फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Rest of World ›   banagaldesh who will win and who will loss

बांग्लादेशः किसकी होगी जीत, किसकी होगी हार?

Sat, 04 Jan 2014 03:00 PM IST
Updated Sat, 04 Jan 2014 03:00 PM IST
विज्ञापन
banagaldesh who will win and who will loss

बांग्लादेश में पांच जनवरी को दसवें आम चुनाव होने हैं मगर चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता गंभीर सवालों के घेरे में है।

विज्ञापन


मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके सहयोगी दलों ने चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया है क्योंकि सत्ताधारी बांग्लादेश अवामी लीग (बीएएल) ने चुनाव प्रक्रिया के दौरान एक तटस्थ सरकार के गठन में कोई रुचि नहीं दिखाई थी।

विपक्षी दल मांग कर रहे हैं कि चुनाव से पहले प्रधानमंत्री शेख हसीना त्यागपत्र देकर एक तटस्थ कामचलाऊ सरकार का गठन करें।

सरकार ने यह मांग ख़ारिज करते हुए कहा है कि चुनाव संवैधानिक रूप से ज़रूरी हैं और यह पांच जनवरी को ही होंगे।

दांव पर क्या?
बांग्लादेश की चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता इसलिए ख़तरे में है क्योंकि विपक्ष की अनुपस्थिति में सत्ताधारी अवामी लीग पार्टी भारी बहुमत से जीत सकती है।
विज्ञापन


अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने अपने पर्यवेक्षक भेजने से इनकार कर दिया है, जिससे इन आशंकाओं को और बल मिला है।

चुनाव के दिन हिंसा पर काबू रखना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगा क्योंकि राजधानी ढाका समेत देश के कई हिस्सों में दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच बीते कुछ हफ़्तों में हिंसक झड़पें हुई हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


बहिष्कार क्यों?
विपक्षी दल चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं लेकिन सड़कों पर प्रदर्शन जारी हैं।

पारंपरिक रूप से बांग्लादेश में चुनावों के दौरान एक तटस्थ कामचलाऊ सरकार होती थी ताकि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता तय की जा सके, लेकिन अवामी लीग सरकार ने संविधान में संशोधन कर सर्वदलीय सरकार के तहत चुनाव करवाने का फ़ैसला लिया।

पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख ख़ालिदा ज़िया कहती हैं कि सत्ताधारी पार्टी की सरकार चुनाव प्रक्रिया की शुचिता पर असर डालेगी।

असर?
विपक्ष की अनुपस्थिति में अवामी लीग और उसके सहयोगियों के 300 में से 154 सीटों पर निर्विरोध चुने जाने की संभावना है, जिससे उन्हें आसानी से बहुमत मिल जाएगा।

हालांकि चुनाव पंडितों का अनुमान है कि इससे देश में और ज़्यादा अफ़रातफ़री का माहौल बनेगा क्योंकि विपक्षी दल विरोध जारी रखेंगे, जो अक्सर सुरक्षा बलों से साथ हिंसक संघर्ष में तब्दील हो जाता है।

खिलाड़ी कौन?
प्रधानमंत्री शेख हसीना और बीएनपी नेता ख़ालिदा ज़िया कट्टर राजनीतिक दुश्मन हैं। पिछले दो दशक में दोनों बारी-बारी से सरकार और विपक्ष में आती-जाती रही हैं।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के हिसाब से चुनाव के बाद उनकी प्रतिद्वंद्विता चरम पर पहुंच सकती है।
पूर्व राष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद इरशाद और उनकी जटिया पार्टी (जेपी) इन चुनावों में एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं। बीएएल और बीएनपी के बाद जेपी संसद में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है।

दरअसल 1991 में लोकतंत्र की बहाली के बाद से ही उसकी उल्लेखनीय मौजूदगी रही है। बीएएल के नेतृत्व वाले गठबंधन के तहत चुनाव लड़कर पार्टी ने 2008 में 27 संसदीय सीटें जीती थीं।

लेकिन चुनावों में भाग लेने के लेकर उनकी पार्टी के बार-बार पाला बदलने से स्थिति और जटिल हो गई है। इरशाद ने पहले अक्टूबर में ऐलान किया कि जनवरी के चुनावों में उनकी पार्टी भाग नहीं लेगी। नवंबर में वे पलट गए और ऐलान किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए वह सर्वदलीय कामचलाऊ सरकार में शामिल होंगे। मगर वह एक बार फिर अपने बयान से पलटे और 12 दिसंबर को चुनाव आयोग को सूचित किया कि वह चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं।

मुद्दे क्या?
राजनीतिक स्थिरता एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना है क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान लगातार हड़तालें और हिंसा होती रही है। बेराज़गारी, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, कीमतों में बढ़ोत्तरी, औद्योगिक दुर्घटनाएं और मानवाधिकारों का हनन दूसरे बड़े मुद्दे हैं।

24 अप्रैल को बांग्लादेश के इतिहास की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटना हुई, जब ढाका के नज़दीक एक आठ माले की कपड़ा फ़ैक्ट्री की इमारत ढह गई। इसमें 1,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे। बांग्लादेश में दुनिया का सबसे बड़ा कपड़ा उद्योग है पर औद्योगिक सुरक्षा के पैमाने पर यह खरा नहीं उतरता। ऐसे में कामगारों की सुरक्षा और वेतन इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।

पांच जनवरी को होने वाले चुनावों में हिंसा की आशंका के चलते सेना को तैनात किया गया है।

दि एशिया फ़ाउंडेशन के सितंबर 2013 के सर्वेक्षण के अनुसार 75% मतदाता चाहते हैं कि चुनाव के दौरान एक तटस्थ कामचलाऊ सरकार रहे। राजनीतिक टिप्पणीकार कहते हैं कि यह देखना मज़ेदार होगा कि ऐसे में कितने लोग मतदान के लिए बाहर निकलते हैं।

इस्लामिस्ट पार्टी जमात-ए-इस्लामी पर लगाया गया प्रतिबंध चुनावों का एक और मुद्दा है। वरिष्ठ जमात नेता अब्दुल कादेर मुल्ला को 1971 के मुक्ति संग्राम में दोषी पाए जाने के बाद 13 दिसंबर को मौत की सज़ा दे दी गई थी। यह सज़ा देश के छोटे पर रक्तरंजित इतिहास की बड़ी घटना साबित हुई।


उनकी मौत की सज़ा पर तीखे मतभेद उभरे जो पूरे देश में हिंसक झड़पों में बदल गए।

भूराजनीतिक असर?
अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और रूस ने अपने पर्यवेक्षकों को बांग्लादेश भेजने से इनकार कर दिया है। इससे देश के छवि और विदेश संबंधों को आघात लगा है।

कई विदेशी पर्यवेक्षक चुनावों की आलोचना कर रहे हैं क्योंकि निर्विरोध जीती जा रहीं 154 सीटें बीएएल को स्पष्ट बहुमत दे देंगी और यह जनता की भावनाओं के अनुरूप नहीं होगा। इसे शायद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आसानी से पचा नहीं पाएगा।

विश्लेषक चुनावों पर भारत की प्रतिक्रिया पर भी नज़र रखे हैं क्योंकि पारंपरिक रूप से भारत के सत्ताधारी अवामी लीग से अच्छे संबंध रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed