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लड़की की मौत के बाद खतना पर विवाद

Sat, 22 Jun 2013 11:03 AM IST
Updated Sat, 22 Jun 2013 11:03 AM IST
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genital mutilation in egypt

कई अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य और मानवाधिकार संगठन महिला ख़तना का वर्षों से विरोध करते रहे हैं। मिस्र में भी 2008 में इसे ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया लेकिन इन सबके बावजूद महिला ख़तने की प्रथा कई जगहों पर प्रचलित है।

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एक अनुमान के अनुसार मिस्र के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में तो लगभग 75 फ़ीसदी महिलाओं को इससे गुज़रना पड़ता है लेकिन कुछ शहरी इलाक़ों में भी अब ये प्रथा आम होती जा रही है।
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मिस्र के शहर गीज़ा की रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला सामया मोहम्मद अब्दुल रज़्ज़ाक़ कहती हैं, ''मैंने अपनी तीनों बेटियों का ख़तना करवा दिया था जब वो 11 साल की थीं। मैंने उनसे कह दिया था कि ये बहुत ज़रूरी है और ये उसी तरह है जैसे कि मान लें कि आपके टॉंसिल का ऑपरेशन हो रहा है।''
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लेकिन सच्चाई ये है कि इस प्रक्रिया के तहत महिला गुप्तांग के एक हिस्से को काट दिया जाता है और ग्रामीण इलाक़ों में तो ये ऑपरेशन एनेस्थिसिया दिए बग़ैर किया जाता है।

इन सबको ख़ारिज करते हुए सामया कहती हैं कि उनकी बेटियों के ख़तने के बाद तो परिवार में जश्न मनाया गया था और उन्हें पूरी उम्मीद है कि उनकी पोतियों का भी ख़तना किया जाएगा।

पूर्वोत्तर और पश्चिमी अफ़्रीक़ा के कई इलाक़ों में महिलाओं के ख़तने की रस्म बहुत व्यापक है और कई अध्ययनों में पाया गया है कि इसके कारण कई बार तो युवतियों की जान तक चली गई है।

इसी महीने यानी कि जून, 2013 में मिस्र की राजधानी क़ाहिरा के उत्तर में बसे एक गांव की रहने वाली एक लड़की 13 साल की सुहैर अल-बता की ख़तना करते समय हुई मौत ने इस विवाद पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।

शुरूआती जानकारी के अनुसार ख़तना के समय काफ़ी ख़ून बहने से उसकी मौत हुई थी।

'महिलाओं का अपमान'
मिस्र के राष्ट्रीय महिला परिषद की शोध शाखा की प्रमुख डॉक्टर नगला अल-अदली महिलाओं के ख़तना के नकारात्मक प्रभाव का ज़िक्र करते हुए कहती है, ''ये प्रथा महिलाओं के लिए अपमान है।

वो तो इस आतंक की शिकार हैं। महिलाएं दुखी रहती हैं और इस प्रक्रिया में उन्हें काफ़ी पीड़ा से गुज़रना पड़ता है और सबसे शर्मनाक बात ये है कि अचानक उनका ऑपरेशन कर दिया जाता है।''

डॉक्टर नगला के अनुसार मिस्र में ये एक प्राचीन क़बायली प्रथा है लेकिन धर्म के आधार पर इसे सही ठहराने की कोशिश की जाती है।

उनके अनुसार इससे महिलाओं की धार्मिक समझ पर भी असर पड़ता है। वो कहती है, ''जब लड़कियों को ये बताया जाता है कि उनका ख़तना किया जाना एक धार्मिक प्रक्रिया है तो उन लड़कियों को लगता है कि इस्लाम उनके ख़िलाफ़ है। इससे इस्लाम के बारे में महिलाओं की सोच भी बदल जाती है।''

डॉक्टर नगला के अनुसार सबसे अफ़सोस की बात ये है कि 2008 में ही प्रतिबंधित इस का़नून पर अमल करने के लिए किसी भी राजनीतिक पार्टी मे कोई इच्छा शक्ति नहीं है। सत्ताधारी मुस्लिम ब्रदरहुड के हाल में दिए गए कई बयान तो इस प्रथा की वकालत करते हैं।

'मीडिया से उम्मीद'
डॉक्टर नगला के अनुसार अब ये मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों का नज़रिया बदलने के लिए अभियान चलाए या फिर धार्मिक नेताओं की ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को बताएं कि इसका इस्लाम या ईसाई धर्म से कोई लेना देना नहीं है।

लेकिन धार्मिक नेताओं की राय भी इस मामले में स्पष्ट नहीं है। मिस्र के कुछ धार्मिक नेता कह चुके हैं कि महिलाओं के ख़तना का कोई धार्मिक आधार नहीं है लेकिन कई धर्म गुरू इसकी खुलेआम पैरवी करते हैं।

शेख़ यूसुफ़ अल-बदरी नाम के एक धार्मिक नेता ने मिस्र की अदालत से कई बार अपील की है कि वो महिलाओं के ख़तना को दोबारा क़ानूनी क़रार दें।

शेख़ अल-बदरी का मानना है कि महिलाओं के ख़तना किए जाने का आदेश अल्लाह की तरफ़ से आया है और हर हालत में उसका पालन किया जाना चाहिए।

शेख़ अल-बदरी के अनुसार ख़तना करने से युवा होती लड़कियों और महिलाओं में यौन इच्छा को क़ाबू करने में मदद मिलती है क्योंकि बदरी का मानना है कि महिलाओं में पुरूषों की अपेक्षा बहुत जल्दी यौन इच्छा जागती है।

शेख़ अल-बदरी की दलील का प्रभाव अब मिस्र के समाज में भी दिखने लगा है और शायद यही वजह है कि तीन बेटियों का ख़तना कराने वाली सामया मोहम्मद अल-रज़्ज़ाक़ भी शेख़ बदरी का हवाला देकर इसे सही ठहराती हैं।


सामया को तो ये भी पता नहीं कि मिस्र में इसे ग़ैर-क़ानूनी क़रार दिया गया है। मिस्र में मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए मिस्र की मौजूदा सरकार कुछ नहीं कर रही है।

इसलिए उन संगठनों को डर है कि मिस्र में महिला ख़तना की प्रथा को समाप्त करना और भी कठिन होता जा रहा है।

अलीम मकबूल (बीबीसी संवाददाता, क़ाहिरा)

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