इस शहर में सब्जी से सस्ती मिलती हैं मशीनगन की गोलियां

औलिया अतराफी Updated Mon, 12 Jun 2017 03:22 PM IST
city where bullets are cheaper than vegetable
- फोटो : bbc
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अमरीकी हमले के बाद बेदखल होने वाला तालिबान एक बार फिर अफगानिस्तान पर कब्जा जमा रहा है। देश अभी भी युद्ध की स्थिति में है और हाल के दिनों में कई खूनी हमले किए गए। दक्षिण के कुछ महत्वपूर्ण शहर तालिबान के कब्जे में हैं। बीबीसी संवाददाता औलिया अतराफी को तालिबान चरमपंथियों ने आमंत्रित किया और कहा कि वह चार दिन उनके साथ हेलमंद में बिताएं और उनके कब्जे वाले इलाकों में जिंदगी का जायजा लें। संगीन नामक कस्बे में मिट्टी से बने एक घर के अहाते में दो दर्जन के करीब लोग बैठे थे। पूर्णिमा की रात में उनकी काली पगडियों की छाया उनके धूप में झुलसे चेहरों को और भी गहरा कर रही थी। यह तालिबान के विशेष दस्ते 'रेड यूनिट' से जुडे लोग हैं। वह अपनी एमफोर मशीन गनों को हिलाते हुए चुपचाप बैठे अपने कमांडर मुल्ला तकी को सुन रहे थे जो उन्हें युद्ध की कहानियाँ सुना रहे थे। नाइट विजन से सजी यानी रात में देखने की क्षमता रखने वाली ये एमफोर बंदूकों का ही कमाल था कि उन्होंने हेलमंद के 85 फीसदी हिस्से को सशस्त्र अफगान बलों से छीन लिया था।
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काबुल से हेरात
लेकिन यही जीत तालिबान नेताओं के लिए एक बडी चुनौती लेकर आई है जिसे स्वीकार करना उनके लिए मुश्किल पड रहा है। जिन लोगों पर अब उनकी हुकूमत है वे एक दशक से ज्यादा अर्से से सरकारी सेवाओं और सुविधाओं के आदि रहे हैं। स्कूल, अस्पताल, विकास कार्य, लोग इन सब बातों के आदि हो चुके हैं। तो क्या अब एक ऐसा गुट जिसका मकसद केवल इलाके पर कब्जा करना है, वह उनकी जगह ले सकता है जो यहां कल तक सिस्टम चलाने की कोशिश कर रहे थे। तालिबान के इलाके में जाने के लिए रास्ता बनाने में हमें महीनों लग गए। बरसों बाद एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस के पत्रकार को ऐसी पहुँच दी गई। मई के महीने में हम एक बाइक सवार नौजवान के पीछे चलते हुए सरहद पार कर उनके इलाके में दाखिल हुए। हम काबुल से हेरात होते हुए कंधार जाने वाली मुख्य सडक पर कंधार की ओर चल पडे। अफगान नेशनल आर्मी की चौकी के तुरंत बाद वह लडका अचानक बाईं ओर मुडा और हाइवे पीछे रह गया। यहाँ कहीं-कहीं आबादी थी। उसने हमें दो तालिबान गार्ड के हवाले कर दिया।

'एलिफेंट इन द रूम'

एक हमारे साथ कार में बैठा, जबकि दूसरा मोटरसाइकिल पर बैठकर हमें रास्ता दिखाने लगा। यहां तालिबान के एक स्पेशल कमांडर मुल्ला तकी हमारा इंतजार कर रहे थे। वह अपने आदमियों के एक समूह के साथ खडे थे जिनके पास आधुनिक हथियार थे। इस यात्रा के दौरान हमारे साथ लगातार तालिबान की मीडिया टीम थी। हमें ऐसी किसी बात की रिकॉर्डिंग करने की इजाजत नहीं थी जिसका संबंध अफीम से होता। इस क्षेत्र में अफीम का कारोबार आम है। अफगानिस्तान दुनिया भर की अफीम का 90 प्रतिशत पैदा करता है। इसी से तालिबान को पैसा मिलता है। मैंने उनके मीडिया प्रमुख असद अफगान को अंग्रेजी अवधारणा 'एलिफेंट इन द रूम' का मतलब समझाने की कोशिश की। तो उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा और कहा 'अफीम हमारी आर्थिक जरूरत है, लेकिन हम भी इससे उतनी ही नफरत करते हैं जितना कि आप करते हैं।'
हकीकत ये है कि अफीम से प्राप्त होने वाली रकम तालिबान के लिए अहम है क्योंकि इससे वे हथियार खरीदते हैं और अपनी लडाई के लिए कुमुक और रसद का इंतजाम करते हैं। हमने तालिबान की प्रशासनिक क्षमता का पहला निरीक्षण वहाँ के बाजार में किया। संगीन में एक दशक से अधिक समय से भीषण लडाई छिडी हुई है।

कैद और जुर्माना
सैकडों ब्रितानी, अमरीकी और अफगान सैनिकों ने यहां जानें गंवाईं और आखिरकार इस साल मार्च में यह तालिबान के हाथ आ गया। संगीन का पुराना बाजार लडाई के दौरान नष्ट कर दिया गया था। हम इसकी जगह पर बनाए गए बाजार से गुजर रहे थे जो तिरपालों और संदूकों का समंदर था। एक ठेले पर दो लोग बहस कर रहे थे।
दुकानदार हाजी सैफुल्लाह चिल्ला रहा था, 'पढ नहीं सकता, मुझे कैसे पता चलाता है कि ये बिस्कुट पुराने हो चुके हैं?' उसने परेशानी से अपनी पगडी को ठीक किया।
दूसरे व्यक्ति संगीन के तालिबान के मेयर नूर मोहम्मद थे। उन्होंने हाजी सैफुल्लाह को तीन दिन की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद मेयर ने पेट्रोल कंटेनर की जांच की कि क्या वे सही मात्रा डाल रहे हैं या नहीं। इसके बाद उन लोगों की जांच की गई जिनका दावा था कि वह डॉक्टर हैं, लेकिन मेयर को संदेह था कि वे झूठ बोल रहे हैं। इसके बाद हम मूसा के किले गए जो तालिबान की राजधानी है। मूसा का किला अफीम के धंधे के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन यह जिला व्यापार का गढ भी है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों से व्यापारी यहां आते हैं।

तालिबान का बाजार
इस बाजार से आप बाइक से लेकर मवेशी और आइसक्रीम से लेकर गैर पारंपरिक चीजें जैसे गोला बारूद भी खरीद सकते हैं। एके-47 की गोलियां यहाँ 25 रुपये प्रति गोली मिल जाती हैं। रूस निर्मित मशीनगन की गोलियां 40 रुपये प्रति गोली मिलती थी, लेकिन उनकी कीमत घटकर 15 रुपये कर दी गई है क्योंकि बकौल दुकानदार उनमें से ज्यादातर अफगान सुरक्षाबलों के कब्जे में ली गई हैं। हालांकि संगीन के तालिबान की ओर से स्वास्थ्य, सुरक्षा और व्यावसायिक गुणवत्ता पर ध्यान रखना आश्चर्यजनक था और अब मूसा के किले की दूसरी चीजों पर हमारा ध्यान गया। तालिबान की राजधानी होने के बावजूद यहां स्कूल और अस्पताल काम कर रहे थे और उनके लिए पैसा काबुल की सरकार की तरफ से ही आ रहा था। मूसा के किले में सरकार की ओर से तैनात शिक्षा विभाग के प्रमुख अब्दुल रहीम का कहना था 'सरकार ने हाल ही में समीक्षा की है, हमारे स्कूल आधिकारिक तौर पर पंजीकृत हैं, हमारे वेतन जो एक साल से रुके हुए थे, अब जारी कर दिए गए हैं।' उन्होंने बताया कि तालिबान को सरकारी निरीक्षकों से कोई समस्या नहीं हुई और ये सिस्टम चल रहा है। उन्होंने बताया, 'सरकार ने हमें स्टेशनरी और बाकी सब चीजें दी हैं। हम सरकारी पाठ्यक्रम पढा रहे हैं और तालिबान को इससे कोई समस्या नहीं है।'

काफिर बन जाने का खौफ

लेकिन यहाँ सब कुछ इतनी आसानी से नहीं चल रहा है। अमरीकी सरकार की अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था यूएसएड के अनुसार पूरे अफगानिस्तान में स्कूल जाने वाले छात्रों में 40 फीसदी लडकियां हैं। लेकिन मूसा के किले में ऐसा नहीं है। तालिबान की राजधानी में 12 साल से अधिक की कोई भी लडकी स्कूल नहीं जाती। लेकिन तालिबान के आने से बहुत पहले से ही यहाँ लडकियां शिक्षा से वंचित थीं क्योंकि यह बहुत ही रूढिवादी क्षेत्र है। उधर लडकों के लिए यहाँ अपर्याप्त बुनियादी सुविधाएं हैं। एक छात्र का कहना था, 'हमारा स्कूल अच्छा चल रहा है, सुरक्षा है लेकिन समस्या यह है कि हमारे पास पर्याप्त किताबें नहीं हैं। किसी के पास गणित की किताब नहीं है तो किसी के पास केमिस्ट्री की किताब नहीं, सभी बच्चों के पास एक जैसी किताबें भी नहीं हैं।' यहाँ मुझे ऐसा लगा कि तालिबान कम से कम अपनी पुरानी सरकारों के उलट लोगों को शिक्षा तक पहुँच दे रहे हैं, भले ही ये कम ही लोगों को मिल रही हो। साल 2001 से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कम लडके स्कूल जाते थे। लेकिन बिस्कुट विक्रेता हाजी सैफुल्लाह जैसे मामलों की वजह से ग्रामीण अफगानियों को इस बात का एहसास हुआ कि तालीम उनके लिए कितनी महत्वपूर्ण है। उन्हें अपने पूर्वजों की तरह काफिर बन जाने का खौफ नहीं रहा था।

आधुनिक दुनिया
जाहिर है कि अब तालिबान को एहसास हो गया है कि वह आधुनिक दुनिया के साथ हमेशा नहीं लड सकते, इसलिए उनमें से कुछ ने उसे अपनी शर्तों पर अपनाने का फैसला कर लिया है। तालिबान के मीडिया कोऑर्डिनेटर असद अफगान ने अपना पक्ष समझाते हुए कहा, 'इस आग ने शायद हमारा घर तो जला दिया है, लेकिन उसने हमारी दीवारों को मजबूत भी कर दिया है।' उनका मतलब था कि तालिबान ने पहले खुद को आधुनिक दुनिया से दूर करने की गलतियों से सबक सीखा है। कई लोगों का कहना है कि हालांकि यहां आजादी कम है, लेकिन तालिबान के आने से सुरक्षा बेहतर हुई है। इस इलाके में एक समय तक सेना और चरमपंथियों की लडाई होती रहती थी, लेकिन अब यहाँ व्यापार में नाटकीय वृद्धि हुई है। लोगों का कहना है कि पूर्व प्रशासन की तुलना में तालिबान के निजाम में कई खामियां हैं, लेकिन ये लोग फौरन इंसाफ करने को तरजीह देते हैं। उनके अनुसार पुरानी व्यवस्था में भ्रष्टाचारीयों और दोषियों को बचाया जाता था। हमने जिला अस्पताल का भी दौरा किया, यह भी स्कूल की तरह ही सरकारी सहायता से चल रहा था, लेकिन उसका प्रबंधन तालिबान के हाथ में था।

