लड़ाकू निंजा खात्मे की कगार पर

Ashok Kumar Updated Sat, 01 Dec 2012 02:57 PM IST
combat ninja on verge of extinction
ख़ास तरह के हथियार और उतना ही ख़ास परिधान, घातक मुद्रा और गज़ब की फुर्ती- ये पहचान है जापान के परम्परागत लड़ाकू योद्धा निंजा की जो पलक झपकते ही दुश्मन को धूल चटा सकते हैं।

लेकिन हर कला को कद्रदानों की ज़रूरत होती है और ऐसी कला जो पिता से पुत्र को विरासत में मिलती रही हो, परिवेश और प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ने में देर नहीं लगाती है।

शायद यही वजह है कि जापान में ये युद्धकला अब दम तोड़ रही है जहां बहुत ढूंढने पर भी एक-दो से ज्यादा निंजा नहीं मिलेंगे और जो खुद कहते हैं कि वे आखिरी निंजा होंगे।

निंजा के बारे में रोचक मिथकों की कमी नहीं है, शायद यही वजह है कि फिल्मकार और उपन्यासकार रूपहले पर्दे और कागज़ों पर कल्पना के बूते ऐसे किरदार गढ़ते रहे हैं जिनका तानाबाना निंजा के इर्दगिर्द बुना होता था।

हॉलीवुड की फिल्मों में निंजा को ऐसे सुपर-हीरो की तरह दर्शाया जाता रहा है जो पानी पर सरपट दौड़ लगाता है और पलक झपकते ही गायब हो जाता है।

खानदानी निंजा

निंजा म्यूज़ियम के मुताबिक, जिनिची कावाकामी, जापान के आखिरी निंजा ग्रैंडमास्टर हैं।

माना जाता है कि कुछ निंजा अब खेती-किसानी में जुटे हैं और कुछ जासूसी वगैरह का काम करने लगे हैं।

खुद कावाकामी एक दक्ष इंजीनियर हैं जिन्होंने इंजीनियरिंग बाकायदा सीखी है।

वो अब ऐसे सूट-बूट पहनते हैं कि किसी जापानी कारोबारी की तरह नज़र आते हैं।

लेकिन जापान का आखिरी निंजा होने का गौरव सिर्फ कावाकामी को हासिल नहीं होगा।

क्योंकि 80 साल के मसाकी हत्सूमी का दावा है कि उनका ताल्लुक भी एक निंजा खानदान से है।

न जरूरत न अहमियत

कावाकामी और हत्सूमी दोनों ही दावा करते हैं कि उनकी वंश की जड़ें प्राचीन निंजा लड़ाकू योद्धाओं से जुड़ी हैं।

लेकिन दोनों ही कहते हैं कि वे अपने परिवार से किसी को अगला निंजा ग्रैंडमास्टर नहीं बनाएंगे। यानी वाकई ये युद्ध-कौशल अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है।

आखिर क्या वजह है कि खुद इस कला में प्रवीण होने के बावजूद कावाकामी अपने परिवार से किसी को अगला ग्रैंडमास्टर नहीं बनाना चाहते हैं।

वो बताते हैं, ''गृहयुद्ध या ईडो काल में जासूसी, लड़ाई, खतरनाक और कारगर दवाएं तैयार करने की निंजा की काबिलियत बड़ी उपयोगी थी। लेकिन आधुनिक युग में अब हमारे पास बंदूकें हैं, इंटरनेट है और बेहतर दवाएं हैं। इसलिए अब इस कौशल की कोई जरूरत नहीं है। ''

यही वजह है कि अब वो किसी को ये कला सिखाते नहीं है, बस इसके अतीत के बारे में यूनिवर्सिटी में पार्ट-टाइम पढ़ाते हैं।

वैसे तो उनके कई शिष्य हैं, लेकिन उन्होंने किसी को अपना वारिस नहीं चुनने का फैसला किया है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि निंजा भले ही खत्म हो जाएं, उनसे जुड़े मिथक जारी रहेंगे।

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