीय मीडिया की उपज है।'
एक शाम मैं मांडले की सर्वोच्च बौद्ध कमिटी के ताकतवर भिक्षुओं से मिलने पहुंचा। हाल ही में रखाइन प्रांत से लौटे कमिटी के वरिष्ठ सदस्य यू ईयन दसाका के मुताबिक वहां 'हालात ठीक' हैं। ईयन दसाका ने कहा, "हम लोग कट्टरवादी बातें नहीं करते। हमारे देश में सभी धर्मों को अपनी बात रखने की आजादी है। लेकिन इस्लाम धर्म म्यांमार की सबसे बड़ी दिक्कत है। ये ऐसा धर्म नहीं है जो दूसरे धर्मों के साथ मिल-जुल कर रह सके।"
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने म्यांमार की सेना पर 'जातीय जनसंहार' का आरोप लगाया है और मेरी लाख कोशिशों के बावजूद मुझे रखाइन के हिंसाग्रस्त इलाकों में नहीं जाने दिया गया।
हकीकत ये भी है कि बौद्ध धर्म का पालन करने वाले देश की फौज भी मांडले जैसे बौद्ध धार्मिक केंद्रों से प्रभावित रही है।
इस्लाम के प्रति बढ़ती कट्टरवादिता
पिछले कुछ वर्षों के दौरान बौद्ध राष्ट्रवाद के बढ़ते कद के पीछे इस्लाम के प्रति बढ़ती कट्टरवादिता को भी एक वजह बताया जाता है। लेकिन बहुसंख्यक बौद्ध धर्म मानने वालों के अलावा राजनीतिक दल भी इस बात को खारिज करते हैं। सबसे ज्यादा तनावग्रस्त इलाके रखाइन प्रांत में अराकान नेशनल पार्टी सबसे मजबूत है और उसके महासचिव और पूर्व सांसद तुन औंग च्या ने कहा 'ये अंतरराष्ट्रीय मीडिया की उपज है।'
रोहिंग्या मुस्लिमों का मकसद एक अलग इस्लामिक राष्ट्र स्थापित करना है
बौद्ध भिक्षु
उन्होंने कहा, "कट्टर राष्ट्रवाद की उपज.....नहीं सर, ये गलत बात है। इस देश में लोग अपने-अपने धर्मों का स्वेच्छा से पालन करने के लिए आजाद हैं, वैसे बौद्ध यहाँ बहुसंख्यक हैं। हाँ, रोहिंग्या मुस्लिमों का मकसद एक अलग इस्लामिक राष्ट्र स्थापित करना है और उन्हें कुछ देशों का समर्थन भी मिल रहा है।" एक दोपहर मुझे म्यांमार के सबसे बड़े शहर यंगून में इस तरह की सोच के समर्थन में हजारों लोग सड़कों पर एक बड़ी रैली निकालते दिखे। ये लोग रखाइन प्रांत में जारी फौजी कार्रवाई के समर्थन में उतरे थे।
मैं यंगून के पुराने इलाकों में भी गया जहाँ बर्मीज मुसलमान कई सौ वर्षों से रह रहे हैं। एक पुरानी मस्जिद की तस्वीर भर खींच रहा था कि दो गार्ड आकर बोले, "अंदर चलो। इमाम साहब से मिलना पड़ेगा"। भीतर जाने पर इमाम साहब के कमरे में तीन लोग, थोड़ा सहमे और सशंकित से, जानना चाहते थे कि तस्वीर से उनकी मस्जिद को या कौम को कोई नुकसान तो नहीं हो जाएगा।" उधर, कुछ इस बात पर ज्यादा चिंतिंत हैं कि छह लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिमों के पलायन पर म्यांमार के लोकतंत्र समर्थक खामोश क्यों हैं।
मैं यंगून के पुराने इलाकों में भी गया जहाँ बर्मीज मुसलमान कई सौ वर्षों से रह रहे हैं। एक पुरानी मस्जिद की तस्वीर भर खींच रहा था कि दो गार्ड आकर बोले, "अंदर चलो। इमाम साहब से मिलना पड़ेगा"। भीतर जाने पर इमाम साहब के कमरे में तीन लोग, थोड़ा सहमे और सशंकित से, जानना चाहते थे कि तस्वीर से उनकी मस्जिद को या कौम को कोई नुकसान तो नहीं हो जाएगा।" उधर, कुछ इस बात पर ज्यादा चिंतिंत हैं कि छह लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिमों के पलायन पर म्यांमार के लोकतंत्र समर्थक खामोश क्यों हैं।
म्यांमार
खिन जौ विन राजनीतिक मामलों के जानकार हैं और तंपादा थिंकटैंक के निदेशक भी। जौ विन के मुताबिक, "राष्ट्रवादिता या कट्टर राष्ट्रवाद बहुत छोटा शब्द लगता है। ब्रिटिश काल में इसकी बहुत अहमियत थी, लेकिन अब ये एक भय का रूप ले रहा है। एक तरह से इस्लाम का भय जो दिन पर दिन मजबूत हो रहा है। ज्यादा अफसोस ये है कि राजनीतिक दल और बर्मा की फौज भी ऐसी ताकतों को हवा दे रही हैं।"
हकीकत यही है कि म्यांमार में सौ से भी ज्यादा जातीय समूह लंबे अरसे से साथ रहते आए हैं। लेकिन अब वो बात नहीं दिखती। बौद्ध धर्म मानने वालों और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच तनाव गहराता जा रहा है। वजह है राष्ट्रवाद की बढ़ती गूँज।
हकीकत यही है कि म्यांमार में सौ से भी ज्यादा जातीय समूह लंबे अरसे से साथ रहते आए हैं। लेकिन अब वो बात नहीं दिखती। बौद्ध धर्म मानने वालों और अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच तनाव गहराता जा रहा है। वजह है राष्ट्रवाद की बढ़ती गूँज।