मुसलमान खिलाफत क्यों चाहते हैं?
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इस्लामी चरमपंथी संगठन आईएस ने इराक और सीरिया में अपने कब्जे वाले इलाके में 'खिलाफत' यानी इस्लामी राज्य का ऐलान किया। आईएस प्रमुख अबू बकर अल-बगदादी ने खुद को 'खलीफा' यानी दुनिया के मुसलमानों का नेता बताया।
खिलाफत क्या है? ये कैसे शुरू हुआ। खलीफा कौन हैं? आईएस की घोषणा के पीछे उनकी कौन सी महत्वाकांक्षाएं छिपी हैं?
जून में इस्लामिक स्टेट ने जब 'खिलाफत' की घोषणा की तो ऐसा लगा कि उसकी महत्वाकांक्षाओं और ऐतिहासिक फंतासी को स्वीकृति मिल गई हो।
अल-बगदादी का कहना था कि 'खिलाफत' के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करना दुनिया भर के मुसलमानों की धार्मिक जिम्मेदारी है। मध्य-पूर्व क्षेत्र में इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया हुई और आईएस को भारी आलोचना का सामना करना पडा।
तो क्या आईएस की मुसलमानों से की गई इस गुजारिश को कम आंकना खतरनाक है? 'खिलाफत' क्या है, और क्या ये मुसलमानों की आकांक्षाओं को तेज करता है?
खिलाफत और खलीफा
आखिरी 'खिलाफत' तुर्की का ऑटोमन साम्राज्य था जो अब से करीब 90 साल पहले खत्म हो गया। साल 2006 में मिस्र, मोरक्को, इंडोनेशिया और पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमानों पर किए गए 'गैलअप सर्वेक्षण' में शामिल दो-तिहाई लोगों ने "सभी इस्लामी देशों को एक नई खिलाफत के तहत एक हो जाने" का समर्थन किया था।
आखिर क्यों इतने सारे मुसलमान इस नामुमकिन प्रतीत होने वाले सपने में यकीन रखते हैं? इसका जवाब 'खिलाफत' के इतिहास में छिपा है।
अरबी में खलीफा का अर्थ प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होता है। कुरान में इसे न्यायप्रिय शासन के रूप में देखा गया है। पहले आदम फिर दाऊद और सुलेमान को धरती पर खुदा का खलीफा माना जाता है।
जब सन् 632 में पैगम्बर मोहम्मद की मृत्यु हुई तो उनके उत्तराधिकारी को मुस्लिम समुदाय के नेता के रूप में खलीफा का खिताब मिला। पहले चार खलीफाओं, जिन्हें 'राशिदून' कहते हैं, ने करीब तीन दशकों तक शासन किया।
'द इनएविटेबल खलीफा' के लेखक रजा पनखुर्स्त के मुताबिक इन चार खलीफाओं का चुनाव आम सहमति से हुई थी। पनखर्स्त कहते हैं कि पहले चार खलीफाओं को आदर्श खलीफा माना जाता है। वो कहते हैं कि सच्चे खलीफा खुद भी कानून से ऊपर नहीं होते।
इस्लाम का इतिहास है तख्तापलट
शिया मुसलमान इतिहास की इस व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। वो मानते हैं कि पैगंबर के चचेरे भाई अली को खलीफा न बनने देने के लिए पहले दो खलीफाओं ने आपस में मिलकर एक सफल तख्तापलट किया था।
पहली खिलाफत को लेकर हुआ यह विवाद इस्लाम के इतिहास में सबसे लंबे समय से चल रहा विवाद है। लेकिन आज के सुन्नी मुसलमानों, जिनमें से अधिकांश तानाशाही शासन में रहते हैं, वो आम सहमति से बने खलीफा शासन को लेकर गहरा आकर्षण हो सकता है।
खिलाफत को लेकर आकर्षण का दूसरा बडा कारण ये है कि ये मुसलमानों को मुस्लिम शासकों की महानता की याद दिलाता है। पहले चार 'आदर्श खलीफाओं' के दौर के बाद उम्मयद और अब्बासी शासन के शाही खलीफाओं का दौर आया।
इस्लाम का स्वर्ण युग
इतिहासकार प्रोफेसर ह्यूग केनेडी का कहना है, "पैगंबर की मृत्यु के 70 साल बाद स्पेन और मोरक्को से लेकर मध्य एशिया और फिर मौजूदा पाकिस्तान के दक्षिणी छोर तक फैला मुसलमानों का विशाल साम्राज्य एक मुसलमान नेता के अधीन रहा।"
केनेडी ने बताया, "और यही है मुसलमानों की एकता, मुस्लिम संप्रभुता का विस्तार।" 'इस्लाम का स्वर्ण युग' कहे जाने वाला ये दौर महान, बौद्धिक और सांस्कृतिक रचनात्मकता से लैस शख्सियतों का युग रहा।
इसके बावजूद मुस्लिम साम्राज्य का शासन इतनी तेजी से और इतनी दूर-दूर तक फैला कि सभी मुस्लिम इलाकों को समेट पाना मुश्किल होता चला गया।
जैसे-जैसे सत्ता कमजोर होती चली गई, खिलाफत की धारणा न केवल किसी विशेष वंश परंपरा के लिए राजनीतिक दुविधा का शक्ल लेती गई, बल्कि इसके सामने धार्मिक चुनौतियां भी खडी होने लगीं।
प्रतिस्पर्धी खलीफाओं का उदय
खलीफा को एकता का प्रतीक मानने के बावजूद मुस्लिम आस्था को बदलने में मात्र एक सदी लगी और दुनिया ने समानांतर, यहां तक कि प्रतिस्पर्धी खलिफाओं का उदय देखा। अब्बासी खलीफा लगभग पांच सौ साल सत्ता में रहे। उनका सन् 1258 में बेहद खैफनाक अंत हुआ।