तालिबानी ऑब्जर्वर
ये अस्पताल एक लाख 20 हजार की आबादी के लिए है, लेकिन यहाँ कई मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। यहां एक भी महिला डॉक्टर नहीं है और न ही बच्चों के लिए कोई चिकित्सक। यहाँ तो छाती का एक्स-रे कराना भी संभव नहीं है। महिला रोगियों के लिए तालिबान ने एक अलग इमारत में इंतजाम कर रखा है जहां स्टाफ में महिलाएं ही हैं।
एक डॉक्टर का कहना था कि दोहरी व्यवस्था के कारण दिक्कतें पैदा हो रही हैं और भ्रष्टाचार के लिए रास्ते खुल गए हैं, 'मुझे छह महीने से वेतन नहीं मिला है, न केवल मुझे बल्कि मेरे अस्पताल के सारे कर्मचारियों को भी सैलरी नहीं मिली है।' उन्होंने कहा, 'सरकारी ऑब्जर्वर कागज पर बातें लिख देते हैं जो हकीकत में नहीं होतीं। हमारे लिए तीन महीने के लिए आने वाली दवाएं एक महीने नहीं चलतीं क्योंकि तालिबान को दवाएं अपने लिए चाहिए होती हैं।' हमने स्वास्थ्य विभाग के तालिबानी ऑब्जर्वर अताउल्लाह से पूछा कि क्या हम किसी महिला नर्स से बात कर सकते हैं तो उन्होंने इसके लिए मना कर दिया। चार दिन के प्रवास के दौरान मैंने महिलाओं को या तो अस्पताल में देखा या पुरुषों के साथ कहीं जाते हुए। यहाँ महिलाएं नजरों से दूर घरों में रहती हैं। अगर तालिबान यहां न भी होते तो ये स्थिति शायद अलग न होती।

मोबाइल और इंटरनेट पर बैन

यहाँ कुछ चीजों की सीमा निर्धारित है। मूसा के किले में सुरक्षा और धार्मिक कारणों से मोबाइल फोन और इंटरनेट के इस्तेमाल पर बैन है। हमारे तालिबान मेजबान वॉकी-टॉकी से बात करते थे। वीडियो बनाना या संगीत वाद्ययंत्र बजाना भी वर्जित है। एक युवक ने बताया कि उसे बॉलीवुड फिल्म देखने पर 40 कोडे लगाए गए। तालिबान ने नाच-गाने पर रोक लगाई। उन्होंने समलैंगिकता के खिलाफ भी सख्ती बरती। हालांकि ऐसा भी लगता है कि तालिबान की कानूनी प्रक्रिया दबाव और रिश्वत की भी शिकार है। इस संबंध में हमें विरोधाभास भी दिखे। जैसे हमें वीडियो रिकॉर्डिंग की इजाजत नहीं दी गई। हमने ऐसे होर्डिंग देखे जिन पर दंत चिकित्सा उपचार से संबंधित पश्चिमी महिलाओं की तस्वीरें थीं। अतीत में तालिबान ऐसी तस्वीरों पर प्रतिबंध लगाते थे। इंटरनेट पर प्रतिबंध के बावजूद कई जगहों पर वाई-फाई हॉटस्पॉट थे जो बाहरी दुनिया से संपर्क का स्रोत थे। तुर्की और भारतीय नाटकों के कुछ विशेष प्रशंसकों के पास छोटे सैटेलाइट डिश से जुडे टीवी सेट थे। मैंने एक युवक से पूछा कि तुम्हें डर नहीं लगता कि तालिबान को पता चल जाएगा। उसने कहा कि 'उन्हें हमारे टीवी और वाई-फाई के बारे में पता है। लेकिन मेरे विचार से वह बस इंतजार कर रहे हैं कि वहाँ क्या होता है।'

