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बर्लिन की दीवार को फिर गिराने पर बवाल

Sun, 10 Mar 2013 04:58 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Sun, 10 Mar 2013 04:58 PM IST
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controversy over demolition of berlin wall

बर्लिन की दीवार का गिरना 20वीं सदी की सबसे अहम घटनाओं में से एक है। लेकिन इस दीवार को फिर गिराने की तैयारी हो रही है, जिसका वहां खासा विरोध हो रहा है।

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अब इस दीवार के लिए बड़े राजनीतिक हित नहीं, बल्कि आर्थिक और कलात्मक हित टकरा रहे हैं। जब पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी ने फिर से होने का फैसला किया तो 1989 में 155 किलोमीटर लंबी बर्लिन की दीवार को गिरा दिया गया था लेकिन इसके कुछ हिस्सों को यादगार के तौर पर रहने दिया गया।
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दुनिया भर के कई कलाकारों ने आजादी से जुड़े अपने विचारों को दीवार के इन हिस्सों के जरिए कलात्मक अभिव्यक्ति दी थी। कई लोगों ने इसे बर्लिन वॉल गैलरी का नाम दिया। ये दीवार बर्लिन जाने वाले पर्यटकों को अपनी तरफ खींचती है। लेकिन अब इस पर संकट मंडरा रहा है।
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ऐतिहासिक धरोहर
अब ये दीवार बर्लिन में कुछ बड़ी निर्माण परियोजनाओं में बाधा बन रही है और इसे गिराने की तैयार हो रही है। इस बात से न सिर्फ दीवार पर पेंटिग बनाने वाले कलाकार बल्कि उसके पास रहने वाले लोग भी खफा हैं।

टिएरी नुआ भी इस दीवार पर चित्रकारी करने वाले लोगों में शामिल हैं। वो दीवार के हिस्सों को हटाने का कड़ा विरोध कर रहे हैं।

वो कहते हैं, “मैं दीवार को हटाए जाने के फैसले से बहुत दुखी हूं। खास कर ये हिस्सा जो दीवार का आखिरी सबसे लंबा हिस्सा है। इसकी दूरी 1।3 किलोमीटर है। ये दीवार युवा पीढ़ी को बताती है कि वो उन गलतियों को न दोहराएं जो उनसे पहले की पीढ़ियों ने की थी।”

बर्लिन की दीवार दूसरे विश्व युद्ध के बाद लंबे समय तक चले शीत युद्ध की अहम धुरियों में से एक थी। ये दीवार पूर्व सोवितय संघ और अमरीका के नेतृत्व वाली पश्चिमी ताकतों की नीतियों को बहुत हद तक प्रभावित किया करती थी।

कम्युनिस्ट पूर्वी बर्लिन में रहने वाले लोगों के लिए इस दीवार को पार कर पश्चिमी बर्लिन में जाने की बात सोचना भी जान को जोखिम में डालने के बराबर था।

नए टकराव
टिएरी नुआ का कहना है कि उन्होंने इस दीवार पर पेंटिग प्रसिद्ध होने के लिए नहीं की थी, बल्कि वो चाहते थे कि ये दीवार बनी रहे। चूंकि सफेद दीवार बहुत ऊबाऊ लग सकती है, इसलिए कलाकारों ने इसे रंग दिए।

आर्नो पाओलोस इस दीवार के पास ही रहते हैं। वो भी दीवार के हिस्सों को हटाने का विरोध कर रहे हैं। वो नहीं चाहते कि इस दीवार की बजाय उनके पड़ोस में एक आलीशान होटल बने।

वो कहते हैं कि ये दीवार इतिहास की अमूल्य धरोहर है। उनके अनुसार, “बहुते से लोग यहां आते हैं और कहते हैं कि जरा सोचो कि यही वो दीवार है जो पूर्व और पश्चिम के बीच टकराव की एक बड़ी वजह थी, लेकिन एक दिन इसे खत्म कर दिया गया। मुझे ये सुन कर अच्छा लगता है। इसलिए इस धरोहर को खत्म नहीं किया जाना चाहिए।”


बेशक पुराने टकराव तो अब नहीं हैं। लेकिन उनकी जगह नए टकरावों ने ली है। बेशक शहर की जरूरतें बढ़ रही हैं। लेकिन बर्लिन के बहुत से लोग अपने शहर की निशानियों को भी खत्म होते नहीं देखना चाहते हैं।

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