बगदाद पर मंगोलों का अधिकार होने पर शहर के अंतिम खलीफा को दरी में लपेट कर मंगोल ने घोडो के पैरों तले तब तक रौंदा गया जब तक उनकी मौत न हो गई।
इस तरह की मौत को सम्मान के रूप में लिया जाता था क्योंकि मंगोलों का विश्वास था कि ओहदेदार लोगों को बिना उनका खून बहाए मौत दी जानी चाहिए। हालांकि, खिलाफत संस्था बच गई। अब्बासी परिवार के सदस्यों को ममलूकों ने काहिरा में नाममात्र के खलीफा के रूप में मान्यता दी।
ममलूक वे हैं जिन्हें आज सुन्नी इस्लामी सत्ता का प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसके जरिए एक ऐसे एकल नेता का आदर्श स्थापित किया गया जो मुसलमानों को एकजुट रख सके। इसके बाद एक नए साम्राज्य का उदय हुआ।
ओटोमन सुल्तान ने अगले 400 सालों तक इस्लामिक दुनिया पर शासन किया।
खिलाफत आंदोलन का अंत
खिलाफत आंदोलन का अंत मुस्तफा कमाल अतातुर्क के हाथों हुआ। आधुनिक तुर्की के नायक, कमाल ने साल 1924 में खिलाफत का अंत करते हुए तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया। अंतिम ओटोमन खलीफा को इस्ताम्बुल से निष्कासित कर दिया गया।
लेकिन वे जिस खिलाफत संस्था का प्रतिनिधित्व करते थे वह करीब 1300 साल तक अस्तित्व में रही। और इसके अंत ने बौद्धिक मुसलमानों के जीवन पर गहरा असर छोडा़।
लीड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और 'रिकॉलिंग द खिलाफत' के लेखक सलमान सैय्यद का कहना है कि 1920 के दशक में मुस्लिम विचारकों का अचानक संसद और ताज की भूमिका के बारे में ढेर सारे गंभीर सवालों से सामना होने लगा। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।
वे सवाल करते हैं, "क्या मुसलमानों को इस्लामिक स्टेट में जीने की जरूरत है? स्टेट कैसा होना चाहिए?"
20वीं सदी के मध्य में मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर जैसे नेताओं ने इसका जवाब देने की कोशिश की। पैन-अरबइज्म के नाम से जानी जाने वाली विचारधारा ने धर्मनिरपेक्ष खिलाफत की धारणा को पेश किया।
संयुक्त अरब गणराज्य की स्थापना
इसी सिलसिले में 1950 के दशक के दौरान नासिर ने मिस्र और सीरिया को मिलाकर संयुक्त अरब गणराज्य की स्थापना की। लेकिन इसराइल के गठन के बाद मध्य-पूर्व में सबकुछ बदल गया। पनखुर्स्त का तर्क है कि पैन-अरबइज्म इसराइल सैन्य शक्ति के आगे बिखर कर रह गया।
पनखुर्स्त, हिज्ब-उत-तहरीर नामक एक संगठन से जुडे हैं जिसकी स्थापना साल 1950 में खिलाफत आंदोलन को फिर से शुरू करने के मकसद के की गई थी।
लेकिन 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में मध्य-पूर्व पर शासन करने वाली सत्ता को हिज्ब-उत-तहरीर नापसंद थी। इसका परिणाम ये हुआ कि पनखुर्स्त को मिस्र की जेल में चार साल गुजारने पडे़।
मुस्लिम ब्रदरहुड
फिर मिस्र में जनतांत्रिक तरीके से निर्वाचित मुस्लिम ब्रदरहुड सरकार को जनरल अब्दुल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में सेना ने उखाड़ फेंका। इसके बाद सीरिया और इराक में खूनी संघर्ष हुआ और इस्लामी राज्य की अराजकता को दुनिया ने देखा।
लीड यूनिवर्सिटी के सलमान सैय्यद कहते हैं, "कई लोग कहेंगे कि इस्लामिक स्टेट का उदय अल-सीसी द्वारा किए गए तख्तापलट से शुरू होता है।"
सैय्यद का कहना है, "फिलहाल मुसलमानों पर शासन करने वाली ज्यादातर सरकारों और मुसलमानों के बीच की खाई बढती जा रही है। खिलाफत को एक तरह से मुसलमानों में स्वराज की तडप कहा जा सकता है।"
वर्दी और झंडे का काला रंग
इस्लामिक स्टेट ने बडी चालाकी से खिलाफत के इतिहास के उन तत्वों फायदा उठाया है जो उनके हितों को बखूबी पूरा करे।
इतिहासकार ह्यूग केनेडी बताते हैं कि उनकी वर्दी और झंडे का रंग जानबूझकर काला रखा गया है ताकि इससे इस्लाम के स्वर्ण युग की याद आए। 8वीं सदी में अब्बासी भी अपने दरबार में काले रंग की ड्रेस पहनते थे।
उनका मूल नाम, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड लेवान उस दौर की याद दिलाता है जब दो देशों के बीच कोई सरहद नहीं थी, क्योंकि दोंनो के इलाके इस्लामी खिलाफत का हिस्सा थे।
आईएस की सफलता से प्रतीत होता है कि खिलाफत कितना गंभीर और अत्यंत महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षा बन चुकी है।