युद्ध पर फोकस
सफर के दौरान हमें पता था कि तालिबान हमारे साथ सावधानी बरत रहे हैं ताकि उनका अच्छा प्रभाव स्थापित हो। इसके साथ ही संगीन और मूसा के किले उनके लिए अहम हैं, इसलिए वे स्थानीय लोगों को खुश रख रहे हैं। हमें पता चला कि अन्य जगहों पर तालिबान का नियंत्रण और अधिक कठोर है। तालिबान के लिए नई चीजों के साथ तालमेल बिठाना एक दर्दनाक अनुभव है। अगर वे इसे स्वीकार करते हैं तो फिर मजहबी औचित्य खो देने का खतरा दिखता है और अगर इसे आप अस्वीकार करते हैं तो आप एक टापू बन कर रह जाते हैं। जब बात प्रशासन की होती है तो इसकी कमी उनकी दुखती रग बन जाती है। शुरुआत से ही उनका ध्यान युद्ध पर रहा है और ऐसे में राजनीतिक सोच के पैदा होने की कम ही गुंजाइश रह जाती है। उनकी सफलता उनकी सबसे बडी दुश्मन बन गई है। इस बात को एक स्कूल प्रिंसिपल ने कुछ यूं समझाया, 'तालिबान सब कुछ युद्ध के लेंस से देखते हैं और वे युद्ध जीतने को जीवन का एकमात्र उद्देश्य समझते हैं।' मैंने उन्हें याद दिलाया कि तालिबान में अनुशासन का भाव है तो क्या जंग के प्रति अपनी आस्था को वे राजनीतिक कला में नहीं बदल सकते? उन्होंने अपना सिर झुका लिया, कुछ देर विचार करते रहे और फिर संदेह व्यक्त करने के तरीके में सिर हिलाया। उनके विचार में ऐसा नहीं हो सकता है।

पवित्र किताब

रात को हमने स्थानीय तालिबान नेताओं के साथ खाना खाया और इन बातों पर उनके साथ बात की। एक शाम एक तालिबान नेता ने हमें अफगान सरकार की विफलताओं का जिक्र करते हुए तालिबान सरकार में रहने के लाभ समझाने की कोशिश की। लेकिन मुझे लगा कि वे जिस तरह की दुनिया बनाना चाहते हैं, वो मानव समाज के लिए मुफीद नहीं है। मैंने उन्हें बताया कि समाज हमेशा बदलता रहता है और इस बात पर आश्चर्य जताया कि अगर कोई सरकार इसे हमेशा एक जैसा रखना चाहे तो वह कितनी कामयाब होगी। तालिबान नेता मोसव्विर साहब नाटे कद के लंबी दाढी वाले व्यक्ति हैं जिनकी आंखें नीली हैं। वे अडे हुए थे, 'हमारा शासन पवित्र पुस्तकों पर आधारित है। ये किसी मानव समाज के लिए सबसे अच्छा उपाय है।' उन्होंने कहा, 'अफगान खुद को नए माहौल में ढाल लेने वाले होते हैं। जब हमने पहली बार सरकार संभाली तो बहुत ही जल्दी लोग हमारी तरह रहने लगे। जब अमरीकी आए तो वे अमरीकियों की शैली अपनाने लगे। इसलिए वे फिर से हमारे शासन में ढल जाएंगे।' वे इस विचार को समझ ही नहीं पा रहे थे कि लोग तालिबान का विरोध कर सकते हैं।

विद्रोही समूह
सरकार प्रशासित क्षेत्र में वापस आने के बाद मैंने यह महसूस किया कि विद्रोही समूह के बारे में बताना बहुत आसान नहीं है और वे लोग अलग से हैं। तालिबान में काफी बदलाव आया है, लेकिन इसके साथ ही वे अपने अतीत से चिपके हुए हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें आधुनिक दुनिया के साथ ढलना है, लेकिन वे यह सोचते हैं कि उनके तरीके वाली सरकार अच्छी है। जिन क्षेत्रों पर उनका नियंत्रण है ऐसा लगता है कि वहाँ वे शांतिपूर्ण जीवन प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन दूसरी जगहों पर वे अपनी खूनी बमबारी जारी रखे हुए हैं। उन्होंने इस्लामी राज्य की स्थापना का उद्देश्य नहीं बदला है और वह अभी तक जूझ रहे हैं क्योंकि वे खुद को जीतते हुए देखते हैं। लेकिन अब उन्हें एक नई चुनौती का सामना करना पड रहा है। उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों में लोग अपनी जिंदगी में सुधार, स्वास्थ्य सुविधाएं और बिजली चाहते हैं और यह नाइन इलेवन के बाद अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए बरसने वाले अरबों डॉलर की मजबूत विरासत है।
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