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शैम्पू की बोतल से बनाई मशीन, निमोनिया से बचा रही बच्चों की जान

Thu, 12 Oct 2017 02:00 PM IST
आमिर पीरजादा और पॉलिन मैसन
आमिर पीरजादा और पॉलिन मैसन Updated Thu, 12 Oct 2017 02:00 PM IST
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डॉक्टर मोहम्मद जोबायर चिश्ती - फोटो : बीबीसी

"एक प्रशिक्षु के तौर पर यह मेरी पहली रात थी। मेरे आंखों के सामने तीन बच्चों की मौत हो गई और मैं बेबस नजरों से उन्हें मरते हुए देखता रहा।" यह तब की बात है जब 1996 में डॉक्टर मोहम्मद जोबायर चिश्ती ने बांग्लादेश के सिलहट मेडिकल कॉलेज के शिशु चिकित्सा विभाग में प्रशिक्षु के तौर पर काम करना शुरू किया था।

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उस रात उन्होंने तय किया कि वो निमोनिया से बच्चों को बचाने के लिए कुछ ना कुछ करेंगे। हर साल करीब 9 लाख 20 हजार बच्चे निमोनिया से दुनिया भर में मारे जाते हैं जिसमें से ज्यादातर मौतें दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में होती हैं। दो दशकों के शोध के बाद अब डॉक्टर चिश्ती ने एक कम लागत वाले उपकरण तैयार किया है जिससे हजारों बच्चों की जिंदगियां निमोनिया से बचाई जा सकती है।
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महंगी मशीन से इलाज मुश्किल
निमोनिया से फेफड़ों पर असर पड़ता है। स्ट्रेप्टोकोकस जैसे बैक्टीरिया या रेस्पाइरेट्री सिन्सिटीयल वायरस जैसे संक्रमण से फेफड़ों में सूजन आ जाती है और इसमें पानी या मवाद भर जाता है। इसकी वजह से सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है। विकसित देशों के अस्पतालों में वेंटिलेटर के माध्यम से निमोनिया से प्रभावित बच्चों को सांस लेने में मदद दी जाती है। लेकिन एक मशीन की लागत करीब 10 लाख रुपये की आती है और इसके लिए खासतौर पर प्रशिक्षित स्टाफ की जरूरत पड़ती है। यह बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों के अस्पतालों के लिए एक महंगा सौदा है।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में काम करते हुए डॉक्टर चिश्ती को बबल सीपीएपी मशीन देखने का मौका मिला

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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके विकल्प के तौर पर गंभीर रूप से निमोनिया पीड़ितों को कम मात्रा में ऑक्सीजन देने का सुझाव दिया था। लेकिन इसके बावजूद अभी भी हर सात में से एक निमोनिया ग्रस्त बच्चा बच नहीं पाता है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में काम करते हुए डॉक्टर चिश्ती को बबल सीपीएपी मशीन देखने का मौका मिला।

यह मशीन लगातार वायु दबाव का इस्तेमाल कर फेफड़े को बंद होने से रोकती है और शरीर को अधिक से अधिक ऑक्सीजन लेने में मदद करती है। लेकिन यह मशीन भी महंगी है। डॉक्टर चिश्ती जब मेलबर्न से बांग्लादेश इंटरनेशनल सेंटर फॉर डायरिया डिजीज रिसर्च में काम करने लौटे तो उन्होंने बबल सीपीएपी उपकरण के सस्ते रूप पर काम करना शुरू किया। वो और उनके एक सहकर्मी ने आईसीयू में बेकार हो चुके शैम्पू की प्लास्टिक की एक बोतल को लिया और उसमें पानी भर दिया। बोतल के एक सिरे में एक ट्यूब लगा दी।

कैसे करता है यह काम
डॉक्टर चिश्ती इसके काम करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं, "बच्चे टंकी से ऑक्सीजन लेते हैं और बोतल में लगे ट्यूब के माध्यम से सांस छोड़ते है। इससे पानी के अंदर बुलबुला बनने लगता है।" पानी के बुलबुले का दबाव फेफड़े में थोड़ी सी मात्रा में हवा बनाए रखता है जिससे की फेफड़ा काम करता रहता है। डॉक्टर चिश्ती बताते हैं, "हमने इसे चार से पांच मरीजों पर आजमाया। हमें कुछ ही घंटों में उनमें महत्वपूर्ण सुधार दिखे।"

इसका सफल प्रयोग रहा
कोहिनूर बेगम की बेटी रुना का इस तरकीब से इलाज हुआ है। वो बताती हैं, "डॉक्टरों ने बहुत कोशिशें की थीं। डॉक्टरों ने पहले ऑक्सीजन, फिर खाने के लिए पाइप और फिर पानी के बुलबुलों वाली सफेद बोतल लगाई।"

"इलाज के बाद जब मेरी बच्ची ठीक हो गई तो मुझे बेहद खुश हुई थी।"

दो साल के अध्ययन के बाद डॉक्टर चिश्ती ने अपना यह काम द लैंसेट पत्रिका में छपवाया। इस अध्ययन के मुताबिक कम-प्रवाह में ऑक्सीजन देने की तुलना में बबल सीपीएपी उपकरण से अपेक्षाकृत बच्चों की मृत्यु दर कम हुई है। इस उपकरण में लागत मात्र 80 रुपये आती है और इससे मृत्यु दर में 75 फीसदी की गिरावट आई है।

करीब 600 बच्चों को मिल चुका है लाभ

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इस उपकरण की मदद से ऑक्सीजन का इस्तेमाल भी बेहतर तरीके से किया जाता है जिससे अस्पताल के ऑक्सीजन का सालाना खर्च करीब 20 लाख से घटकर 4 लाख तक हो जाता है। अद-दीन वीमेन्स मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर एआरएम लुथफुल कबीर का कहना है कि अभी देश भर का अध्ययन किए जाने की जरूरत है लेकिन जो परिणाम आ रहे हैं, वो उत्साहवर्धक हैं।
"मैं समझता हूं कि इससे मृत्यु दर में बहुत गिरावट आएगी क्योंकि कोई भी अस्पताल इस नए रास्ते को आसानी से कम खर्च में अपना सकता है।"

करीब 600 बच्चे इससे अब तक लाभान्वित हो चुके हैं।
डॉक्टर चिश्ती का प्रमोशन हो चुका है और अब वो अपने अस्पताल में क्लिनिकल रिसर्च के मुखिया हैं। लेकिन तीन बच्चों के पिता डॉक्टर चिश्ती अब भी वार्ड में बच्चों के लिए समय निकाल लेते हैं। जब उनसे पूछा गया कि 20 साल पहले किए गए वादे को पूरा करते हुए आपको कैसा लगता है तो उनका कहना था, "मैं इसे लफ्जों में बयां नहीं कर सकता।"

वो विकासशील देशों के सभी अस्पतालों में बबल सीपीएपी की सुविधा चाहते हैं। वह कहते हैं, "उस दिन हम कह सकते हैं कि निमोनिया से मरने वालों की संख्या करीब शून्य हो चुकी है।" बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की यह सेवा बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सौजन्य से है।

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